Breaking News

आज अनेक माता-पिता गर्व से दिखाना चाहते हैं कि उनका बच्चा कितनी धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलता है, छोटी उम्र से अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में पढ़ाना और हिंदी से दूरी बनाना कहीं न कहीं मानसिक उपनिवेशवाद का प्रतीक

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट्र)।
वैश्विक स्तर पर भारत की सबसे बड़ी पहचान उसकी भा षाई, सांस्कृतिक और वैचारि क विविधता में निहित है। विश्व के किसी भी देश में इतनी भाषाएँ, बोलियाँ परंपराएँ व सांस्कृतिक अभिव्यक्तियाँ एक साथ सह- अस्तित्व में नहीं पाई जातीं। इस विविधता के महासागर में यदि कोई एक सूत्र है, जो भारत को भावना त्मक, सामाजिक और राष्ट्रीय स्तरपर जोड़ता है, तो वह है हिंदी भाषा। हिंदी केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि भारत की सामूहिक चेतना, स्मृति और संस्कृति की संवाहक है।
मैं एडवोकेट किशन सनमु खदास भावनानी गोंदिया महा राष्ट्र यह मानता हूं कि हिंदी – केवल भाषा नहीं, भावनात् मक सेतु हैं, हिंदी भारत में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है परंतु इसकी शक्ति केवल संख्या में नहीं,बल्कि संवेदना, आत्मीयता और भावा भिव्यक्ति में निहित है। हिंदी वह भाषा है, जिसमें प्रेम भी सरल है, पीड़ा भी सहज है और प्रतिरोध भी स्वाभाविक। जहाँ कई भाषाएँ औपचारिक संवाद तक सीमित रहती हैं, वहीं हिंदी व्यक्ति के हृदय से सीधे संवाद करती है। यही कारण है कि ग्रामीण भारत से लेकर शहरी महानगरों तक, साहित्य से लेकर सिनेमा तक और राजनीति से लेकर जन आंदोलनों तक हिंदी की भूमि का केंद्रीय बनी हुई है। इसी ऐतिहासिक सांस्कृतिक और वैश्विक महत्व के कारण हिंदी के सम्मान और प्रचार- प्रसार हेतु विशेष दिवस समर्पित किए गए हैं, 14 सितंबर (राष्ट्रीय हिंदी दिवस) और 10 जनवरी (विश्व हिंदी दिवस)। भारत में 14 सितंबर को हिंदी दिवस इसलिए मनाया जाता है क्योंकि इसी दिन 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने हिंदी को भारत की आधिकारिक भाषा के रूप में स्वीकार किया था। यह निर्णय केवल प्रशासनिक नहीं था, बल्कि यह उस ऐतिहासिक संघर्ष और सांस्कृतिक चेतना का परिणाम था, जिसने औपनिवेशिक शासन की भाषाई विरासत से बाहर निकलकर भारतीय भाषाओं को केंद्र में लाने का प्रयास किया। वहीं 10 जनवरी को विश्व हिंदी दिवस मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य हिंदी को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रतिष्ठा दिलाना, वैश्विक संवाद की भाषा के रूप में स्थापित कर ना और यह दर्शाना है कि हिंदी केवल भारत तक सीमित नहीं, बल्कि एक वैश्विक भाषा बन चुकी है। यह दिवस भारत की साफ्ट पावर, सांस्कृतिक कूटनीति और वैश्विक पहचान का महत्वपूर्ण आधार है।
साथियों बात अगर हम डिजिटल युग में हिंदी- विरा सत से भविष्य की तकनीक तक इसको समझने की करें तो आज का युग डिजिटल क्रांति, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), मशीन लर्निंग और वैश्विक संचार का युग है। लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि तकनीक केवल अंग्रेजी या कुछ चुनिंदा भाषाओं तक सीमित रहेगी, लेकिन हिंदी ने इस द्दारणा को तोड़ दिया है।
आज हिंदी-सोशल मीडि या की सबसे सक्रिय भाषाओं में से एक है, डिजिटल समा चार, ब्लाग, पाॅडकास्ट और यूट्यूब कंटेंट की प्रमुख भाषा बन चुकी है। एआई आधारित अनुवाद वॉइस असिस्टेंट और चैटबाट में तेजी से अपनाई जा रही है। हिंदी ने यह सिद्ध कर दिया है कि वह पारंपरिक ज्ञान से लेकर अत्याधुनिक तक नीक तक समान रूप से सक्षम है। यही कारण है कि विश्व हिंदी दिवस का एक प्रमुख उद्देश्य डिजिटल युग में हिंदी की प्रासंगिकता और क्षमता को रेखांकित करना है।
साथियों बात अगर हम अंग्रेजी बनाम हिंदी- आजादी के 75 वर्ष बाद भी वैचारिक गुलामी? इसको समझने की करें तो 1947 में भारत ने राज नीतिक स्वतंत्रता प्राप्त की, लेकिन आज भी एक गंभीर प्रश्न हमारे सामने खड़ाहै, क्या हम वैचारिक रूप से स्वतंत्र हो पाए हैं? विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर यह प्रश्न और भी प्रासंगिक हो जाता है कि क्या आज भी अंग्रेजी बोलना सामाजिक प्रतिष्ठा और आ धुनिकता का प्रतीक बना हुआ है? आज अनेक माता- पिता गर्व से यह दिखाना चाहते हैं कि उनका बच्चा कितनी धा राप्रवाह अंग्रेजी बोलता है। छोटी उम्र से अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में पढ़ाना और हिंदी से दूरी बनाना कहीं न कहीं मानसिक उपनिवेशवाद का प्रतीक है। हमें अन्य भाषाओं से प्रतिस्पर्धा नहीं, संतुलन की आवश्यकता हैं। यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि यह विमर्श अंग्रेजी या किसी अन्य भाषा के विरोध का नहीं, बल्कि हिंदी के आत्मसम्मान का है। अंग्रेजी वैश्विक संपर्क की भाषा है, परंतु हिंदी हमारी पहचान की भाषा है। यदि हम बच्चों को केवल अंग्रेजी में सोचने और सपने देखने के लिए प्रशि क्षित करेंगे, तो वे अपनी जड़ों से कटते चले जाएंगे। समय आ गया है कि- हिंदी को शिक्षा, तकनीक और प्रशासन में समान महत्व दिया जाए, बच्चों को हिंदी बोलने, लिखने और सोचने के लिए प्रोत्साहित किया जाए हिंदी को कमतर समझने की मानसिकता को समाप्त किया जाए।
भारत में लगभग 1500 से अधिक भाषाएँ और बोलियाँ हैं, जिनमें से अनेक विलुप्ति के कगार पर हैं। यह संकट केवल भाषाई नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक भी है। हिंदी का सशक्तिकरण तभी सार्थक होगा, जब वह अन्य भारतीय भाषाओं के साथ सह – अस्तित्व और सम्मान के सिद्धांत पर आगे बढ़े। हिंदी को संपर्क भाषा के रूप में सशक्त बनाते हुए, हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि भारत की भाषाई विविधता सुरक्षित रहे।
साथियों बात अगर हम हिंदी और वैश्विक पहचान- संयुक्त राष्ट्र की सातवीं भाषा की ओर इसको समझने की करें तो, भारत सरकार लंबे समय से हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की सातवीं आधिकारिक भाषा बनाने के लिए प्रयासरत है।
वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र की छह आधिकारिक भाषाएँ हैं -अंग्रेजी, फ्रेंच, स्पेनिश, चीनी, अरबी और रूसी। हिंदी के पक्ष में तर्क अत्यंत मजबूत हैं – यह विश्व की सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषाओं में शामिल है। भारत वैश्विक राज नीति, अर्थव्यवस्था और शांति मिशनों में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। हिंदी अनेक देशों में पढ़ाई और शोध की भाषा बन चुकी है। यदि हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा का दर्जा मिलता है, तो यह केवल भाषा की जीत नहीं, बल्कि वैश्विक बहुभाषिक लोक तंत्र की जीत होगी।
साथियों बात अगर हम वर्ष में दो बार हिंदी दिवस मनाने के इतिहास को समझनें की करें तो, हिंदी के वैश्विक विस्तार की नींव 10 जनवरी 1975 को नागपुर में आयोजित प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन में पड़ी। इस ऐतिहासिक सम्मेलन का उद्घाटन तत्कालीन प्र धानमंत्री इंदिरा गांधी ने किया था। इसमें 30 देशों के 122 प्रतिनिधियों ने भाग लिया, जिस ने यह स्पष्ट कर दिया कि हिंदी भारत की सीमाओं से बाहर भी जीवंत, प्रासंगिक और प्रभावशाली भाषा है। इसके बाद हिंदी का वैश्विक आंदो लन और तेज हुआ। वर्ष 2006 में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने 10 जनवरी को औपचारिक रूप से विश्व हिंदी दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की।
तब से लेकर आज तक भारत के सभी दूतावासों, अंतर राष्ट्रीय संस्थानों विश्वविद्यालयों और प्रवासी भारतीय समुदायों में यह दिवस पूरे सम्मान के साथ मनाया जाता है।
साथियों बात अगर हम संवै धानिक वैचारिक डिजिटल और तकनीकी दृष्टिकोण से हिंदी भाषा की स्थिति को सम झने की करें तो, संविधान सभा द्वारा 14 सितंबर 1949 को हिंदी को भारत की आ धिकारिक भाषा के रूप में स्वीकार किया जाना केवल एक प्रशासनिक निर्णयनहीं था बल्कि यह औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति और रा ष्ट्रीय अस्मिता की पुनर्स्थापना का प्रतीक था।
भारतीय संविधान के अनु च्छेद 343 से 351 तक हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को संरक्षण और संवर्धन का दायित्व सौंपा गया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि भाषा केवल संप्रेषण का साधन नहीं, बल्कि लोकतंत्र, समानता और जनभागीदारी की रीढ़ है। स्व तंत्रता के 75 वर्षों बाद भी यदि हिंदी को बोलना या अप नाना हीनता से जोड़ा जाए, तो यह वैचारिक गुलामी का संकेत है। सच्ची स्वतंत्रता तभी पूर्ण होगी जब शासन, शिक्षा और समाज में हिंदी को सम्मान, अवसर और आत्मविश्वास के साथ स्वीकार किया जाए।
डिजिटल युग में हिंदी ने यह सिद्ध कर दिया है कि वह केवल साहित्य या परंपरा की भाषा नहीं, बल्कि भविष्य की तकनीक की भी सक्षम भाषा है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मशीन लर्निंग, वॉइस असिस्टेंट, आटो-ट्रांसलेशन सोशल मी डिया और डिजिटल पत्रकारिता में हिंदी की उपस्थिति निरंतर बढ़ रही है। आज करोड़ों लोग इंटरनेट पर हिंदी में खोज करते हैं, कंटेंट बनाते हैं और संवाद स्थापित करते हैं, जि ससे डिजिटल समावेशन संभव हो रहा है। विश्व हिंदी दिवस का मूल उद्देश्य यही है कि हिंदी को तकनीक-विरोधी नहीं, बल्कि तकनीक-सहयोगी भाषा के रूप में स्थापित किया जाए, जो पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के बीच एक सशक्त सेतु बन सके।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इस का विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि हिंदी का भविष्य हमारी जिम्मेदारी हैं हिंदी दिवस और विश्व हिंदी दिवस केवल औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि आत्ममंथन और संकल्प के अवसर हैं। हिंदी का भविष्य किसी सरकारी आदेश से नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना और व्यवहार से तय होगा।
यदि हम- हिंदी में सोचें, हिंदी में गर्व महसूस करें हिंदी को आधुनिक, तकनीकी और वैश्विक बनाएं तो हिंदी न केवल भारत की आत्मा बनी रहेगी, बल्कि विश्व संवाद की सशक्त भाषा के रूप में भी स्थापित होगी। हिंदी केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि भविष्य की संभावना है। आइए, हिंदी को सम्मान नहीं, अधिकार दें।

ताजा खबरें