Breaking News

पुतिन-शी की भारत यात्रा से ट्रंप तक -डालर की बादशाहत को चुनौती की साइलेंट रणनीति -डालर की धीमी विदाई
एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट)
वैश्विक स्तर पर पूरी दुनिया के देशों की अर्थव्यवस्था और वित्तीय बाजारों के मौजूदा परि दृश्य में ब्रिक्स का डीडालराइ जेशन एजेंडा दुनिया के लिए एक महत्वपूर्ण आर्थिक संकेत बनकर उभर रहा है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि ब्रिक्स की रणनीति अमेरिका और उसके राष्ट्रपति ट्रंप को खुली मुद्रा-युद्ध की चुनौती देने के बजाय कहीं अधिक शांत, व्यावहारिक और दीर्घकालिक दिखाई देती है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह बताना चाहूंगा कि यहां सबसे बड़ा सवाल साझा ब्रिक्स मुद्रा का नहीं,बल्कि उस व्यवस्था का है जिसमें अंतरराष्ट्रीय व्यापार, ऊर्जा खरीद, निवेश और भुग तान के लिए अमेरिकी डालर की अनिवार्यता धीरे-धीरे कम की जा सके। भारत, रूस, चीन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और ईरान जैसे देशों के आ र्थिक हित भले ही पूरी तरह समान न हों, लेकिन डाॅलर पर अत्यधिक निर्भरता कम करने की इच्छा कई क्षेत्रों में साझा आधार उपलब्ध कराती है। इसलिए ब्रिक्स का संदेश यह नहीं है कि डालर आज खत्म हो जाएगा, बल्कि यह है कि दुनिया के पास डालर के अलावा भी विकल्प होने चाहिए।
साथियों बात अगर कर हम साझा ब्रिक्स मुद्रा बनाम डीडाल राइजेशन -असली खेल क्या है? इसको समझने की करें तो, ब्रिक्स की साझा मुद्रा को लेकर लंबे समय से अंतरराष् ट्रीय स्तर पर चर्चाएं होती रही हैं, लेकिन साझा मुद्रा बनाना अत्यंत जटिल प्रक्रिया है। इसके लिए सदस्य देशों के बीच मौद्रिक नीति, विनिमय दर, विदेशी मुद्रा भंडार, केंद्रीय बैंक व्यवस्था, राजकोषीय अनु शासन और राजनीतिक सहम ति जैसे अनेक मुद्दों पर गहरा तालमेल आवश्यक होगा। यही कारण है कि तत्काल साझा ब्रिक्स मुद्रा लाने के बजाय स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, द्विपक्षीय भुगतान व्यवस्था और सीमा-पार वित्तीय प्रणालियों के विकास पर जोर देना अद्दि क व्यावहारिक रास्ता दिखाई देता है। यहीं से साझा मुद्रा और डीडालराइजेशन के बीच अंतर स्पष्ट होता है। डीडालरा इजेशन का अर्थ अनिवार्य रूप से डालर को समाप्त करना नहीं, बल्कि जहां संभव हो वहां डालर की आवश्यकता को कम करना है। यदि भारत और रूस ऊर्जा व्यापार का अधिक हिस्सा अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं में कर सकें, यदि ब्रिक्स देश आपसी व्यापार में वैकल् िपक भुगतान प्रणालियों का उपयोग बढ़ाएं और यदि निवेश तथा सीमा- पार भुगतान के लिए नए वित्तीय ढांचे विकसित हों, तो बिना किसी नई साझा मुद्रा के भी डालर की भूमिका कुछ क्षेत्रों में कम हो सकती है। यही रणनीति अपेक्षाकृत कम टकराव वाली और अद्दि क व्यवहारिक है।
साथियों बात अगर हम ब्रिक्स की साइलेंट डीडालरा इजेशन रणनीति -डालर को चुनौती भी, टकराव से बचाव भी इसको समझने की करें तो,ब्रिक्स की सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक विशेषता यही हो सकती है कि वह अमेरिका को सीधे चुनौती दिए बिना वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में विकल्पों का विस्तार करे।इसे साइलेंट डीडालराइजेशन कहा जा सकता है, हालांकि यह आधिकारिक ब्रिक्स शब्द नहीं, बल्कि इस प्रक्रिया को समझने का विश्लेषणात्मक तरीका है। इसमें किसी एक दिन डालर को हटाने का ऐलान नहीं होता, बल्कि छोटे-छोटे कदमों के जरिए राष्ट्रीय मुद्राओं, स्थानी य भुगतान नेटवर्क और वैक ल्पिक वित्तीय तंत्रों का उपयोग बढ़ाया जाता है। इस रणनीति का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इससे ब्रिक्स सदस्य देशों को अमेरिकी वित्तीय व्यवस्था से तत्काल पूर्ण अलगाव की आवश्यकता नहीं पड़ती।
डालर आज भी वैश्विक व्यापार, विदेशी मुद्रा भंडार, वित्तीय बाजारों और अंतररा ष्ट्रीय लेन-देन में अत्यंत मह त्वपूर्ण है। इसलिए ब्रिक्स के लिए व्यावहारिक रास्ता डालर से एक झटके में संबंध तोड़ना नहीं, बल्कि एक ऐसी बहुध्रु वीय वित्तीय व्यवस्था तैयार करना है जिसमें डालर अके ला अनिवार्य माध्यम न रहे।
यानी नाम डालर का कम लिया जाए, लेकिन उसकी अनिवार्यता को चुनौती मिलती रहे। यही वह रणनीति है जिसमें राजनीतिक टकराव सीमित रहते हुए आर्थिक विकल्पों का विस्तार किया जा सकता है।
साथियों बात अगर हम ट्रंप की टैरिफ चेतावनी और ब्रिक्स का शांत जवाब को समझने की करें तो, डोनाल्ड ट्रंप ने ब्रिक्स देशों द्वारा डॉलर की वैश्विक भूमिका को कम जोर करने की किसी भी गंभीर कोशिश के खिलाफ भारी टैरिफ की चेतावनी दी है।इस परिस्थिति में ब्रिक्स के सामने दो रास्ते हो सकते हैं।
पहला, अमेरिका के साथ सीधा आर्थिक और मौद्रिक टकरावय दूसरा, बिना किसी औपचारिक डालर-विरोधी घोषणा के वैकल्पिक व्यवस्था को धीरे-धीरे मजबूत करना। दूसरा रास्ता राजनीतिक रूप से अधिक सावधान और आ र्थिक रूप से अधिक व्यावहा रिक दिखाई देता है।
यदि ब्रिक्स खुले तौर पर घोषणा कर दे कि वह डालर की बादशाहत खत्म करने जा रहा है, तो अमेरिका इसे रण नीतिक आर्थिक चुनौती के रूप में देख सकता है। इसके विपरीत, यदि ब्रिक्स यह कहता रहे कि उसका उद्देश्य डालर को खत्म करना नहीं, बल्कि व्यापार में स्थानीय मुद्राओं और वैकल्पिक भुगतान साधनों के विकल्प बढ़ाना है, तो वह एक अलग संदेश देता है। इस स्थिति में अमेरिका के लिए हर कदम का जवाब उसी तीव्रता से देना कठिन हो सकता है।
यही कारण है कि ब्रिक्स की वास्तविक ताकत किसी नारे में नहीं, बल्कि व्यवस्था निर्माण में छिपी है। यदि वैक ल्पिक तंत्र विश्वसनीय, सस्ता, तेज और बड़े पैमाने पर उप योगी साबित होते हैं, तो व्या पारिक संस्थाएं और देश स्वा भाविक रूप से उनका सटीकता से इस्तेमाल बढ़ा सकते हैं।
साथियों बात अगर हम पुतिन की भारत यात्रा – ट्रंप के लिए क्या है सबसे बड़ा आर्थिक संदेश? इसको समझ ने की करें तो,पुतिन की भारत यात्रा और भारत-रूस रणनीति क संबंधों को केवल पारंपरिक कूटनीतिक संबंधों की दृष्टि से देखना अधूरा होगा। इसके पीछे ऊर्जा, रक्षा, व्यापार, निवेश और भुगतान व्यवस्था का व्या पक आर्थिक आयाम भी है। भारत रूस से बड़ी मात्रा में ऊर्जा खरीदता है और रूस भारत के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार है। ऐसे में दोनों देशों के बीच व्यापार को अधिक कुशल भुगतान प्रणालियों और राष्ट्रीय मुद्राओं के माध्यम से आगे बढ़ाने की संभावनाएं केवल द्विपक्षीय संबं धों का विषय नहीं रहती।
उनका असर व्यापक वैश् िवक वित्तीय व्यवस्था पर भी पड़ सकता है। ट्रंप के लिए इसका सबसे बड़ा संदेश यह हो सकता है कि अमेरिकी टैरिफ या डालर की ताकत के बावजूद बड़े देश अपने आर्थिक हितों के अनुरूप वैक ल्पिक रास्ते तलाश सकते हैं। भारत यदि रूस के साथ ऊर्जा और अन्य व्यापारिक संबंधों को मजबूत करता है, रूस यदि एशियाई बाजारों पर अपनी निर्भरता बढ़ाता है और चीन सहित अन्य ब्रिक्स अर्थ व्यवस्थाएं स्थानीय मुद्राओं में लेन-देन को आगे बढ़ाती हैं, तो वैश्विक व्यापार धीरे-धीरे अधिक बहुध्रुवीय स्वरूप ग्रहण कर सकता है। यह अमेरिका के लिए तत्काल डालर संकट नहीं है, लेकिन दीर्घकाल में यह सवाल जरूर खड़ा करता है कि क्या डालर की वैश्विक ताकत का आधार केवल उस की आर्थिक शक्ति है या फिर इस तथ्य में भी है कि दुनिया के पास पर्याप्त विकल्प नहीं हैं। यदि विकल्प बढ़ते हैं, तो तस्वीर बदल सकती है।
साथियों बात अगर हम पुतिन, शी जिनपिंग और ब्रिक्स की रणनीति – क्या डालर की बादशाहत छुपे रूप से कमजोर होगी? इसको सम झने की करें तो, रूस और चीन दोनों लंबे समय से वैश् िवक वित्तीय व्यवस्था में अद्दि क विविधता की आवश्यकता पर जोर देते रहे हैं। चीन की विशाल व्यापारिक क्षमता, रूस की ऊर्जा शक्ति और भारत का विशाल उपभोक्ता बाजारकृइन तीनों को यदि व्यापक ब्रिक्स वित्तीय सहयोग से जोड़ा जाए, तो एक ऐसी आर्थिक संरचना विकसित हो सकती है जो डालर का तत्काल विकल्प न होते हुए भी उसके प्रभाव क्षेत्र को कुछ हद तक सीमित कर सके। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी भी जरूरी है। ब्रिक्स के सभी सद स्य देशों के आर्थिक हित एक जैसे नहीं हैं। चीन और भारत के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा है, रूस और भारत की भुग तान व्यवस्था की अपनी चुनौ तियां हैं और अलग- अलग देशों की मुद्राओं की स्थिरता भी समान नहीं है। इसलिए ब्रिक्स डालर को खत्म कर देगा कहना अतिशयोक्ति होगी। अधिक सटीक निष्कर्ष यह है कि ब्रिक्स डालर-केंद्रित व्यव स्था के समानांतर विकल्प विक सित करने की कोशिश कर रहा है। यही विकल्प यदि ऊर्जा, वस्तुओं, निवेश और सीमा – पार भुगतान जैसे बड़े क्षेत्रों में सफल होते हैं, तो डालर का उपयोग समाप्त हुए बिना भी उसकी सापेक्षिक अनि वार्यता सटिका से कम हो सकती है।
साथियों बात अगर हम सांप भी मरे और लाठी भी न टूटे ब्रिक्स का असली मास्टर स्ट्रोक? को समझने की करें तो, पूरी रणनीति को यदि एक वाक्य में समझना हो तो कहा जा सकता है, ब्रिक्स डालर को गिराने की घोषणा करने के बजाय डालर के बिना कुछ काम करने की क्षमता बढ़ाना चाहता है। यही सांप भी मरे और लाठी भी न टूटे वाली रणनीति है। अमेरिका कह सकता है कि डालर अभी सुरक्षित है, ब्रिक्स कह सकता है कि उसका उद्देश्य डालर को समाप्त करना नहीं है, लेकिन इसी बीच यदि व्यापार का एक हिस्सा राष्ट्रीय मुद्राओं में स्थानांतरित होता है, वैक ल्पिक भुगतान प्रणालियां मज बूत होती हैं और वित्तीय सह योग बढ़ता है, तो आर्थिक व्यवहार स्वयं बदलाव की कहानी लिख सकता है।
इसलिए आने वाले वर्षों में असली मुकाबला शायद कौन सी मुद्रा दुनिया की नंबर -वन मुद्रा होगी? से ज्यादा महत्वपूर्ण होकर कितने विकल् पों के बीच दुनिया अपना व्या पार कर सकती है? का हो सकता है।
डालर की बाद शाहत केवल किसी ब्रिक्स घोषणा से खत्म नहीं होगी और न ही कोई साझा ब्रिक्स मुद्रा रातो रात वैश्विक वित्तीय व्यवस्था बदल देगी। लेकिन यदि ब्रिक्स धीरे-धीरे ऐसा नेटवर्क तैयार कर देता है जिस में ऊर्जा, व्यापार, निवेश और भुगतान के लिए डालर की आवश्यकता कुछ क्षेत्रों में कम हो जाए, तो अमेरिकी मुद्रा की वैश्विक भूमिका पर दीर्घकालीन दबाव अवश्य बन सकता है।