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यूपीआई पर 2,000 रू0 की सीमा के बाद क्यों मचा राजनीतिक घमासान- सरकार का तर्क, विपक्ष का आरोप और आम जनता की जेब पर संभावित असर

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट)।
वैश्विक स्तरपर आज भारत में यूपीआई (मोबाइल से भुगतान) केवल भुगतान का माध्यम नहीं, बल्कि आम आदमी की रोजमर्रा की जिं दगी का हिस्सा बन चुका है। चाय की दुकान से लेकर बड़े शापिंग माल तक, सब्जी वाले से लेकर आनलाइन खरीदारी तक मोबाइल से कुछ सेकंड में भुगतान करना सामान्य बात हो गई है। ऐसे समय में केंद्र सरकार की 14 सितंबर 2026 की केंद्रीय वित्त मंत्रा लय की नई अधिसूचना ने यूपीआई के भविष्य को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है।
सरकार ने स्पष्ट किया है कि 2,000 रूपए तक के यूपीआई भुगतान और रूपे डेबिट कार्ड भुगतान पर बैंक या पेमेंट सिस्टम प्रदातासीधे या अप्रत्यक्ष रूप से कोई शुल्क नहीं लगा सकते। लेकिन 2,000 रूपए से अधिक के कुछ व्यापारी भुगतान के लिए भविष्य में मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर लगाए जाने की कानूनी संभावना अब खुल गई है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र बताना चाहूंगा कि पहले समझिए, असल में सरकार ने किया क्या है?इसे बहुत आसान उदाह रण से समझिए। मान लीजिए आपने किसी दुकानदार को 2000 रूपए यूपीआई से दिए। इसपर अभी कोई शुल्क नहीं लगाया जा सकता। लेकिन यदि आपने किसी व्यापारी को 5,000 रूपए का भुगतान किया तो नई अधिसूचना यह नहीं कहती कि आज से आपसे 25 रूपए शुल्क लिया जाए गा। ऐसा कोई 0.5 प्रतिशत शुल्क अभी तय नहीं किया गया है। असल बदलाव यह है कि पहले यूपीआई पर शुल्क लगाने की मनाही का दायरा व्यापक था, जबकि नई व्यवस्था में 2,000 रूपए तक के भुगतान को स्पष्ट रूप से शुल्क-मुक्त सुरक्षा दी गई है।इससे 2,000 से ऊपर के मर्चेंट ट्रांसक्शयंस पर भविष्य में एमडीआर निर्धारित करने का रास्ता खुला है। अभी दर क्या होगी, कब से होगी और किन कारोबारों पर होगी,यह अलग प्रक्रिया में सटीकता से तय होना है।
साथियों बात अगर हम एमडीआर आखिर होता क्या है? इसको समझने की करें तो मर्चेंट डिस्काउंट रेट को आसान भाषा में दुकानदार से लिया जाने वाला डिजिटल भुगतान का सेवा-शुल्क सम झिए। उदाहरण के लिए, मान लीजिए किसी भविष्य की व्य वस्था में किसी व्यापारी के 10,000 रूपए के डिजिटल भुगतान पर 0.5 प्रतिशत एम डीआर तय होता है। तब शुल्क 50 रूपए होगा। इसका मतलब यह नहीं कि ग्राहक के यूपीआई ऐप से सरकार सीधे 50 रूपए काट लेगी।
शुल्क भुगतान व्यवस्था में शामिल संबंधित पक्षों के बीच लागू होगा। यहीं से विवा द पैदा होता है। सरकार कहती है कि ग्राहक से सीधे कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा, लेकिन विपक्ष का सवाल है कि यदि दुकानदार को डिजिटल भुग तान स्वीकार करने के लिए खर्च करना पड़ेगा तो वह खर्च अंततः कैसे निकलेगा? दुकान दार चाहे तो अपने कारोबार की लागत में इसे शामिल कर सकता है और वस्तु या सेवा की कीमत बढ़ा सकता है। अर्थात ग्राहक को अलग से यूपीआई शुल्क दिखाई न दे, लेकिन यदि व्यापारी ने लागत कीमत में जोड़ दी तो अप्रत्यक्ष रूप से उसका बोझ ग्राहक तक पहुंच सकता है।
यह विपक्ष की मुख्य चिंता है,हालांकि यह अभी संभावित प्रभाव है,कोई सटीकता से लागू उपभोक्ता शुल्क नहीं।
साथियों बात अगर हम फिर राजनीतिक घमासान क्यों शुरू हुआ? इसको समझने की करें तो, यही सबसे बड़ा सवाल है? मुख्य पक्षी पार्टी के युवा नेता ने आरोप लगाया है कि सरकार ने चुपचाप यूपी आई पर शुल्क लगाने का रास्ता खोल दिया है। उनका तर्क है कि 2,000 से अधिक के व्यापारी यूपीआई भुगतान संख्या में कम हो सकते हैं, लेकिन कुल लेन-देन मूल्य में उनका हिस्सा बहुत बड़ा है। इसलिए यदि भविष्य में इन पर एमडीआर लगाया गया तो उसका आर्थिक प्रभाव मह त्वपूर्ण हो सकता है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि दुका नदार पर लगने वाला खर्च आखिरकार ग्राहक तक पहुंच सकता है। उन्होंने इससे आगे बढ़कर अमेरिकी भुगतान कंप नियों के दबाव का आरोप भी लगाया है। उनका दावा है कि अमेरिका की कुछ भुगतान कंपनियां भारत की जीरो – एमडीआर व्यवस्था का लंबे समय से विरोध करती रही हैं और सरकार अब उसी दिशा में आगे बढ़ रही है। उन्होंने इसे अमेरिकी दबाव के सामने सरकार के झुकने से जोड़कर राजनीतिक हम ला किया है। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य समझना जरूरी है, अमेरिकी दबाव वाला आरोप विपक्ष का राज नीतिक आरोप है इसे सरकार द्वारा स्वीकार किया गया तथ्य नहीं माना जा सकता।
साथियों बात अगर हम सरकार का जवाब क्या है? इसको समझने की करें तो सरकार और सत्ताधारी पार्टी की ओर से कहा गया है कि मुख्य विपक्षी पार्टी ने इस मुद्दे को गलत तरीके से पेश किया है।सत्ताधारी पार्टी मीडिया प्रभारी ने विशेष रूप से उस दावे को खारिज किया है कि 2,000 से ऊपर के यूपी आई भुगतान पर तत्काल 0.5 प्रतिशत टैक्स या शुल्क लगा दिया गया है। उनके अनुसार, 5,000 पर 25 और 10,000 पर 50 वसूलने की गणना किसी सरकारी शुल्क – सूची से नहीं, बल्कि काल्प निक 0.5 प्रतिशत दर मानकर की गई है। अभी ऐसी दर अधिसूचित नहीं हुई है। इसके अलावा पर्सन-टू -पर्सन यानी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को यूपीआई भुगतान को व्यापारी भुगतान से अलग समझना होगा। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, नया बदलाव मुख्यतः मर्चेंट ट्रांसक्शयंस के संभा वित एमडीआर ढांचे से जुड़ा है। कानून में बदलाव को भी सरल भाषा में समझिए इस पूरे मामले की जड़ पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टमस एक्ट, 2007 में है। सरल भाषा में कहें तो यह वह कानून है जो देश की भुगतान प्रणा लियों को कानूनी और निया मकीय ढांचा देता है। हाल में इसमें बदलाव किया गया ताकि सरकार को यह स्पष्ट करने का अधिकार मिल सके कि किन इलेक्ट्रानिक भुगतान माध्यमों पर शुल्क नहीं लगाया जा सकता और किन परिस्थि तियों में शुल्कव्यवस्था बनाई जा सकती है। इसके बाद 14 सितंबर की अधिसूचना में 2,000 तक के यूपीआई और रूपए डेबिट कार्ड भुगतान को स्पष्ट रूप से शुल्क-मुक्त श्रेणी में रखा गया। अर्थात इसे ऐसे समझिए, कानून ने दर तय नहीं की है, बल्कि शुल्क व्य वस्था के लिए कानूनी दरवाजा खोला है, वास्तविक एमडीआर लागू करने के लिए आगे अलग निर्णय और नियम जरूरी होंगे।
साथियों बात अगर हम सरकार ऐसा रास्ता क्यों चा हती है? इसको समझने की करें तो सरकार का सबसे बड़ा तर्क है कि यूपीआई अब बहुत विशाल व्यवस्था बन चुका है। इसकी सुरक्षा, सर्वर, तकनीकी क्षमता,साइबर सुरक्षा, धोखा धड़ी रोकने की व्यवस्था और लगातार तकनीकी अपग्रेड पर भारी खर्च होता है। यूपीआई की वृद्धि वास्तव में अभूतपूर्व रही है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार एफवाय 2016-17 में यूपीआई का वार्षिक लेन-देन मूल्य केवल 0.07 लाख करोड़ था, जो एफवाय 2025-26 में बढ़कर लगभग 314 लाख करोड़ रूपए हो गया। इसी अवधि में वार्षिक लेन-देन संख्या 1.78 करोड़ से बढ़कर 24,162 करोड़ से अधिक हो गई। यूपीआई अब 11 देशों में भी परिचालनध्स्वीकृति के स्तर तक पहुंच चुका है।
इसलिए सरकार का तर्क है कि इतनी विशाल डिजिटल भुगतान व्यवस्था को हमेशा सरकारी प्रोत्साहन के सहारे चलाना लंबे समय में उचित नहीं होगा। एक ऐसा राजस्व माडल चाहिए जिससे भुगतान का पूरा इकोसिस्टम अधिक टिकाऊ और आत्मनिर्भर बन सके। लेकिन विपक्ष की चिंता को भी सटीकता से समझना जरूरी है, विपक्ष का सवाल सिर्फ शुल्क की राशि को लेकर नहीं है। असली चिंता यह है कि क्या आज व्यापारी पर लगने वाला खर्च कल वस्तुओं की कीमतों में दिखाई देगा? मान लीजिए किसी व्या पारी को डिजिटल भुगतान स्वी कार करने पर अतिरिक्त ला गत आती है। उसके सामने तीन रास्ते हो सकते हैं,वह खुद लागत उठाए, ग्राहक से अलग शुल्क मांगे या अपनी वस्तुध्सेवा की कीमत में लागत जोड़ दे। सरकार यदि ग्राहक से सीधे शुल्क लेने की अनु मति नहीं देती, तब भी तीसरा रास्ता आर्थिक रूप से संभव है। यही कारण है कि विपक्ष कह रहा है कि ग्राहक से शुल्क नहीं लिया जाएगा और ग्राहक पर कोई आर्थिक प्रभाव नहीं पड़ेगा इन दोनों बातों को सटीकता से एक जैसा नहीं माना जाना चाहिए।
साथियों बात अगर हम असली तस्वीर क्या है? इस को समझने की करें तो, इस पूरे विवाद को तीन वाक्यों में समझा जा सकता है। पहला, 2,000 तक का यूपीआई भुग तान अभी स्पष्ट रूप से शुल्क -मुक्त है। दूसरा 2,000 से ऊपर के मर्चेंट यूपीआई ट्रांसक् शयंस पर अभी कोई निश्चित 0.5 प्रतिशत शुल्क लागू नहीं हुआ है, लेकिन भविष्य में एम डीआर लगाने का कानूनी रास्ता खुला है।
तीसरा राजनीतिक विवाद इस संभावित एमडीआर के आर्थिक बोझ को लेकर है कि उसका भार वास्तव में व्यापारी उठाएगा या किसी रूप में अंततः ग्राहक तक पहुंचेगा। यही इस पूरे मामले का केंद्रीय प्रश्न है। सरकार के सामने चुनौती है कि यूपी आई को दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे लोकप्रिय रियल- टाइम भुगतान प्रणालियों में से एक बनाए रखते हुए उसका आर्थिक माडल भी टिकाऊ बनाया जाए। दूसरी ओर विप क्ष की चिंता है कि कहीं ग्राहक से शुल्क नहीं कहकर अप्रत्यक्ष रूप से महंगाई या वस्तुओं की कीमतों के माध्यम से उसका बोझ जनता तक न पहुंच जाए।
अतः अगर हम उपयोग पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि फिलहाल इसे यूपी आई पर शुल्क लग गया कह ना जल्दबाजी होगी। अधिक सटीक बात यह है कि सर कार ने 2,000 तक के भुगतान को स्पष्ट रूप सेशुल्क -मुक्त रखते हुए 2,000 से ऊपर के व्यापारी भुगतान पर भविष्य में एमडीआर लागू करने की कानूनी संभावना का रास्ता खोला है। अब असली परीक्षा आगे होने वाले निर्णयों की होगी, एमडीआर की दर कि तनी तय होती है, किन व्या पारियों पर लागू होती है और सबसे महत्वपूर्ण, उसका अंतिम आर्थिक बोझ कौन उठाता है। इस विवाद का सबसे महत्वपूर्ण फर्क यही है कि एमडीआर लगाने का रास्ता खुलना और एमडीआर लग जाना दो अलग बातें हैं।
अभी 2,000 से ऊपर के यूपीआई मर्चेंट ट्रांसक्शयंस पर कोई 0.5प्रतिशत शुल्क लागू नहीं हुआ है। आगे की नीति ही तय करेगी कि इस का वास्तविक प्रभाव व्यापारी, भुगतान कंपनियों और अंततः उपभोक्ता पर कितना पड़ता है।