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अब सिर्फ सरकारी शिक्षक ही नहीं ! जनगणना 2027 में प्राइवेट स्कूल, बैंक और कंपनियों तक पहुंची ड्यूटी की आंच-केंद्र के नए फैसले ने खोले नियुक्ति के नए रास्ते – हरियाणा हाईकोर्ट के मामले ने बढ़ाई पूरे देश की नजर

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट्र)।
वैश्विक स्तरपर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की भारत सरकार के गृह मंत्रालय के अंतर्गत भारत के महारजिस्ट्रार एवं जनगणना आयुक्त कार्या लय ने 16 अक्टूबर 2026 को अधिसूचना संख्या जी.एस.आर 896(ई) जारी की। इसके मा ध्यम से जनगणना नियम, 19 90 के नियम 3 की तालिका में क्रम संख्या 5 के अंतर्गत प्रगणकों की नियुक्ति से संबं धित प्रविष्टियों को प्रतिस्था पित किया गया है।
अधिसूचना जनगणना अद्दि नियम, 1948 की धारा 18(1) के तहत जारी की गई है और राजपत्र में प्रकाशन की तारीख से प्रभावी हुई। इस आधिकारिक अधिसूचना से नि यमों में बड़ा बदलाव व दायरा हुआ व्यापक हुआ है इसका सीधा अर्थ है कि जनगणना कार्य के लिए उपयुक्त व्यक्ति यों की नियुक्ति का दायरा अब सरकारी शिक्षकों और सीमित सरकारी कर्मचारियों तक ही सैद्धांतिक रूप से सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसमें निजी शिक्षण संस्थानों और विभिन्न सरकारी एवं गैर-सरकारी प्रतिष्ठानों से जुड़े पात्र व्यक्तियों को भी शामिल किया जा सकता है।
मैं एडवोकेट किशन सनमु खदास भावनानी गोंदिया महा राष्ट्र बताना चाहूंगा कि यह बदलाव प्रशासनिक दृष्टि से इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जनगणना देश की आबादी, आवास, सामाजिक संरचना और विकास संबंधी योजना- निर्माण के लिए अत्यंत महत्व पूर्ण राष्ट्रीय अभ्यास है। इसके लिए बड़ी संख्या में प्रशिक्षित और जिम्मेदार कर्मचारियों की आवश्यकता होती है।सरकार ने नियुक्ति के लिए उपलब्ध मानव संसाधन का दायरा बढ़ा कर एक ऐसा कानूनी ढांचा बनाया है, जिसके अंतर्गत रा ज्य सरकारें और केंद्रशासित प्रदेश प्रशासन आवश्यकता तथा उपयुक्तता के आधार पर व्यापक वर्ग से प्रगणकों का चयन कर सकते हैं। हालांकि, अधिसूचना का अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक निजी शिक्षक, बैंक कर्मचारी या कंपनी कर्म चारी को स्वतः जनगणना ड्यू टी पर लगा दिया गया है। वास्तविक नियुक्ति संबंधित प्रशासन के निर्णय, लागू प्रक्रि या और जारी किए जाने वाले आदेशों पर निर्भर करेगी।
साथियों बात अगर हम किन-किन लोगों की लग सक ती है जनगणना ड्यूटी? इस को समझने की करें तो तीन श्रेणियों में समझिए पूरा नियम, संशोधित नियमों में पहली श्रेणी के अंतर्गत सरकारी शिक्ष ण संस्थानों, स्थानीय प्राधि करणों, सहायता प्राप्त और गैर-सहायता प्राप्त निजी संस् थाओं, सोसायटियों तथा न्या सों के किसी भी शैक्षणिक संस् थान के शिक्षकों को शामिल किया गया है। इस प्रावधान का महत्व विशेष रूप से निजी स्कूलों के संदर्भ में है, क्योंकि अब नियम में निजी सहायता प्राप्त और गैर- सहायता प्राप्त संस्थानों के शिक्षकों का स्पष्ट उल्लेख है। इसका मतलब है कि निजी स्कूलों के शिक्ष कों को प्रगणक नियुक्त करने के लिए नियमों में स्पष्ट आ धार उपलब्ध कराया गया है। यह व्यवस्था उन निजीविद्या लयों के लिए विशेष महत्व रखती है,जहां पहले इस बात पर कानूनी विवाद उठाया गया था कि क्या उनके शिक्षकों की सेवाएं जनगणना के लिए ली जा सकती हैं।
साथियों, दूसरी तथा ती सरी श्रेणी में केंद्र सरकार, राज्य सरकार, स्थानीय प्राद्दि करणों तथा विभिन्न प्रतिष्ठानों के लिपिकों और अन्य अधि कारियों को रखा गया है। इसमें सार्वजनिक क्षेत्र के उप क्रमों यानी पीएसयू, वैधानिक निकायों, बैंकों, कंपनियों, संस् थानों, सोसायटियों और न्या सों का स्पष्ट उल्लेख किया गया है। इसलिए बैंक कर्मचारी, कार्यालयों में कार्यरत बाबू, विभिन्न प्रतिष्ठानों के अधिकारी और पात्र कॉरपोरेट कर्मचारी भी नियुक्ति के संभावित दायरे में आ सकते हैं।तीसरी श्रेणी सबसे व्यापक है, जिसके अंत र्गत राज्य सरकार या केंद्रशा सित प्रदेश प्रशासन जिस व्यक्ति को प्रगणक के रूप में कार्य करने के लिए उपयुक्त समझे, उसे नियुक्त किया जा सकता है। यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर समझना जरूरी है। किसी व्यक्ति का नियमों के तहत नियुक्ति के योग्य होना और वास्तव में उसकी ड्यूटी लगा दिया जाना दो अलग- अलग बातें हैं। संशोधन पात्र ता का दायरा निर्धारित करता हैय इससे किसी खास बैंक, कंपनी या निजी स्कूल के हर कर्मचारी की ड्यूटी स्वतः अनिवार्य नहीं हो जाती। संबं धित प्रशासन को वास्तविक आवश्यकता के अनुसार चयन और नियुक्ति करनी होगी। इसी तरह, वन विभाग या किसी अन्य सरकारी विभाग के कर्म चारियों की नियुक्ति उनकी संबंधित श्रेणी और प्रशास निक निर्णय के आधार पर हो सकती है, लेकिन प्रत्येक विभाग के हर कर्मचारी की ड्यूटी लगने का कोई स्वतः निष्कर्ष इस अधिसूचना से नहीं निकलता।
साथियों बात अगर हम पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में पहुंचा था विवाद, इसको समझने की करें तो निजी स्कू लों ने उठाए थे कानूनी सवाल, इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में चल रहा मामलाहै। हरियाणा प्रोग्रेसिव स्कूल्स कान्फ्रेंस ने गैर-सहायता प्राप्त निजी स्कू लों के शिक्षकों की सेवाएं जन गणना कार्य में लेने के फैसले को चुनौती देते हुए याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क था कि जनगण ना अधिनियम, 1948 और उस के अंतर्गत बनाए गए पुराने नियमों में ऐसा पर्याप्त वैधा निक आधार नहीं है, जिसके सहारे गैर-सहायता प्राप्त निजी विद्यालयों के शिक्षकों को प्रग णक या पर्यवेक्षक के रूप में नियुक्त करने के लिए उनकी सेवाएं ली जा सकें। याचिका में जनगणना अधिनियम की धारा 4ए का भी उल्लेख किया गया। याचिकाकर्ता के अनुसार, इस धारा में जनगणना कार्य के लिए स्थानीय प्राधिकरणों के अधिकारियों और कर्मचारि यों की सेवाएं लेने का विशेष प्रावधान है, जबकि गैर- सहा यता प्राप्त निजी स्कूलों के शिक्षक स्थानीय प्राधिकरणों के कर्मचारी नहीं हैं। इसी आधार पर निजी विद्यालयों की ओर से सरकारी कार्रवाई की वैधानिकता पर सवाल उठा या गया। यह विवाद केवल शिक्षकों की ड्यूटी तक सीमित नहीं था, बल्कि इस व्यापक प्रश्न से जुड़ा था कि जनगण ना जैसे राष्ट्रीय महत्व के कार्य के लिए निजी संस्थानों के कर्मचारियों की सेवाएं लेने की कानूनी सीमाएं क्या हैं।
साथियों, उपलब्ध विवरण के अनुसार, न्यायमूर्ति हरप्रीत सिंह बराड़ ने 8 अक्टूबर 2026 को हरियाणा सरकार के उन दो पत्रों पर रोक लगाई थी, जिनके माध्यम से जनगणना ड्यूटी के लिए उपलब्ध शिक्ष कों का विवरण मांगा गया था। इसके बाद केंद्र सरकार ने 16 अक्टूबर को संशोधित निय मों की अधिसूचना जारी की। मामले की अगली सुनवाई 29 अप्रैल 2027 निर्धारित बताई गई है। हालांकि, इन घटनाओं के क्रम से यह निष्कर्ष निकाल ना उचित नहीं होगा कि संशो धन केवल न्यायालय के आदेश को निष्प्रभावी करने के लिए ही किया गया था।
अधिसूचना का घोषित कानू नी आधार जनगणना अधिनि यम की धारा 18(1) है, जबकि इसके व्यावहारिक और न्यायि क प्रभावों का आकलन संबं धित आदेशों और आगे की अदालती कार्यवाही के आधार पर ही किया जा सकता है।
साथियों बात अगर हम क्या नए नियम से हाईकोर्ट में चल रहे मामले पर पड़ेगा असर? इसको समझने की करें तो, यह प्रश्न कानूनी दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है।
केंद्र सरकार द्वारा नियमों में संशोधन किए जाने से निजी शिक्षकों की नियुक्ति के संबंध में सरकार का वैधा निक आधार पहले की तुलना में स्पष्ट हुआ है। अब संशो धित नियमों में सहायता प्राप्त और गैर-सहायता प्राप्त निजी शिक्षण संस्थानों के शिक्षकों का प्रत्यक्ष उल्लेख है। इससे भविष्य में नियुक्तियों को चुनौती दिए जाने की स्थिति में सरकार अपने पक्ष में संशो धित नियमों का हवाला दे स कती है। लेकिन किसी नियम में संशोधन हो जाने से पहले से लंबित मुकदमा स्वतः समाप् त नहीं हो जाता और न ही न्यायालय का अंतरिम आदेश अपने आप निष्प्रभावी मान लि या जाना चाहिए। इसका वास् तविक प्रभाव इस बात पर नि र्भर करेगा कि संशोधन लागू होने के बाद संबंधित प्रशासन क्या कदम उठाता है, न्याया लय के पहले के आदेश का दायरा क्या है और अदालत नए कानूनी प्रावधानों पर क्या विचार करती है। इसलिए निजी स्कूलों, शिक्षकों और प्रशासन – तीनों के लिए इस मामले की अगली सुनवाई महत्वपूर्ण होगी। यहां मूल सवाल केवल यह नहीं है कि सरकार किसे नियुक्त कर सकती है, बल्कि यह भी है कि नियुक्ति किस प्रक्रिया के तहत होगी और न्यायिक आदेशों का अनुपालन किस प्रकार सुनिश्चित किया जाएगा।
साथियों बात अगर हम जनगणना 2027- देश की आबादी से लेकर विकास की योजनाओं तक महत्वपूर्ण भूमिका को समझने की करें तो, भारत की आगामी जन गणना 2027 राष्ट्रीय स्तर पर एक विशाल प्रशासनिक अभि यान है। वर्ष 2021 में प्रस्तावित जनगणना कोविड-19 महा मारी के कारण स्थगित हो गई थी। अब इसकी प्रक्रिया दो प्रमुख चरणों में आयोजित की जानी है। पहले चरण में गृह सूचीकरण और आवास गणना के माध्यम से मकानों तथा आवासीय परिस्थितियों से संबंधित जानकारी एकत्र की जाएगी।
दूसरे चरण में जनसंख्या की गणना की जाएगी। इस व्यापक प्रक्रिया में आंकड़ों की गुणवत्ता, समयबद्धता, प्रशा सनिक समन्वय और नागरिकों के सहयोग की महत्वपूर्ण भूमि का होगी। जनगणना से प्राप्त आंकड़े सार्वजनिक नीतियों, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, परि वहन, बुनियादी सुविधाओं और विभिन्न विकास योजनाओं के निर्माण में उपयोगी होते हैं। इसी कारण प्रगणकों की नियु क्ति केवल कर्मचारियों की उप लब्धता का मामला नहीं है, बल्कि यह भी आवश्यक है कि नियुक्त व्यक्तियों को उचि त प्रशिक्षण मिले, वे निर्धारित प्रक्रिया का पालन करें और आंकड़ों की शुद्धता तथा गोपनीयता सुनिश्चित करें। लाखों परिवारों तक पहुंचने वाले इस अभियान में विभिन्न क्षेत्रों से कर्मचारियों की उप लब्धता बढ़ाना प्रशासनिक दृष्टि से उपयोगी साबित हो सकता है। दूसरी ओर, निजी संस्थानों के कर्मचारियों को इस कार्य में शामिल करते समय उनकी नियमित जिम्मे दारियों कार्य- व्यवस्था और लागू निर्देशों का बहुत समुचित ध्यान रखना भी जरूरी होगा।
साथियों बात अगर हम, 1990 के नियमों में पांचवां संशोधन अब आगे क्या? इसको समझने की करें तो आधिकारिक अधिसूचना के अनुसार, जनगणना नियम, 1990 में इससे पहले 1994, 2009, 2018 और 2022 में भी संशोधन किए गए थे। 16 अक्टूबर 2026 का संशोधन इस श्रृंखलामें पांचवां संशो द्दन है। इसके तहत नियम 3 की तालिका में क्रम संख्या 5 के अंतर्गत प्रगणकों की नियु क्ति से संबंधित प्रविष्टियों को बदला गया है। अधिसूचना के प्रभावी होने के साथ ही नियु क्ति के लिए तीन व्यापक श्रेणि यां निर्धारित हो गई हैं विभिन्न प्रकार के शिक्षण संस्थानों के शिक्षक, सरकारी तथा अन्य प्रतिष्ठानों के लिपिक और अद्दि कारी, और राज्य सरकार या केंद्रशासित प्रदेश प्रशासन द्वारा उपयुक्त समझे जाने वाले अनेक अन्य व्यक्ति।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि जनगणना नियमों में यह संशोधन देश के सबसे बड़े सांख्यिकीय अभियान के लिए मानव संसाधन जुटाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक और कानूनी कदम है। निजी स्कूलों के शिक्षक, बैंककर्मी, विभिन्न कंपनियों के अधिकारी और अन्य पात्र कर्मचारी अब प्रगणक नियुक्त किए जाने के स्पष्ट नियमगत दायरे में आ सकते हैं। फिर भी, पात्रता का अर्थ स्वतः नियुक्ति नहीं है और संशोद्दित नियमों का अर्थ यह भी नहीं कि न्यायालय में लंबित विवाद का अंतिम निर्णय हो चुका है। हरियाणा का मामला इस बात की परीक्षा बनेगा कि बदले हुए नियमों के तहतनि युक्तियों की वैधानिकता, पह ले दिए गए न्यायिक आदेशों और प्रशासनिक अधिकारों के बीच किस प्रकार संतुलन स्थापित होता है।
अब सबकी निगाहें 29 अप्रैल 2027 की प्रस्तावित सुनवाई और जनगणना ड्यूटी को लेकर आगे जारी होने वाले सरकारी निर्देशों पर रहेंगी।

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