एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट्र)।
वैश्विक स्तर पर लोकतां त्रिक व्यवस्था में सत्ता और स्वतंत्र पत्रकारिता के बीच संबंध केवल समाचार देने और लेने तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह नागरिकों के सूच ना के अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शासन की जवाबदेही से सीधे जुड़ा होता है। भारत सहित अनेक लोक तांत्रिक देशों में समाचार मा ध्यमों को लोकतंत्र के चैथे स्तंभ के रूप में देखा जाता है। मैं एडवोकेट किशन सन मुखदास भावनानी गोंदिया म हाराष्ट्र यह मानता हूं कि वैश्विक पटल पर लोकतंत्र, मानवाधिकार और सूचना के अधिकार का अटूट संबंध अंतर राष्ट्रीय समाज में मानवाधि कारों की रक्षा और लोकतां त्रिक मूल्यों का संरक्षण किसी भी सभ्य राष्ट्र की पहली पह चान माना जाता है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा स्वीकृत सार्वभौमिक घोषणापत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि प्रत्येक व्यक्ति को अभिव्यक्ति, विचार और बिना किसी डर के सूचना प्राप्त करने का जन्मसिद्ध अ धिकार है। इस अधिकार को जमीन पर उतारने का सबसे बड़ा जिम्मा सूचना तंत्र और समाचार माध्यमों के कंधों पर होता है। जब तक नागरिकों तक निष्पक्ष पारदर्शी और स टीक जानकारियां नहीं पहुंचें गी, तब तक वे अपने अधिका रों के प्रति न तो सजग हो सकते हैं और न ही किसी दमनकारी व्यवस्था के खिला फ आवाज उठा सकते हैं।
यही कारण है कि स्वतंत्र जनसंचार को किसी भी लोक तांत्रिक देश का चैथा स्तंभ स्वीकार किया गया है, जो कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के समानांतर समाज में संतुलन और शुचि ता बनाए रखने का काम कर ता है। वैश्विक स्तर पर जब भी शासन प्रशासन द्वारा सूच ना तंत्र को नियंत्रित करने या उसकी आवाज दबाने का प्रया स किया जाता है, तो वह सीधे तौर पर आम जनता के मौलिक अधिकारों पर आघात होता है। इसी अंतरराष्ट्रीय पृष्ठभूमि में वर्तमान परिदृश्य में अमेरिका जैसे सबसे पुराने लोकतंत्र में सरकार और मुख्य धारा के समाचार माध्यमों के बीच उपजा महायुद्ध इस बात का ज्वलंत उदाहरण है।
अमेरिका में राष्ट्रपति डो नाल्ड ट्रंप और प्रमुख समाचार संस्थानों के बीच सितंबर 2026 में पैदा हुआ विवाद पूरी दुनियाँ का ध्यान खींच रहा है।
उपलब्ध ताजा सूचनाओं के अनुसार 18 सितंबर को ट्रंप ने सीएनएन एमएस नाउ और पोलिटिको को व्हाइट हाउस से प्रतिबंधित करने की घोषणा की और उन पर ऐसी खबरें प्रकाशित करने का आरोप लगाया जिन्हें वे झूठी या मनगढ़ंत मानते हैं। इसके बाद 19 सितंबर को इन संस्थानों के पत्रकारों को व्हाइट हाउस में प्रवेश से रोका गया और उनके प्रवेश- पत्र निष्क्रिय किए गए।
यह ध्यान रखना आवश्य क है कि यह केवल सामान्य समाचार- विवाद नहीं रहा, मामला अब सीधे संवैधानिक अधिकारों और सरकारी प्रेस- पहुंच के प्रश्न में बदल चुका है।यह आर्टिकल मीडिया में आई जानकारी के अनुसार बनाया गया है।
साथियों, विवाद का अग ला महत्वपूर्ण चरण 21 सितंबर को सामने आया,जब राष्ट्रपति के समाचार-संग्रह के लिए काम करने वाले प्रमुख दूरद र्शन समाचार समूहों की साझा व्यवस्था रुक गई। इस व्यवस् था में एबीसी, सीबीएस सीएन एन, फाक्स और एनबीसी बारी -बारी से राष्ट्रपति के कार्यक्र मों की दृश्य सामग्री तैयार कर के अन्य समाचार संस्थानों को उपलब्ध कराते हैं।
सीएनएन पहले ही प्रतिबं धित था, जबकि शेष प्रमुख समूहों ने साझा समाचार -सा मग्री उपलब्ध कराने वाली इस व्यवस्था को रोक दिया। इसलिए इसे शाब्दिक अर्थ में पांचों संस्थानों द्वारा समान प्रकार का बहिष्कार कहना पूरी तरह सटीक नहीं होगा। अधिक सही स्थिति यह है कि सीएनएन पर सरकारी प्रति बंध के बाद साझा दूरदर्शन समाचार व्यवस्था ही ठप हो गई। इस घटनाक्रम का महत्व इसलिए बढ़ गया क्योंकि राष् ट्रपति के विदेश और देश के भीतर होने वाले कार्यक्रमों की प्रत्यक्ष समाचार-सामग्री उपलब्ध कराने की पारंपरिक व्यवस्था प्रभावित हुई।
साथियों, इसी बीच व्हा इट हाउस ने 21 सितंबर को “ट्रंप टीवी – द एसेंशियल्स स्टेशन” नाम से चैबीसों घंटे चलने वाला डिजिटल प्रसारण मंच शुरू किया। आधिकारिक व्हाइट हाउस अभिलेख में इसके आरंभ की तारीख 21 सितंबर दर्ज है। यह पारंपरिक दूरदर्शन चैनल की बजाय इंट रनेट आधारित प्रसारण व्यव स्था है, जिसमें राष्ट्रपति के भाषणों, प्रशासनिक कार्यक्रमों घोषणाओं और पुराने महत्वपूर्ण दृश्यों को सीधे जनता तक पहुंचाया जा रहा है। समाचार रिपोर्टों के अनुसार इसमें ट्रंप के पुराने भाषणों और प्रशासन से जुड़े कार्यक्रमों की सामग्री दिखाई गई है। इसका मूल महत्व यह है कि जब स्वतंत्र समाचार संस्थानों और सर कार के बीच प्रत्यक्ष संवाद का रास्ता बाधित हुआ, तब सरकार ने जनता तक अपनी सामग्री पहुंचाने के लिए सटी कता से अपना सीधा माध्यम खड़ा कर दिया।
साथियों, यहीं से विवाद का सबसे गंभीर लोकतांत्रिक प्रश्न सामने आता है, क्या सरकार आलोचनात्मक पत्र कारिता से असहमति के आ धार पर किसी समाचार संस् थान की पहुंच रोक सकती है। अमेरिकी संविधान के प्रथ म संशोधन में अभिव्यक्ति और प्रेस की स्वतंत्रता को विशेष संरक्षण प्राप्त है। हालांकि व्हा इट हाउस का तर्क है कि राष्ट्रपति भवन में प्रवेश कोई पूर्ण अधिकार नहीं बल्कि प्रशा सन द्वारा नियंत्रित सुविधा है और सरकार को सुरक्षा तथा प्रशासनिक कारणों से पहुंच नियंत्रित करने का अधिकार है। दूसरी ओर प्रतिबंधित समा चार संस्थानों का कहना है कि उनकी पहुंच उनके समा चारों की विषयवस्तु के कारण छीनी गई और यह प्रथम संशोधन तथा उचित कानूनी प्रक्रिया के अधिकार का उल्लं घन है। 23 सितंबर 2026 को संघीय न्यायालय में इसी वि वाद पर तत्काल राहत संबं धी सुनवाई निर्धारित की गई है। कानूनी दृष्टि से संभावित न्यायिक निर्णय कई बातों पर निर्भर करेगा। न्यायालय यह देख सकता है कि व्हाइट हाउस ने प्रवेश प्रतिबंध लगाने के लिए कोई स्पष्ट, समान और विषय- वस्तु से स्वतंत्र नियम लागू किया था या प्रतिबंध आलोचनात्मक समा चारों के कारण लगाया गया। न्यायालय यह भी देख सकता है कि पत्रकारों के प्रवेश- पत्र अचानक निष्क्रिय करने से उचित कानूनी प्रक्रिया के अधिकार प्रभावित हुए या नहीं। विशेष रूप से महत्वपूर्ण यह प्रश्न है कि जिस स्थान को सरकार ने सामान्य समा चार -संग्रह के लिए प्रेस के लिए खोला है, वहां किसी संस् थान को उसके विचार या समाचार -सामग्री के आधार पर अलग करना संवैधानिक रूप से कितना उचित है। पूर्व में न्यायालयों ने प्रेस-पहुंच से जुड़े मामलों में यह अंतर किया है कि सीमित, सुरक्षा- आधारित स्थानों पर सरकार का नियंत्रण अधिक हो सकता है, लेकिन सामान्य रूप से खुले प्रेस क्षेत्र में विचार के आधार पर भेदभाव अलग संवै धानिक प्रश्न पैदा करता है।
साथियों, इस मामले में न्यायालय के सामने दूसरा मह त्वपूर्ण पहलू यह भी होगा कि क्या सरकार का दावा कि समाचार संस्थान गलत सूच ना फैला रहे थे, किसी ठोस और कानूनन मान्य आधार से समर्थित है। केवल किसी समाचार की आलोचना या उससे राजनीतिक असहमति और वास्तविक सुरक्षा- जोखि म दो अलग- अलग कानूनी परिस्थितियां हैं। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों में भी अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध के लिए कानून, वैध उद्देश्य, आवश्य कता और अनुपातिकता की कसौटियां महत्वपूर्ण मानी गई हैं। इसलिए भविष्य का न्यायि क निर्णय केवल पत्रकारों के प्रवेश का प्रश्न नहीं रहेगा, ब ल्कि यह भी स्पष्ट कर सकता है कि लोकतांत्रिक शासन और स्वतंत्र पत्रकारिता के बीच संवैधानिक सीमा कहां खींची जाए। दिलचस्प बात यह है कि विवाद के बीच सीएनएन, एमएस नाउ और पोलिटिको ने संयुक्त रूप से न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। उन्होंने प्रतिबंध को प्रथम संशोधन के विरुद्ध बताते हुए तत्काल पहुंच बहाल करने की मांग की है। वहीं ट्रंप प्रशा सन ने न्यायालय में यह पक्ष रखा है कि व्हाइट हाउस तक पहुंच को अधिकार के बजाय विशेष सुविधा माना जाना चाहिए। ट्रंप ने 22 सितंबर को यह भी संकेत दिया कि यदि न्यायालय उनके निर्णय के विरुद्ध फैसला देता है तो वे प्रतिबंधित पत्रकारों को वा पस प्रवेश देने की संभावना पर विचार करेंगे। अर्थात अंति म स्थिति अभी न्यायिक प्रक्रिया पर सटीकता से निर्भर है।
साथियों, इस पूरे घटना क्रम का सबसे बड़ा अंतरराष् ट्रीय संदेश यही है कि मानवा धिकार अभिव्यक्ति की स्वतं त्रता, स्वतंत्र पत्रकारिता और नागरिकों के सूचना- अधि कार अलग-अलग विषय नहीं बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की परस्पर जुड़ी हुई कड़ियां हैं। सरकार को अपनी नीति यां जनता तक पहुंचाने का अधिकार है, लेकिन लोकतंत्र में जनता को सरकार के दावों की स्वतंत्र जांच, आलोचना और वैकल्पिक जानकारी प्राप्त करने का अवसर भी आवश्यक है। दूसरी ओर पत्रकारिता की स्वतंत्रता का अर्थ यह भी नहीं कि समाचार संस्थान तथ्यात् मक जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते हैं। स्वतंत्रता के साथ सत्यापन निष्पक्षता और सार्व जनिक उत्तरदायित्व भी जुड़े हैं। अमेरिका में वर्तमान टकराव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां प्रश्न केवल ट्रंप और तीन समाचार संस्थानों का नहीं रह गया है।
प्रश्न यह है कि सत्ता की आलोचना करने वाले पत्रका रों की सरकारी संस्थानों तक पहुंच किस आधार पर निर्धा रित होगी, सरकार अपनी जानकारी सीधे जनता तक किस सीमा तक पहुंचा सक ती है और स्वतंत्र पत्रकारिता तथा प्रशासनिक नियंत्रण के बीच संवैधानिक संतुलन कैसे कायम रहेगा। 23 सितंबर की न्यायिक सुनवाई इस विवाद की अगली महत्वपूर्ण कड़ी है, लेकिन अंतिम संवैधानिक स्थिति आगे की न्यायिकनं प्रक्रिया से ही सटीकता से स्पष्ट होगी।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि लोकतंत्र की वास्त विक शक्ति केवल चुनाव में नहीं, बल्कि उस वातावरण में भी दिखाई देती है जिसमें नागरिकों को सत्ता के पक्ष और उसके आलोचकों,दोनों से तथ्य प्राप्त करने की स्वतं त्रता हो। सरकार का अपना सूचना माध्यम होना अपने आप में असंवैधानिक सिद्ध नहीं होता, और किसी समाचार संस्थान की प्रत्येक सरकारी पहुंच भी स्वतः असीमित अ धिकार नहीं बन जातीय लेकि न जब प्रेस- पहुंच और समा चार की विषय वस्तु के बीच सीधा संबंध स्थापित होने का आरोप सामने आए, तब संवै धानिक न्यायालय की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। अमेरिका का यह विवाद इसी व्यापक प्रश्न को सामने ला रहा है कि लोकतंत्र में सत्ता कितनी शक्तिशाली हो सकती है और स्वतंत्र सूचना- व्यवस्था कितनी स्वतंत्र रहनी चाहिए, इसकी अंतिम सीमा कानून,संविधान और न्यायिक समीक्षा ही निर्धारित करते हैं।
ट्रंप बनाम मीडिया – अमेरिका में छिड़ी प्रेस स्वतंत्रता की सबसे बड़ी जंग – प्रतिबंध, बहिष्कार और ‘ट्रंप टीवी’ से लोकतंत्र पर उठे गंभीर सवाल
