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प्याज-चीनी के बढ़ते दामों ने खोली खाद्य सुरक्षा की पोल, क्या सरकार के सामने किसान और उपभोक्ता दोनों की अग्निपरीक्षा

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट्र)।
वैश्विक स्तरपर त्योहारी मौसम की दस्तक के साथ भारतीय रसोई में एक बार फिर प्याज के आंसू दिखाई देने लगे हैं।जिस प्याज की खुदरा कीमत कुछ समय पहले लगभग 25 रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास थी, वही अनेक बाजारों में 60 से 70 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई है। दूसरी ओर चीनी की कीमतों में भी तेजी ने घरेलू बजट पर दोहरा दबाव पैदा कर दिया है। भारत जैसे देश में यह महज बाजार की सामान्य उठापटक नहीं मानी जा सकती, क्योंकि प्याज और चीनी दोनों ऐसी आवश् यक वस्तुएं हैं जिनकी कीमतें सीधे उपभोक्ता की रसोई, किसान की आय, सरकार की आर्थिक नीतियों और राज नीतिक विमर्श को प्रभावित करती हैं।
इसलिए मौजूदा परिस्थि ति को केवल महंगाई के आंक ड़े के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसके पीछे उत्पा दन, मौसम, भंडारण, आपूर्ति -श्रृंखला, बाजार व्यवहार, सरकारी हस्तक्षेप और वैश्विक खाद्य सुरक्षा के परस्पर जुड़े हुए अनेक आयाम हैं।
मैं एडवोकेट किशन सनमु खदास भावनानीं गोंदिया महा राष्ट्र यह मानता हूं कि प्याज की मौजूदा तेजी के पीछे सब से महत्वपूर्ण कारण आपूर्ति और मांग के बीच पैदा हुआ असंतुलन है। खरीफ प्याज की नई फसल बाजार में अपे क्षित समय पर नहीं पहुंच पाई है, जबकि पुरानी फसल के भंडारण में मौसम की प्रति कूल परिस्थितियों और नमी से नुकसान की खबरों ने उप लब्ध स्टॉक पर दबाव बढ़ाया है। बेमौसम बारिश केवल खेत में खड़ी फसल को ही प्रभावित नहीं करती, बल्कि कटाई के बाद रखे गए प्याज की गुणवत्ता और भंडारण क्षमता को भी नुकसान पहुं चाती है। परिणाम स्वरूप बाजार में उपलब्ध अच्छी गुणवत्ता वाले प्याज की मात्रा घटने लगती है। त्योहारी मौसम में मांग बढ़ने के साथ यह कमी कीमतों को तेजी से ऊपर ले जाती है। यही कारण है कि उत्पादन के कुल आंकड़े अपेक्षाकृत सा मान्य दिखाई देने के बावजूद उपभोक्ता बाजार में कीमतों में असाधारण उछाल दिखाई दे सकता है। कृषि बाजार में कुल उत्पादन और वास्तविक समय में उपलब्ध बिक्री योग्य उत्पादन सटिका से दो अलग -अलग वास्तविकताएं हैं।
साथियों, इसी परिस्थिति में केंद्र सरकार ने उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए अपने रणनीतिक प्याज बफरस्टॉक को बाजार में उतारने का फैसला किया है। लगभग 1.21 लाख टन के बफर स्टाक से प्याज की आपूर्ति बढ़ाने और प्रमुख उपभोग केंद्रों तक तेजी से माल पहुंचाने की रणनीति अपनाई गई है। सर कार की योजना का उद्देश्य केवल दिल्ली जैसे बड़े बाजा रों में प्याज उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि अतिरिक्त आपूर्ति के माध्यम से थोक बाजार में भी कीमतों पर मनोवैज्ञानिक और वास्तविक दबाव पैदा करना है। यदि बाजार को यह विश्वास हो जाए कि सरकार के पास पर्याप्त स्टाक उपलब्ध है और आवश्यकता पड़ने पर वह अतिरिक्त प्याज जारी कर सकती है, तो जमाखोरी और कृत्रिम कमी की संभावना भी कम हो सकती है। इस अर्थ में बफर स्टाक केवल प्याज का भंडार नहीं, बल्कि कीमत स्थिरीक रण का एक आर्थिक उपकरण है। साथियों, इसी सरकारी रणनीति का सबसे चर्चित हिस् सा नासिक से शुरू की गई विशेष कांदा (प्याज) एक्सप्रेस है। महाराष्ट्र के नासिक क्षेत्र को देश के प्रमुख प्याज उत्पादन केंद्रों में गिना जाता है और वहां से दिल्ली- एन सीआर तथा अन्य बड़े उपभोग केंद्रों तक रेल के माध्यम से प्याज पहुंचाने का उद्देश्य परि वहन समय और लागत को कम करना है। रिपोर्टों के अनुसार लगभग 840 मीट्रिक टन की निर्धारित क्षमता के मुकाबले लगभग 450 मीट्रिक टन प्याज ही भेजा जा सका और पांच में से चार प्रस्तावित कांदा एक्सप्रेस ट्रेनें रद्द हो गईं। इस स्थिति को समझने के लिए केवल प्रशासनिक विफलता कहना पर्याप्त नहीं होगा। ट्रेन रद्द होने के पीछे उपलब्ध प्याज की मात्रा, लोडिंग की तैयारी, मंडियों से माल की समय पर उपलब् धता, रेलवे रेक की उपलब्ध ता, मार्ग और अनेक
परिचालन संबंधी समस् याएं तथा किसानों और व्यापारियों के विरोध जैसे अनेक कारक हो सकते हैं। विशेष रूप से यदि स्थानीय बाजार में किसानों और व्यापारियों को यह आशंका हो कि सरकारी परिवहन से बड़ी मात्रा में प्याज बाहर जाने पर स्थानीय कीमतें प्रभावित होंगी,तो लोडिंग के लिए अपेक्षित मात्रा जुटाना भी चुनौती बन सकता है। इसलिए 840 मीट्रिक टन के लक्ष्य से 450 मीट्रिक टन की वास्तविक आपूर्ति तक पहुंचना केवल परिवहन का प्रश्न नहीं,बल्कि कृषि बाजार की जटिल वास्तविकताओं का संकेत है।
साथियों, सरकार ने केवल रेलवे परिवहन पर निर्भर रहने के बजाय राष्ट्रीय सहकारी उपभोक्ता संघ यानी एनसी सीएफ राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन महासंघ यानी नेफेड और केंद्रीय भंडार जैसे सर कारी एवं सहकारी वितरण तंत्र के माध्यम से उपभोक्ताओं को रियायती दर पर प्याज उपलब्ध कराने की व्यवस्था की है। दिल्ली- एनसीआर सहित प्रमुख शहरों में मोबा इल वैन और निर्धारित बिक्री केंद्रों के माध्यम से लगभग 35 रुपये प्रति किलोग्राम की दर पर प्याज उपलब्ध कराने का प्रयास इसी नीति का हिस्सा है। इसका उद्देश्य बा जार की ऊंची खुदरा कीमत और सरकार द्वारा उपलब्ध कराए जा रहे प्याज की की मत के बीच अंतर पैदा करके आम उपभोक्ता को तत्काल राहत देना है।
यदि यह वितरण पर्याप्त मात्रा और नियमितता के साथ होता है, तो इसका प्रभाव केवल सरकारी दुकानों तक सीमित नहीं रहताय निजी बाजार भी अपनी कीम तों को नीचे लाने के लिए मजबूर हो सकते हैं।
साथियों, हालांकि, सर कार के इस हस्तक्षेप का दूसरा पक्ष किसानों से जुड़ा हुआ है। उपभोक्ता चाहता है कि प्याज 30-35 रुपये कि लो मिले, जबकि किसान चाहता है कि उसकी उपज का मूल्य उसकी लागत और जोखिम के अनुरूप हो। यही कृषि अर्थव्यवस्था का सबसे कठिन संतुलन है।
किसान महीनों तक बीज, खाद, कीटनाशक, सिंचाई, श्रम और परिवहन पर खर्च करता है। मौसम की मार झेलता है और फसल को भंडारण तक पहुंचाता है। यदि बाजार में अचानक कीमत बढ़ती है, तो उसे लगता है कि आखिरकार उसे अपनी लागत की भरपाई का अवसर मिला है। लेकिन उसी समय यदि सरकार बफर स्टाक बाजार में उतारकर कीमतों को नियंत्रित करती है, तो किसान संगठनों में असंतोष पैदा होना स्वाभाविक है। इसलिए उपभोक्ता राहत और किसान आय, दोनों को एक साथ साधे बिना प्याज की समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है।
यही विरोधाभास कांदा (प्याज) एक्सप्रेस के संदर्भ में भी दिखाई देता है। सरकार के लिए नासिक से दिल्ली जैसे बड़े उपभोग केंद्र तक प्याज भेजना महंगाई नियंत्रण का उपाय है, जबकि कुछ किसानों के लिए यही हस्तक्षेप खुले बाजार में बेहतर कीमत मिलने की उनकी संभावना को प्रभावित कर सकता है। इसलिए किसान संगठनों द्वारा विरोध को केवल सरकार- विरोधी राजनीति के चश्मे से देखना उचित नहीं होगा।
इसके पीछे मूल्य प्राप्ति, उत्पादन लागत और बाजार जोखिम का वास्तविक आर्थिक प्रश्न भी मौजूद है। बेहतर नीति वह होगी जिसमें उपभोक्ता को राहत देने के साथ किसा नों को न्यूनतम आय सुरक्षा और सटिका से पारदर्शी बा जार व्यवस्था भी मिले।
साथियों, प्याज की महं गाई ने राजनीतिक बहस को भी तेज कर दिया है। विपक्ष सरकार पर आवश्यक वस्तुओं की कीमतों को नियंत्रित करने में विफल रहने का आरोप लगा रहा है। दूसरी ओर सरकार का तर्क है कि उसने समय रहते बफर स्टाक जारी किया, विशेष परिवहन व्यवस्था शुरू की और रियायती दर पर बिक्री की व्यवस्था की है। भारतीय राजनीति में प्याज का महत्व असाधारण है। इस का कारण यह है कि प्याज केवल कृषि उत्पाद नहीं, बल्कि करोड़ों परिवारों की रोजमर्रा की रसोई का हिस्सा है।जब प्याज महंगा होता है तो इस का असर केवल प्याज खरी दने के बिल तक सीमित नहीं रहताय घर के भोजन की पूरी लागत बढ़ती है और महंगाई की अनुभूति अधिक तीव्र हो जाती है। यही कारण है कि प्याज की कीमतें अक्सर आ र्थिक विषय से निकलकर राज नीतिक मुद्दा बन जाती हैं।
प्याज के साथ चीनी की कीमतों में तेजी ने स्थिति को और संवेदनशील बना दिया है। आपके दिए आंकड़ों के अनुसार, एक महीने में चीनी की कीमतों में भी उल्ले खनीय वृद्धि हुई है। हालांकि अलग-अलग शहरों, गुणवत्ता, थोक और खुदरा बाजार तथा समय के अनुसार वास्तविक कीमतों में अंतर हो सकता है, लेकिन यदि प्याज और चीनी जैसी दो महत्वपूर्ण खाद्य वस्तुएं एक ही समय में तेजी दिखाती हैं तो इसका प्रभाव उपभोक्ता मनोविज्ञान पर अ धिक पड़ता है। गन्ने के उत् पादन, चीनी मिलों की आ र्थिक स्थिति, घरेलू उपलब्द्द ता, निर्यात नीति, एथेनाल उत्पादन और वैश्विक चीनी बाजार, इन सभी के बीच संतुलन बनाना सरकार के लिए चुनौती है। खाद्य नीति में एक क्षेत्र को प्रोत्साहित करने वाला निर्णय दूसरे क्षेत्र में आपूर्ति और कीमत पर प्रभाव डाल सकता है। साथियों, इस पूरे संकट को जलवायु परिवर्तन से अलग करके भी नहीं देखा जा सक ता। बेमौसम बारिश, अत्यधि क वर्षा, तापमान में बदलाव और मौसम की अनिश्चितता अब कृषि कैलेंडर को प्रभावित कर रही है। प्याज जैसी फसल के लिए केवल खेत में उत्पा दन पर्याप्त नहीं है, कटाई के बाद वैज्ञानिक भंडारण भी उतना ही महत्वपूर्ण है। भारत में यदि लाखों टन प्याज का उत्पादन होने के बावजूद भंडा रण और आपूर्ति व्यवस्था कम जोर रहती है, तो उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा बाजार में नियमित आपूर्ति नहीं बन पाता। इसलिए भविष्य की खाद्य सुरक्षा का प्रश्न केवल अधिक उत्पादन करने का नहीं, बल्कि उत्पादन से लेकर भंडारण, परिवहन और अंतिम उपभोक्ता तक पूरी मूल्य- श्रृंख ला को मजबूत करने का प्रश्न है। साथियों, इसका अंतररा ष्ट्रीय आयाम भी कम महत्व पूर्ण नहीं है। भारत विश्व के प्रमुख प्याज उत्पादक और निर्यातक देशों में शामिल है। भारत जब घरेलू कीमतों को नियंत्रित करने के लिए निर्यात नीति में बदलाव करता है, तो उसका असर अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर भी पड़ता है। बांग्लादेश, श्रीलंका, पश्चिम एशिया और अफ्रीका के कुछ बाजारों में भारतीय प्याज की आपूर्ति महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसलिए भारत के भीतर खाद्य महंगाई रोकने का निर्णय दूसरे देशों में कीम तों और उपलब्धता को प्रभा वित कर सकता है। यही वैश् िवक खाद्य सुरक्षा की परस्पर निर्भरता है,एक देश की घरेलू खाद्य नीति दूसरे देश के बा जार में सटीकता से संकट पैदा कर सकती है।
साथियों इसलिए मौजूदा प्याज संकट का समाधान केवल कांदा (प्याज) एक्सप्रेस चलाने या कुछ दिनों के लिए बफर स्टाक जारी करने तक सीमित नहीं होना चाहिए। ये कदम तत्काल राहत के लिए आवश्यक हैं, लेकिन दीर्घकालीन समाधान के लिए आधुनिक भंडारण केंद्र, वैज्ञानिक प्याज भंडारण तकनीक, बेहतर ग्रामीण सड़क और रेल कनेक्टिविटी, मंडियों में पारदर्शी मूल्य सूच ना, किसानों के लिए जोखिम बीमा और बाजार आधारित आय सुरक्षा को मजबूत करना होगा। सरकार को ऐसा तंत्र विकसित करना होगा जिसमें कीमतें बहुत नीचे जाने पर किसान पूरी तरह तबाह न हो और कीमतें बहुत ऊपर जाने पर उपभोक्ता भी अस हाय न हो।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि प्याज की मौजूदा महंगाई भारत के सामने खड़ी एक बड़ी आर्थिक तस्वीर का छोटा लेकिन अत्यंत संवेदन शील हिस्सा है। एक ओर करोड़ों उपभोक्ता सस्ती खाद्य वस्तुओं की अपेक्षा करते हैं, दूसरी ओर करोड़ों किसान अपनी मेहनत की उचित कीमत चाहते हैं। सरकार के सामने इन दोनों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है। कांदा (प्याज) एक्सप्रेस, बफर स्टाक, एनसीसीएफ, नेफेड और केंद्रीय भंडार के माध्यम से बिक्री जैसे उपाय तत्काल राहत दे सकते हैं, लेकिन स्थायी समाधान कृषि आपूर्ति – श्रृंखला के ढांचागत सुधार में ही छिपा है। शक्कर और प्याज की कीमतों में एक साथ दिखाई दे रही तेजी यह चेतावनी देती है कि आने वाले वर्षों में खाद्य सुरक्षा केवल उत्पादन का विषय नहीं होगी, बल्कि जलवायु, अर्थव्यवस्था, किसान आय, उपभोक्ता अद्दि कार और राष्ट्रीय राजनीति के बीचसंतुलन की सबसे बड़ी परीक्षा होगी।
यदि भारत इस चुनौती से सबक लेकर किसान और उपभोक्ता दोनों के हितों को केंद्र में रखकर दीर्घकालीन खाद्य नीति तैयार करता है, तो आज का ‘रसोई संकट’ कल की अधिक मजबूत और टिकाऊ खाद्य सुरक्षा व्यवस्था का आधार बन सकता है।

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