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भारत में सांप्रदायिक हिंसा 2025 – गिरावट के आंकड़े, गहरी होती सामाजिक दरारें और लोकतंत्र के सामने नई चुनौती

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट्र)।
14 जनवरी 2026 को दिल्ली में आयोजित पोंगल महोत्सव के मंच से भारतीय प्रधानमंत्री का यह कथन कि राष्ट्र निर्माण में किसानों का महत्वपूर्ण योगदान है, केवल एक सांस्कृतिक या औपचारिक वक्तव्य नहीं था, बल्कि यह भारत की आत्मा, अर्थव्यवस्था और सामाजिक संरचना की ओर संकेत करने वाला राज नीतिक-वैचारिक संदेश था। पोंगल, जो कृषि, प्रकृति और श्रम के सम्मान का उत्सव है, उसी भारत का प्रतीक है जिसकी जड़ें खेतों में हैं। किंतु इसी कालखंड में प्रकाशित सेंटर फार स्टडी आफ सोसाइ टी एंड सेक्युलरिज्म (सीएस एसएस) की ताजा मानिटरिंग रिपोर्ट एक ऐसे भारत की तस् वीर पेश करती है, जहाँ सांप्र दायिक दंगों में गिरावट के बावजूद माब लिंचिंग, नफरत आधारित अपराध और पहचान – केंद्रित हिंसा अब भी लोक तंत्र के लिए गंभीर चुनौती बने हुए हैं। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जिसकी सामा जिक संरचना बहुधर्मी बहु भाषी और बहु सांस्कृतिक ताने-बाने से निर्मित है। ऐसे समाज में सांप्रदायिक सौहार्द केवल आंत रिक स्थिरता का प्रश्न नहीं, बल्कि वैश्विक लोकतांत्रिक विश्व के लिए एक नैतिक और राजनीतिक संकेतक भी है, इसलिए, यह लेख इन्हीं दो समानांतर सच्चाइयों, आशा और चिंता, के बीच भारत के समकालीन सामाजिक- राज नीतिक परिदृश्य का अंतरराष् ट्रीय दृष्टि से विश्लेषण प्रस्तुत करता है। यह लेख सीएस एस एस की रिपोर्टिंग पर आ धारित है इसकी सटीकता को प्रमाणित नहीं किया जा सकता। साथियों बात अगर हम कृषि और राष्ट्र-निर्माण- भारतीय सभ्यता की आधार शिला इसको समझनें की करें तोभारत में कृषि केवल एक आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि एक सभ्यतागत संरचना है।
सिंधु घाटी से लेकर आ धुनिक भारत तक, किसान समाज की स्थिरता, खाद्य सुर क्षा और सांस्कृतिक निरंतरता का मूल आधार रहा है।
प्रधानमंत्री का पोंगल मंच से दिया गया वक्तव्य इसी ऐति हासिक सत्य को पुनः रेखांकित करता है। वैश्विक संदर्भ में देखें तो आज जब विकसित देश भी खाद्य आत्मनिर्भरता को राष्ट्रीय सुरक्षा का हिस्सा मान रहे हैं, भारत का किसान – केंद्रित विमर्श उसे एक स्थायी विकास माडल के रूप में प्रस्तुत करता है। अंतररा ष्ट्रीय संस्थाएँ जैसे एफएओ और विश्व बैंक भी मानती हैं कि भारत की कृषि व्यवस्था तमाम चुनौतियों के बावजूद, वैश्विक खाद्य संकट के दौर में एक स्थिर स्तंभ बनी हुई है। पोंगल केवल तमिल संस्कृति का पर्व नहीं, बल्कि यह श्रम, प्रकृति और समुदाय के सामू हिक उत्सव का प्रतीक है। जब प्रधान मंत्री जैसे संवैधा निक पद पर आसीन व्यक्ति इस पर्व के माध्यम से किसानों को राष्ट्र-निर्माण का नायक बताते हैं, तो यह संदेश केवल घरेलू नहीं बल्कि वैश्विक भी होता है। यह भारत को एक ऐसे देश के रूप में प्रस्तुत कर ता है जहाँ विकास का माडल जमीनी स्तर से जुड़ा है। किंतु यही समावेशी सांस्कृतिक संदेश तब कमजोर पड़ता है, जब समाज के भीतर पहचान- आधारित हिंसा और नफरत की राजनीति सामाजिक ताने – बाने को चोट पहुँचाती है। सीएसएसएस की 2025 की मानिटरिंग रिपोर्ट के अनुसार भारत में दर्ज बड़े सांप्रदायिक दंगों की संख्या में उल्लेखनीय गिरावट आई है। यह एक सकारात्मक संकेत है और इसे कानून- व्यवस्था में सु द्दार, त्वरित प्रशासनिक हस्त क्षेप और न्यायिक सक्रियता से जोड़ा जा सकता है। अंतर राष्ट्रीय स्तरपर यह भारत के लिए एक राहतकारी आंकड़ा है, क्योंकि लंबे समय से वैश्विक मानवाधिकार संगठनों द्वारा भारत में सांप्रदायिक हिंसा को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं। किंतु रिपोर्ट का दूसरा पक्ष अधिक चिंताजनक है हिंसा समाप्त नहीं हुई है, बल्कि उसने नए, अधिक विकें द्रीकृत और अप्रत्याशित रूप धारण कर लिए हैं।
माॅब लिंचिंग – भीड़ का उभार और राज्य की परीक्षा माब लिंचिंग आधुनिक लोक तंत्र की सबसे भयावह विफल ताओं में से एक मानी जाती है। भारत में यह हिंसा अक्सर अफवाह, पहचान और सामा जिक पूर्वाग्रहों से प्रेरित होती है। सीएसएसएस रिपोर्ट बताती है कि 2025 में माॅब लिंचिंग की घटनाएँ भले ही बड़े दंगों की तरह सुर्खियों में न रही हों, लेकिन उनकी सामाजिक क्षति कहीं अधिक गहरी रही है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार विमर्श में माब लिंचिंग को अन आफिशियल जस्टिस सिस्टम के रूप में देखा जाता है, जहाँ राज्य की वैधता और कानून का शासन सीधे चुनौती के घेरे में आ जाता है। नफरत आ धारित अपराध-वैश्विक प्रवृ त्ति, भारतीय संदर्भ नफरत आधारित अपराध केवल भारत की समस्या नहीं हैं। अमेरिका यूरोप और एशिया के कई हिस्सों में यह एक उभरती वैश्विक प्रवृत्ति है।
किंतु भारत में इसकी जटि लता इस कारण बढ़ जाती है क्योंकि यहाँ पहचान, धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र, इतिहास से गहराई से जुड़ी हुई है। सीएसएसएस रिपोर्ट के अनु सार 2025 में नफरत अपराद्दों का बड़ा हिस्सा सोशल मीडिया से उपजी गलत सूचनाओं और राजनीतिक ध्रुवीकरण से जुड़ा रहा। यह स्थिति भारत के डिजिटल लोकतंत्र के लिए गंभीर चेतावनी है। पहचान -आधारित हिंसा और सामा जिक विखंडन पहचान-केंद्रित हिंसा का सबसे बड़ा खतरा यह है कि यह समाज को स्थायी रूप से विभाजित कर देती है। किसान, मजदूर और निम्न- आय वर्ग, जिनका राष्ट्र – निर्माण में सबसे बड़ा योग दान है, वही वर्ग अक्सर ऐसी हिंसा का शिकार बनता है। यह विरोधाभास भारतीय लोक तंत्र के मूल सिद्धांत, समानता और बंधुत्व को कमजोर करता है। अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक मानते हैं कि यदि पहचान-आ धारित हिंसा पर समय रहते नियंत्रण नहीं पाया गया, तो यह आर्थिक विकास और सामाजिक स्थिरता दोनों को प्रभावित कर सकती है।
साथियों बात अगर हम राज्य, नीति और नैतिक जिम्मे दारी इसको समझने की करें तो, प्रधानमंत्री का किसान- सम्मान संदेश तभी सार्थक होगा जब राज्य समान रूप से हर नागरिक की सुरक्षा सुनिश्चित करे। सीएसएस एस रिपोर्ट अप्रत्यक्ष रूप से यह सवाल उठाती है कि क्या कानून का कार्यान्वयन हर स्तर पर निष्पक्ष है।
अंतरराष्ट्रीय लोकतांत्रिक मानकों के अनुसार, हिंसा की रोकथाम केवल पुलिसिंग का विषय नहीं, बल्कि शिक्षा, सामा जिक संवाद और राजनीतिक जिम्मेदारी का भी प्रश्न है।
भारत के लिए यह एक निर्णायक मोड़ है, या तो वह अपने विकास माडल को सामा जिक न्याय के साथ जोड़े, या फिर आर्थिक प्रगति के बावजूद सामाजिक असंतोष से जूझता रहे। साथियों बात अगर हम वैश्विक छवि और भारत की साफ्ट पावर इसको समझने की करें तो, भारत आज स्वयं को विश्व गुरु, ग्लोबल साउथ के नेता और लोकतांत्रिक आदर्श के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। किसान-केंद्रित सांस्कृ तिक आयोजनों और विकास शील अर्थव्यवस्था के साथ-साथ सामाजिक सौहार्द इसकी साफ्ट पावर का अहम हिस्सा है। किंतु माब लिंचिंग और नफरत अपराधों की खबरें अंतरराष्ट्रीय मीडिया में इस छवि को नुकसान पहुँचाती हैं।
सीएसएस एस जैसी रिपोर्टें वैश्विक नीति – निर्मा ताओं और निवेशकों के लिए संकेतक बन जाती हैं।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि एक समग्र राष्ट्र- निर्माण की आवश्यकता,14 जनवरी 2026 को पोंगल मंच से दिया गया प्रधानमंत्री का वक्तव्य भारत की आत्मा की आवाज है, एक ऐसा भारत जो किसान, श्रम और प्रकृति के सम्मान पर खड़ा है। किंतु सीएसएसएस की 2025 की रिपोर्ट यह याद दिलाती है कि राष्ट्र-निर्माण केवल आर्थिक या सांस्कृतिक उपल ब्धि नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और सुरक्षा की भी कसौटी है। जब तक किसान की मेहनत और नागरिक की सुरक्षा समान रूप से संरक्षित नहीं होंगी, तब तक भारत का राष्ट्र-निर्माण अधूरा रहेगा।
अंतरराष्ट्रीय दृष्टि से भी भारत की सफलता इसी संतुलन में निहित है, विकास के साथ मानवीय गरिमा, और सांस्कृतिक गर्व के साथ सामा जिक सद्भाव।

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