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वैश्विक खाद्य संकट की आहट! त्योहारों से पहले चीनी की जमाखोरी पर केंद्र का कड़ा प्रहार, विदेश मंत्री की बड़ी चेतावनी,एल नीनो, महंगे उर्वरक और यु( से 2027 तक दुनियाँ की थाली पर महंगाई का खतरा!

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट्र)।
वैश्विक स्तर पर दुनिया की अर्थव्यवस्था के सामने अब एक ऐसा संकट आकार लेता दिखाई दे रहा है, जिसका सीधा संबंध प्रत्येक व्यक्ति की रसोई,भोजन की उपलब्धता और घरेलू बजट से है। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश् िचम एशिया में संघर्ष,उर्वरकों की आपूर्ति में बाधाएं, ऊर्जा बाजार की अस्थिरता और संभावित शक्तिशाली एल नीनो ने वैश्विक खाद्य सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं।इसी पृष्ठभूमि में भारत के विदेशमंत्री ने 29 सितंबर 2026 को न्यूयार्क में एशिया सोसाइटी के एक कार्यक्रम में आने वाले महीनों में बड़े खाद्य संकट की आशंका व्यक्त की। उनका संदेश स्पष्ट था कि युद्धों का प्रभाव केवल सीमाओं और सैन्य मोर्चों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि खा द्यान्न, उर्वरक, ऊर्जा और विकास शील देशों की आर्थिक स्थिरता तक पहुंचता है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह बताना चाहूंगा कि इसी वैश्विक चिंता के बीच भारत सरकार ने त्योहारों से पहले चीनी की जमाखोरी, कृत्रिम किल्लत और सट्टेबाजी रोकने के लिए स्टाक सीमा को और सख्त कर दिया है।
यह घटनाक्रम एक महत्व पूर्ण प्रश्न खड़ा करता है कि क्या आने वाले महीनों में खाद्य पदार्थों की कीमतों पर दबाव बढ़ेगा और क्या 2027 तक आम आदमी की थाली सटी कता से पहले से अधिक महंगी हो सकती है?
साथियों बात अगर हम चीनी की जमाखोरी पर केंद्र सरकार का सख्त प्रहार,15 अक्टूबर से लागू होंगे नए नियम इसको समझने की करें तो, भारत सरकार के उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग ने 1 अक्टूबर 2026 को चीनी की उपलब्धता और कीमतों कोनियंत्रित रखने के लिए सं शोधित स्टाक होल्डिंग व्यवस् था की घोषणा की इसका उद्देश्य त्योहारों के दौरान पर्या प्त आपूर्ति सुनिश्चित करना, जमाखोरी रोकना और उप भोक्ताओं के हितों की रक्षा कर ना है। नई व्यवस्था के अनु सार 15 अक्टूबर से 30 नवंबर 2026 तक चीनी व्यापारियों के लिए स्टाक रखने की अद्दि कतम अवधि 15 दिन निर्धारित की गई है। सामान्य क्षेत्रों में स्टाक सीमा 1,000 क्विंटल रखी गई है, जबकि कोलकाता तथा उसके विस्तारित महा नगरीय क्षेत्र और असम के लिए 2,000 क्विंटल की सीमा निर्धारित है। यह निर्णय आवश् यक वस्तु अधिनियम, 1955 के अंतर्गत सरकार की बाजार नियामक शक्तियों के व्यापक संदर्भ में लिया गया है।
साथियों, इससे पहले 1 सितंबर को सरकार ने 15 सि तंबर से 30 नवंबर तक व्यापा रियों की स्टॉक सीमा 4,000 क्विंटल से घटाकर 2,000 क्विंटल की थी। अब इसे और कम करके 1,000 क्विंटल करना बाजार में अनावश्यक भंडारण और कृत्रिम मूल्यवृद्धि पर नियंत्रण की दिशा में मह त्वपूर्ण कदम है। सरकार की ओर से उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार अगस्त की तुलना में चीनी की खुदरा कीमत लगभग 15 प्रतिशत और एक्स-मिल कीमत करीब 28 प्रतिशत कम हुई है। इस का अर्थ यह है कि सरकार केवल कीमतों में वृद्धि रोकने का प्रयास नहीं कर रही, बल्कि मिलों से लेकर व्यापारियों और अंतिम उपभोक्ताओं तक मूल्य लाभ पहुंचाने पर भी जोर दे रही है।
साथियों बात अगर हम भारत के विदेशमंत्री की चेता वनी- दुनिया के सामने खाद्य संकट का नया मोर्चा को सम झने की करें तो उन्होंने न्यू यार्क में एशिया सोसाइटी के कार्यक्रम में कहा कि यूक्रेन और पश्चिम एशिया के संघर्षों के कारण खाद्यान्न तथा उर्व रकों की आपूर्ति पर गंभीर द बाव बन रहा है। उनके अनुसार ऊर्जा, खाद्य, उर्वरक और वित्ती य चुनौतियों का संयुक्त प्रभाव वैश्विक दक्षिण के देशों के लिए अत्यंत तनावपूर्ण स्थिति पैदा कर रहा है। इस चेतावनी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि खाद्य संकट केवल अनाज की वास्तविक कमी से पैदा नहीं होता। यदि किसानों को समय पर उर्वरक नहीं मिलता, सिंचाई महंगी हो जाती है, परिवहन लागत बढ़ती है और अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्ग बाद्दि त होते हैं, तो पर्याप्त उत्पादन होने के बावजूद बाजार में कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं। रूस और यूक्रेन वैश्विक अनाज व्यापार के महत्वपूर्ण हिस्सेदार हैं। काला सागर क्षेत्र में युद्धजनित बाधाएं गेहूं, मक्का और अन्य कृषि उत्पादों की आपूर्ति को प्रभावित कर सकती हैं। दूसरी ओर पश्चिम एशिया का संघर्ष ऊर्जा और उर्वरक आपूर्ति के लिए जो खिम पैदा करता है। विशेष कर होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यवधान का प्रभाव ऊर्जा बा जार के साथ उर्वरक उत्पादन और समुद्री परिवहन लागत पर भी पड़ सकता है।एल नीनो का बढ़ता खतरा- 2027 तक 4.9 करोड़ अतिरिक्त लोग खाद्य असुरक्षा की चपेट में, वैश्विक खाद्य संकट की आशंका को और गंभीर बना रहा है जल वायु परिवर्तन से जुड़ा एल नीनो। संयुक्त राष्ट्र के विश्व खाद्य कार्यक्रम ने 5 अगस्त 2026 को जारी अपने विश्लेषण में चेतावनी दी कि 2026-27 का एल नीनो कई संवेदनशील देशों में खाद्य असुरक्षा को सटी कता से बढ़ा सकता है।
साथियों डब्ल्यूएफपी के आकलन के अनुसार 45 खाद्य – असुरक्षित देशों में 2027 के अंत तक लगभग 27.4 क रोड़ लोग तीव्र खाद्य असुरक्षा का सामना कर सकते हैं। यह वर्तमान अनुमान की तुलना में करीब 4.9 करोड़ अधिक लोगों का संभावित संकट है। एल नीनो प्रशांत महासागर के तापमान में बदलाव से जुड़ी जलवायु घटना है, जो दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में वर्षा और तापमान के सामान्य स्वरूप को प्रभावित कर सकती है। कहीं सूखा, कहीं अत्यधिक वर्षा और कहीं बाढ़ कृषि उत्पा दन को नुकसान पहुंचा सकती है। यदि प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में फसलें प्रभावित होती हैं, तो वैश्विक बाजार में अनाज की उपलब्धता और कीमतों पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है। फिर भी हालांकि यह आंकड़ा 45 संवेदनशील देशों के लिए है, इसे भारत में 4.9 करोड़ अतिरिक्त लोगों के खाद्य संक ट का अनुमान नहीं समझना चाहिए। भारत पर प्रभाव का आकलन घरेलू उत्पादन, मान सून, भंडार और आयात लागत के आधार पर अलगसे करना होगा। साथियों बात अगर हम भारत पर कितना असर? खाद्य महंगाई के आंकड़े पहले ही दे रहे हैं संकेत इसको सम झने की करें तो, भारत के लिए यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश की विशाल आबादी का घरेलू बजट खाद्य पदार्थों की कीमतों से सीधे प्रभावित होता है। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रा लय द्वारा 14 सितंबर 2026 को जारी आंकड़ों के अनुसार अगस्त 2026 में भारत की खाद्य महंगाई 5.95 प्रतिशत रही, जबकि जुलाई में यह 5.52 प्रतिशत थी। इसी अवधि में सामान्य खुदरा महंगाई 4.82 प्रतिशत दर्ज की गई। यह वृद्धि अपने आप में देशव्यापी खाद्य संकट का प्रमाण नहीं है, लेकिन यह बताती है कि घरेलू कीमतों पर दबाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। भारत की स्थिति में एक सकारात्मक पक्ष यह है कि देश के पास व्यापक कृषि उत्पादन क्षमता, सार्वजनिक खाद्यान्न भंडारण, न्यूनतम सम र्थन मूल्य व्यवस्था और सार्वज निक वितरण प्रणाली जैसे सुर क्षा उपाय उपलब्ध हैं। इसलिए वैश्विक संकट का प्रभाव भारत में अनिवार्य रूप से खाद्यान्न की भौतिक कमी के रूप में सामने आए, ऐसा मानना उचि त नहीं होगा। फिर भी उर्वरकों की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में वृद्धि, डीजल और परिवहन लागत, आयातित खाद्य तेलों की कीमत तथा प्रतिकूल मान सून का संयुक्त प्रभाव किसानों की उत्पादन लागत और उप भोक्ताओं के खर्च को सटीकता से बढ़ा सकता है।
साथियों बात अगर हम क्या 2027 तक महंगी हो जा एगी आम आदमी की थाली? इसको समझने की करें तो, आने वाले समय में खाद्य महं गाई का सबसे बड़ा खतरा किसी एक वस्तु की कीमत बढ़ने से नहीं, बल्कि कई लागतों के एक साथ बढ़ने से उत्पन्न हो सकता है। गेहूं, चावल, दालें, खाद्य तेल, दूध और सब् िजयों की कीमतें अलग-अलग कारणों से प्रभावित होती हैं। उर्वरक महंगा होने पर खेती की लागत बढ़ती है, ऊर्जा महंगी होने पर सिंचाई और परिवहन प्रभावित होते हैं तथा मौसम की प्रतिकूलता उत्पादन को कमजोर कर सकती है। इसलिए 2027 तक भोजन महंगा होने की आशंका को गंभीरता से लेना चाहिए, लेकि न इसे निश्चित मूल्यवृद्धि या अनिवार्य खाद्य संकट के रूप में प्रस्तुत करना वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं होगा।
वास्तविक प्रभाव मानसून, फसल उत्पादन, वैश्विक संघर्षों की अवधि और सरकारों की नीतिगत तैयारियों पर निर्भर करेगा भारत सरकार के लिए आवश्यक होगा कि वह चीनी जैसी आवश्यक वस्तुओं में स्टाक की निगरानी के साथ – साथ उर्वरक उपलब्धता, खाद्यान्न भंडार, आयात -निर्या त नीति और सार्वजनिक वितरण प्रणाली को भी मज बूत बनाए। राज्यों को जमाखोरी और कालाबाजारी पर निगरा नी बढ़ानी होगी, जबकि किसानों को समय पर कृषि आदान उपलब्ध कराना अधि क प्राथमिकता होनी चाहिए।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि खाद्य सुरक्षा अब केवल कृषि नहीं, राष्ट्रीय आ र्थिक सुरक्षा का प्रश्नवर्तमान परिस्थितियां स्पष्ट संकेत दे रही हैं कि 21वीं सदी में खाद्य सुरक्षा का संबंध केवल खेतों में होने वाले उत्पादन से नहीं, बल्कि वैश्विक कूटनीति, युद्ध, ऊर्जा, जलवायु और व्यापारिक स्थिरता से भी गहराई से जुड़ चुका है। त्योहारों से पहले ची नी की स्टाक सीमा घटाने का केंद्र सरकार का निर्णय उपभो क्ता हितों की रक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। वहीं जयशंकर की चेतावनी और डब्ल्यूएफपी के एल नीनो संबं धी अनुमान दुनिया को समय रहते तैयारी करने का संदेश देते हैं। भारत के सामने चुनौ ती केवल खाद्यान्न उपलब्ध रखने की नहीं, बल्कि उसे उचित कीमत पर प्रत्येक नाग रिक तक पहुंचाने की भी है। क्योंकि किसी देश की आर्थिक मजबूती का वास्तविक मूल्यां कन केवल उसके सकल घरेलू उत्पाद, विदेशी मुद्रा भंडार या शेयर बाजार से नहीं, बल्कि इस बात से भी होता है कि आम नागरिक की थाली कित नी सुरक्षित, सुलभ और किफा यती है। विकसित भारत / 2047 की दिशा में खाद्य सुर क्षा को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना समय की मांग है, क्योंकि भूख और महंगाई से सुरक्षित नागरिक ही मजबूत अर्थव्यवस्था तथा स्थिर राष्ट्र की वास्तविक नींव होते हैं।

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