बुजुर्गों के साथ अमानवीय व्यवहार व्यक्तिगत त्रासदियां नहीं हैं वे समाज की बदलती संवेदनशीलता पर गंभीर प्रश्नचिह्न हैं -क्या आधुनिकता की कीमत अपनी जड़ों को भूल जाना है? क्या आर्थिक सफलता का अर्थ उस हाथ को भूल जाना है, जिसने हमें चलना सिखाया था
एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट)।
वैश्विक स्तरपर किसी भी सभ्य समाज की असली पह चान उसकी ऊँची इमारतों, चमकती सड़कों या आर्थिक समृद्धि से नहीं, बल्कि इस बात से होती है कि वह अपने बुजुर्गों, कमजोरों और निर्भर लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है। आज दुनियाँ तेजी से बदल रही है। संयुक्त परिवा रों की जगह एकल परिवार ले रहे हैं, बच्चे शिक्षा और रोजगार के लिए महानगरों तथा विदेशों में बस रहे हैं और जीवन की भागदौड़ में कहीं माता-पिता की वह भाव नात्मक जगह सिकुड़ती जा रही है,जो कभी परिवार की नींव हुआ करती थी। सबसे पीड़ादायक स्थिति तब सामने आती है, जब जिन माता-पिता ने अपनी संतान की शिक्षा, करियर और भविष्य के लिए अपना पूरा जीवन लगा दिया, वही संतान उनके जीवन के अंतिम पड़ाव पर उनसे दूरी बना लेती है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि, वृद्धाश्रमों की बढ़ती आवश्यकता माता- पिता को अकेला छोड़ देने की घटनाएं और बुजुर्गों के साथ अमान वीय व्यवहार से जुड़े वायरल वीडियो केवल व्यक्तिगत त्रास दियां नहीं हैंय वे समाज की बदलती संवेदनशीलता पर गंभीर प्रश्नचिह्न हैं।
क्या आधुनिकता की कीमत अपनी जड़ों को भूल जाना है? क्या आर्थिक सफल ता का अर्थ उस हाथ को भूल जाना है, जिसने हमें चलना सिखाया था? इसी व्यापक सामाजिक और संवैधानिक चिंता के बीच 7 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में बुजुर्गों के अधिकारों से जुड़ी वर्ष 2016 से लंबित जनहित याचिका पर हुई सुनवाई बेहद महत्वपूर्ण बन गई है। अदालत ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से वृद्धाश्रमों तथा वरिष्ठ नागरि कों को उपलब्ध सुविधाओं की ताजा स्थिति रिपोर्ट मांगी है।
साथियों बात अगर हम सुप्रीम कोर्ट की दस्तक- क्या देश अपने बुजुर्गों के लिए सच मुच तैयार है? इसको समझने की करें तो, 7 सितंबर 2026 की सुनवाई में मुख्य न्याया द्दीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्याय मूर्ति वी. मोहना शामिल थे, ने लंबे समय से लंबित इस मामले को फिर गंभीरता से उठाया। वर्ष 2016 में पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री और वरिष्ठ अधिवक्ता द्वारा दायर जनहित याचिका का मूल प्रश्न केवल वृद्धाश्रमों की संख्या तक सीमित नहीं है, यह उस व्या पक अधिकार से जुड़ा है जिसके तहतप्रत्येक बुजुर्ग को सम्मान, सुरक्षा, आश्रय, स्वास्थ्य सुविधा और गरिमापूर्ण जीवन मिलना चाहिए। अदालत ने अटार्नी जनरल को निर्देश दिया कि सभी राज्यों और केंद्रशा सित प्रदेशों के एडवोकेट जन रल तथा स्टैंडिंग काउंसिल से संपर्क कर वृद्धाश्रमों की स्था पना और वहां उपलब्ध सुवि धाओं की ताजा जानकारी जुटाई जाए।
राज्यों को संबंधित पत्र मिलने के बाद लगभग चार सप्ताह के भीतर रिपोर्ट देने को कहा गया है। यह निर्देश महज प्रशासनिक औपचारिक ता नहीं माना जाना चाहिए। इसके पीछे एक बुनियादी सवा ल है, कागजों पर बुजुर्गों के लिए कितनी योजनाएं हैं और जमीन पर वास्तव में उन्हें सटी कता से कितना सहारा मिल रहा है?
साथियों, बात अगर हम अनुच्छेद 21 बुजुर्गों के लिए सिर्फ जीवन नहीं, गरिमा का जीवन को समझने की करें तो भारतीय संविधान काअनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्व तंत्रता की सुरक्षा करता है। बुजुर्गों के संदर्भ में यह सवाल और भी व्यापक हो जाता है, क्या केवल सांस लेते रहना ही जीवन है, या जीवन का अर्थ सम्मान, सुरक्षा स्वास्थ्य, आश्रय और गरिमा के साथ जीना भी है? वर्ष 2016 की इस जनहित याचिका में इसी व्यापक दृष्टिकोण से बुजुर्गों के लिए आश्रय, पर्याप्त पेंशन, जेरियाट्रिक चिकित्सा देखभाल और स्वास्थ्य सुविधाओं की मांग उठाई गई है। साथ ही मेंटेनेंस एंड वेलफेयर आफ पे रेंट्स एंड सीनियर सिटीजन्स एक्ट, 2007 के प्रभावी क्रियान् वयन पर भी जोर दिया गया है।इस कानून की धारा 19 में राज्यों द्वारा चरणबद्ध तरीके से प्रत्येक जिले में कम-से- कम एक वृद्धाश्रम स्थापित करने का प्रावधान किया गया है, जिसमें बेसहारा बुजुर्गों के लिए आवास की व्यवस्था हो। इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं कि वृद्धाश्रम मौजूद हैं या नहीं। असली प्रश्न यह है कि क्या वे रहने योग्य हैं? क्या वहां पर्याप्त भोजन, स्व च्छता, सुरक्षा, दवाइयां, चिकि त्सकीय देखभाल, मानसिक स्वास्थ्य सहायता और और उचित सटीक मानवीय वाता वरण उपलब्ध है?
साथियों बात अगर हम वृद्धाश्रम – समाधान या परि वार के विघटन का आईना? इसको समझने की करें तो, वृद्धाश्रम अपने आप में बुराई नहीं हैं। कुछ बुजुर्गों के लिए वे सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन का महत्वपूर्ण सहारा हो सकते हैं। अकेले रहने वाले, संतान विहीन अथवा आर्थिक और सामाजिक रूप से असुर क्षित वरिष्ठ नागरिकों के लिए संस्थागत देखभाल आवश्यक भी हो सकती है।लेकिन चिंता तब पैदा होती है,जब वृद्धाश्रम विकल्प से बढ़कर जिम्मेदारी से बचने का साधन बनने लगें। जिस माता ने अपने बच्चे की बीमारी में रातें जागकर बिताईं जिस पिता ने अपनी जरूरतें रोककर बच्चे की फीस भरी, जिस परिवार ने अपनी सीमित आय में भी संतान को बेहतर शिक्षा दिलाने का सपना देखा, यदि वही संतान आर्थिक रूप से सक्षम होने के बाद माता- पिता को भावनात्मक रूप से अकेला छोड़ दे, तो समस्या केवल पारिवारिक नहीं रहती। वह सामाजिक चेतना का प्रश्न बन जाती है। आज महानगरों और विदेशों में बसना अपने आप में गलत नहीं है। बेहतर अवसरों की तलाश स्वाभाविक है। समस्या तब शुरू होती है जब भौगोलिक दूरी भावना त्मक दूरी में बदल जाती है और व्यस्तता जिम्मेदारी से प लायन का बहाना बन जाती है। साथियों बात अगर हम जब अंतिम विदाई भी समय मांगने लगे इसको समझने की करें तो, समाज को विच लित करने वाली वे घटनाएं, जिनमें बुजुर्ग माता-पिता को अकेला छोड़ दिया जाता है या उनकी अंतिम अवस्था में संतान अपनी उपस्थिति तक को बोझ समझती है, हमें भीतर तक झकझोरती हैं।
किसी बुजुर्ग पिता का अंतिम संस्कार देखने के लिए भी समय न होना,या किसी बुजुर्ग मां को रात में सड़क पर छोड़कर चले जाने जैसी घटनाओं के वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आना, यदि वास्तव में समाज की बढ़ती प्रवृत्ति का संकेत हैं, तो हमें केवल उन परिवारों को दोष देने से आगे बढ़कर अपने सामाजिक मूल्यों पर भी वि चार करना होगा। जिस समाज में वृद्ध माता-पिता की आंखों में अपने ही बच्चों की प्रतीक्षा दिखाई देती हो और बच्चों के पास उनके लिए समय न हो, वहां विकास के आंकड़े अधूरे हैं।
साथियों बात अगर हम सुप्रीम कोर्ट ने पूछा, कितने वृद्धाश्रम कितनी पेंशन, कैसी चिकित्सा ? इसको समझने की करें तो, सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता वकील ने अदा लत को बताया कि इस मामले में तीन महत्वपूर्ण पहलुओं पर स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए, देश में कितने वृद्धाश्रम हैं, बुजुर्गों को कितनी पेंशन मिल रही है और उनके लिए चिकि त्सा सुविधाओं की वास्तविक स्थिति क्या है। उन्होंने यह भी चिंता जताई कि मामला वर्षों से प्रभावी सुनवाई से दूर रहा है। उन्होंने बताया कि अगस्त 2023 में केंद्र की ओर से दाखिल हलफनामे में 15 राज्यों और चार केंद्रशासित प्रदेशों की जानकारी दी गई थी, लेकिन पूरी अद्यतन जान कारी उपलब्ध नहीं कराई गई थी। मुख्य न्यायाधीश ने भी 2022 के बाद मामले के सूचीबद्ध न होने पर सवाल उठाया। यही कारण है कि राज्यों से ताजा रिपोर्ट मांगना महत्वपूर्ण है। इससे पहली बार नहीं, लेकिन एक बार फिर यह जांचने का अवसर मिलेगा कि सरकारी नीतियां और जमीनी वास्तविकता कित नी दूर या कितनी करीब हैं।
साथियों बात कर हम माम ला हाईकोर्टों को भेजना या देशव्यापी सिद्धांत तय करना? इसको समझने की करें तो,सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से मामले को संबंधित हाईकोर्टों में भेजने का सुझाव भी आया। लेकिन याचिका कर्ता ने इसका विरोध करते हुए कहा कि बुजुर्गों के अधिकार पूरे देश से संबंधित समान प्रश्न हैं और सुप्रीम कोर्ट को अपने पहले के निर्देशों के अनुपालन को सुनिश्चित करना चाहिए। मुख्य न्याया धीश ने संकेत दिया कि सुप्रीम कोर्ट को पहले देशभर के लिए व्यापक संवैधानिक और कानूनी सिद्धांत तय करने चाहिए और उसके बाद उनके स्थानीय क्रियान्वयन की निग रानी हाईकोर्टों के माध्यम से हो सकती है। यह दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है, क्योंकि बुजुर्गों की गरिमा किसी राज्य की सीमा से बंधी हुई नहीं है। माता-पिता का सम्मान राजस् थान महाराष्ट्र, दिल्ली, बिहार या किसी अन्य राज्य में अलग संवैधानिक मूल्य नहीं हो सक ता। साथियों बात अगर हम सरकार की जिम्मेदारी से पहले समाज की जिम्मेदारी को समझने की करें तो,कानून सरकार को जिम्मेदारी सौंप सकता है, वृद्धाश्रम बना सक ता है, पेंशन दे सकता है और अस्पतालों में जेरियाट्रिक वार्ड विकसित कर सकता है। लेकिन कोई कानून बच्चे के दिल में माता-पिता के लिए प्रेम और कृतज्ञता पैदा नहीं कर सकता।इसलिए बुजुर्गों की समस्या के दो स्तर हैं, संस्थागत जिम्मेदारी और पा रिवारिक संवेदनशीलता। सरकार को पर्याप्त वृद्धाश्रम, नियमित पेंशन, सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं, मानसिक स्वास्थ्य सहायता, कानूनी संरक्षण और प्रभावी शिकायत तंत्र उपलब्द्द कराना होगा। वहीं परिवारों को यह समझना होगा कि बुजुर्गों की जरूरत केवल पैसा नहीं है। उन्हें समय चाहिए, संवाद चाहिए, अपनापन चाहि ए और यह भरोसा चाहिए कि वे अपने ही परिवार में अनाव श्यक नहीं हो गए हैं।
साथियों बात अगर हम बुजुर्ग बोझ नहीं, हमारी सभ्यता की जीवित स्मृति हैं इसको समझने की करें तो, जिस पी ढ़ी को हम आज बूढ़ा कहते हैं, वही पीढ़ी कल के भारत की नींव रखकर गई है। उसने सीमित साधनों में परिवार ब नाए, बच्चों को शिक्षित किया, घर चलाए और कठिन परि स्थितियों में जीवन खड़ा कि या। इसलिए बुजुर्गों की देख भाल कोई दया नहीं, यह सा माजिक कृतज्ञता और नैतिक उत्तरदायित्व है। आज आवश् यकता ऐसी व्यवस्था की है जिसमें वृद्धाश्रम अंतिम मज बूरी न हों, बल्कि जरूरतमंदों के लिए सम्मानजनक विकल्प होंय पेंशन इतनी हो कि बुजुर्ग दूसरों पर निर्भर न रहें, अस्प तालों में उनकी उम्र और आव श्यकताओं के अनुरूप चिकित् सा उपलब्ध हो और कानून का उल्लंघन होने पर उन्हें सटीकता से तत्काल संरक्षण मिले। साथियों हम अंतिम सवाल – हम अपने भविष्य के साथ कैसा व्यवहार कर रहे हैं? इसको समझने की करें तो सुप्रीम कोर्ट की 7 सितंबर 2026 की सुनवाई ने एक महत्वपूर्ण दरवाजा फिर खोल दिया है। अब राज्यों को अपनी व्यवस्था की वास्तविक तस्वीर अदालत के सामने रख नी होगी। लेकिन इस पूरे विमर्श का सबसे बड़ा सवाल अदालत से बाहर है, हम अपने घरों में अपने बुजुर्गों के साथ कैसा व्यवहार कर रहे हैं? क्योंकि आज जिस मां-बाप को हम अकेला छोड़ रहे हैं, कल उसी उम्र की ओर हम स्वयं बढ़ेंगे। आज जिसे हम समय का अभाव कहकर टाल रहे हैं, कल वही समय हमें अपने बच्चों से सटीकता से चाहिए होगा।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन करके इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि समाज की असली प्रगति तब होगी,जबवृद्धाश्रमों की संख्या बढ़ने पर हमें गर्व नहीं, बल्कि यह संतोष होगा कि कोई बुजुर्ग केवल इसलिए वृद्धाश्रम जाने को मजबूर नहीं हुआ क्योंकि उसके अपने बच्चों ने उसे भुला दिया था।
सुप्रीम कोर्ट सरकारों से रिपोर्ट मांग रहा है, अब समय है कि समाज स्वयं से भी एक रिपोर्ट मांगे,हमने अपने बुजुर्गों के लिए क्या किया और शायद इस रिपोर्ट का सबसे ईमानदार उत्तर ही तय करेगा कि हम वास्तव में आ धुनिक हुए हैं या केवल आ धुनिक दिखाई देने लगे हैं।
वृ(ाश्रम बढ़ रहे हैं या परिवारों की संवेदनशीलता घट रही है? बुजुर्गों की जिंदगी के इस कड़वे सच पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती, अब राज्यों को बताना होगा जमीन पर क्या हो रहा है
