एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट्र)।
वैश्विक स्तर पर पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) दशकों से वैश्विक राजनीति, सामरिक प्रतिस्पर्धा और ऊर्जा सुरक्षा का केंद्र रहा है। आज जब ईरान और उसके विरोधी वि शेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका, इजराइल तथा खाड़ी के कई देश आमने-सामने खड़े हैं,तो यह टकराव केवल सैन्य शक्ति का नहीं, बल्कि आॅइल वाॅर यानें तेल आधारित आर्थिक युद्ध का रूप भी ले चुका है। मैं एडवोकेट किशन सनमुख दास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि वैश्विक अर्थ व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले ऊर्जा संसाधनों पर नियं त्रण, आपूर्ति और कीमतों का खेल अब हथियार बन चुका है। बता दें, मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष के बीच बुधवार को एक बड़ा और खतरनाक मोड़ सामने आया, जब ईरान के विशाल पार्स गैस फील्ड पर हमला हुआ, यह पहली बार है जब खाड़ी क्षेत्र में ई रान के ऊर्जा ढांचे को सीद्दे कुछ हिस्सों को नुकसान पहुंचा है, इसके बाद वहां काम कर रहे कर्मचारियों को सुरक्षित स्थान पर भेज दिया गया और आग बुझाने के लिए इमरजेंसी टीमों को लगाया गया। हमले के बाद ईरान ने कड़ा रुख अपनाते हुए सऊदी अरब, यूएई और कतर को सीधी चेतावनी दी है, ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने कहा कि इन देशों के कई ऊर्जा ठिकाने अब सीधे निशाने पर हैं और आने वाले घंटों में उन पर हमला किया जा सकता है, ईरान के सरकारी मीडिया के अनुसार, लोगों और कर्मचारियों से इन इलाकों को तुरंत खाली करने की अपील की गई है। ईरान ने जिन ठिकानों को निशाना बनाने की चेतावनी दी है, उन में सऊदी अरब की सैमरेफ रिफाइनरी और जुबैल पेट्रोके मिकल काम्प्लेक्स, यूएई का अल होसन गैस फील्ड और कतर के मेसाइद पेट्रोकेमिकल काम्प्लेक्स, मेसाइद होल्डिंग कंपनी और रास लफान रिफाइ नरी शामिल हैं, इस पूरे संघर्ष का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी साफ दिखाई दे रहा है, अमेरिका में डीजल की की मत 5 डालर प्रति गैलन से ऊपर पहुंच गई है, जो 2022 के बाद पहली बार हुआ है, ऊर्जा आपूर्ति में आई बाधा ने वैश्विक बाजार कोझकझोर कर रख दिया है। इस संदर्भ में यह विश्लेषण तीन प्रमुख प्रश्नों पर केंद्रित है, क्या ईरान तेल को हथियार बनाकर वैश् िवक शक्ति संतुलन बदलने की कोशिश कर रहा है?
क्या वह खुद एक आत्म घाती रणनीति की ओर बढ़ रहा है? और क्या यह संघर्ष दुनियाँ को आर्थिक मंदी की ओर धकेल सकता है? भारत जैसे विकासशील देशों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण है।
भारत अपनी ऊर्जा जरू रतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। यदि तेल की कीम तें बढ़ती हैं, तो इसका सीधा असर महंगाई, चालू खाता घाटा और आर्थिक विकास पर पड़ता है। इसके अलावा, खाड़ी देशों में काम करने वाले लाखों भारतीयों पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है, जिससे रेमिटेंस (विदेशी धन) पर असर पड़ेगा। चीन और रूस इस पूरे समीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। चीन ईरान का बड़ा तेल खरी दार है और वह अमेरिकी प्रति बंधों के बावजूद व्यापार जारी रखता है। वहीं रूस, जो खुद एक बड़ा ऊर्जा निर्यातक है, इस स्थिति का लाभ उठाकर वैश्विक बाजार में अपनी स्थि ति मजबूत कर सकता है।इस संकट का समाधान केवल सैन्य माध्यम से संभव नहीं है। कूट नीतिक वार्ता, क्षेत्रीय सहयोग और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की भूमिका महत्वपूर्ण है। संयुक्त राष्ट्र को इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। यदि सभी पक्ष संयम बरतते हैं और संवाद का रास्ता अपनाते हैं, तो स्थिति को नियंत्रित किया जा सकता है। लेकिन यदि टकराव बढ़ता है, तो इसके परिणाम वैश्विक स्तर पर गंभीर होने की संभावना है।
साथियों बात अगर हम आइल वार – ऊर्जा को हथिया र बनाने की रणनीति इसको समझने की करें तो, आइल वाॅर का अर्थ केवल तेल के लिए युद्ध नहीं, बल्कि तेल के माध्यम से आर्थिक दबाव ब नाना है। ईरान विश्व के सबसे बड़े तेल और गैस भंडार वाले देशों में शामिल है। यह देश हाॅर्मुज जलडमरूमध्य पर रण नीतिक नियंत्रण रखता है, जहां से विश्व के लगभग 20 प्रति शत तेल का व्यापार होता है। यदि ईरान इस जलडमरू मध्य को बाधित करता है, तो वैश्विक तेल आपूर्ति तुरंत प्रभा वित होती है। ईरान के लिए आइल वार एक दोधारी तल वार है। एक ओर वह अपने विरोधियों पर दबाव बना सक ता है, वहीं दूसरी ओर यह वैश्विक बाजार को अस्थिर कर के खुद अपनी अर्थव्यवस्था को भी नुकसान पहुंचाता है। वर्षों से ओपेक और अन्य तेल उत्पादक देशों के साथ मिल कर कीमतों को नियंत्रित कर ने की कोशिश होती रही है, लेकिन जब भू- राजनीतिक तनाव बढ़ता है, तो बाजार नियंत्रण की यह संरचना कम जोर पड़ जाती है।
अमेरिका- ईरान टकराव और प्रतिबंधों की भूमिका संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच दशकों से चला आ रहा संघर्ष हाल के वर्षों में और तीव्र हुआ है। विशेष रूप से डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए कठोर आर्थिक प्रति बंधों ने ईरान की अर्थव्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित किया। तेल निर्यात पर प्रतिबं धों के कारण ईरान की आय का प्रमुख स्रोत कमजोर पड़ा, जिससे उसने वैकल्पिक रण नीतियों की ओर रुख किया जैसे कि छद्म युद्ध (प्राॅक्सी वार), समुद्री मार्गों में बाधा और क्षेत्रीय अस्थिरता पैदा करना। इन प्रतिबंधों ने ईरान को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली से लगभग अलग-थलग कर दिया। नतीजतन, उसने प्रति रोध अर्थव्यवस्था (रेसिस्टेंस इकॉनमी) की नीति अपनाई, जिसमें घरेलू उत्पादन बढ़ाने और पश्चिमी निर्भरता कम कर ने का प्रयास शामिल है।
लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या यह नीति लंबे समय तक टिकाऊ है?
साथियों बात अगर हम हार्मुज जलडमरूमध्य- वैश्वि क ऊर्जा का चोक पाइंट इस को समझने की करें तो हाॅर्मुज जलडमरूमध्य विश्व ऊर्जा आपूर्ति का सबसे संवेदनशील बिंदु है। यदि यहां किसी प्रकार की सैन्य कार्रवाई या अवरोद्द होता है, तो तेल की कीमतें आसमान छूने लगती हैं। 20 19 और उसके बाद कई बार इस क्षेत्र में टैंकर हमले, ड्रोन हमले और नौसैनिक तनाव देखने को मिले हैं, जिनका प्रभाव वैश्विक बाजारों पर तुरंत पड़ा। ईरान के पास यह साम रिक क्षमता है कि वह इस मार्ग को बाधित कर सके, ले किन ऐसा करना अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया को आमंत्रित करता है, जिसमें नाटो और अन्य वैश्विक शक्तियाँ हस्तक्षेप कर सकती हैं। इसलिए यह कदम ईरान के लिए जोखिम भरा है। साथियों बात अगर हम क्या आत्मघाती रास्ते पर है ईरान? इसको समझने की करें तो, यह प्रश्न अत्यंत जटिल है। एक ओर ईरान अपनी संप्र भुता, क्षेत्रीय प्रभाव और सुरक्षा के लिए आक्रामक नीति अप ना रहा है, वहीं दूसरी ओर उसकी अर्थव्यवस्था लगातार दबाव में है। महंगाई, बेरोज गारी और मुद्रा अवमूल्यन ने आम जनता को प्रभावित किया है। ईरान की रणनीति को आत्मघाती इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि-वह वैश्वि क शक्तियों से सीधे टकराव की स्थिति में है।
आर्थिक प्रतिबंधों के का रण उसकी आंतरिक स्थिरता कमजोर हो रही है। क्षेत्रीय संघर्षों में उसकी भागीदारी (जैसे यमन, सीरिया) संसाध नों पर अतिरिक्त दबाव डालती है। लेकिन दूसरी ओर, ईरान यह तर्क देता है कि यह “रक्षा रणनीति” है यदि वह पीछे हटता है, तो उसकी क्षेत्रीय स्थिति कमजोर हो जाएगी। इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि ईरान उच्च जोखिम वाली रणनीति पर चल रहा है, जिसे आत्मघाती या साहसिक दोनों दृष्टिकोणों से देखा जा सकता है। इजरा इल-ईरान तनाव और संभा वित युद्ध इजराइल और ईरान के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है। परमाणु कार्यक्रम, साइ बर हमले, और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर दोनों देशों के बीच टकराव की स्थिति बनी रहती है। यदि यह तनाव पूर्ण युद्ध में बदलता है, तो इसका प्रभाव केवल इन दोनों देशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लेगा। साथियों बात अगर हम वैश्विक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव – मंदी की आशंका को सम झने की करें तो, ऊर्जा कीमतों में वृद्धि का सीधा असर वैश् िवक अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। जब तेल महंगा होता है, तो परिवहन, उत्पादन और उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें बढ़ जाती हैं। इससे महंगाई बढ़ती है और आर्थिक विकास धीमा पड़ता है। यदि ईरान से जुड़ा संघर्ष बढ़ता है और तेल आपूर्ति बाधित होती है,तो दुनियाँ को 1970 के दशक जैसी ऊर्जा संकट की स्थिति का सामना करना पड़ सकता है। उस समय1973 आइल क्राइसिस ने वैश्विक अर्थव्य वस्था को हिला दिया था।
आज की वैश्विक अर्थव्य वस्था पहले से अधिक परस्पर जुड़ी हुई है, इसलिए किसी भी बड़े ऊर्जा संकट का प्रभा व अधिक व्यापक और तेज होगा। अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष और विश्व बैंक जैसे संस्थान पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि भू – राजनीतिक तनाव वैश् िवक विकास दर को प्रभावित कर सकता है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि ऊर्जा युद्ध से वैश् िवक संकट तक ईरान से जुड़ा यह संघर्ष केवल एक क्षेत्रीय विवाद नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन, ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता का प्रश्न है। आइल वार के माध्यम से ईरान और उसके विरोधी एक -दूसरे पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन इसका खामियाजा पूरी दुनिया को भुगतना पड़ सकता है। यह कहना जल्दबाजी होगी कि ईरान आत्मघाती रास्ते पर है, लेकिन यह निश्चित है कि उसकी रणनीति अत्य धिक जोखिमपूर्ण है। यदि समय रहते कूटनी तिक समा धान नहीं निकाला गया, तो यह संघर्ष वैश्विक आर्थिक मंदी का कारण बन सकता है। इसलिए यह एक ऐसी स्थिति है जहां हर कदम का प्रभाव सीमाओं से परे जाता है और यही इसे 21वीं सदी का सब से महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक और आर्थिक संकट बनाता है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले ऊर्जा संसाधनों पर नियंत्रण, आपूर्ति और कीमतों का खेल अब हथियार बनने की और तेजी से अग्रसर
