एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी – गोंदिया (महाराष्ट्र)। वैश्विक स्तर पर भारत तेजी से विश्व की अग्रणी अर्थ व्यवस्थाओं में स्थान बना रहा है। वैश्विक निवेश आकर्षित करने, घरेलू उद्योगों को प्रति स्पर्धी बनाने, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को प्रोत्साहन देने तथा ईज आफ डूइंग बिजनेस को मजबूत करने के लिए सरकार लगा तार नियामकीय सुधार कर रही है।आधुनिक अर्थव्यवस्था में केवल कठोर कानून पर्याप्त नहीं होते, बल्कि ऐसे कानून आवश्यक होते हैं जो ईमानदार कारोबारियों को अनजाने में हुई प्रक्रियात्मक त्रुटियों को सुधारने का अवसर दें और साथ ही जानबूझकर उपभो क्ताओं के साथ धोखाधड़ी करने वालों पर कठोर कार्रवाई सुनिश्चित करें। इसी सोच के अनुरूप जनविश्वास (प्रावधानों का संशोधन) अधिनियम, 2026 के माध्यम से विधिक माप विज्ञान अधिनियम, 2009 के अंतर्गत सुधार नोटिस व्यवस्था लागू की गई है। यह सुधार भारतीय नियामकीय व्यवस्था में दंडात्म क मानसिकता से विश्वास- आधारित अनुपालन की ओर बढ़ाया गया एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भाव नानीं गोंदिया महाराष्ट्र अधिवक्ता होने के नाते बताना चाहूंगा कि विधिक मापविज्ञान किसी भी आधुनिक अर्थव्यवस्था की आधारशिला है।
जब कोई उपभोक्ता एक किलो चीनी, एक लीटर दूध, पांच सौ ग्राम मसाला, एक पैकेट दवा या किसी इलेक्ट्रानिक उत्पाद को खरीदता है, तब वह इस विश्वास के साथ खरीदारी करता है कि पैकेट पर अंकित मात्रा, वजन, माप, मूल्य तथा अन्य जानकारी सही है। यही विश्वास बाजार व्यव स्था की आत्मा है। यदि वजन, माप और पैकेजिंग में पारदर्शिता समाप्त हो जाए तो उप भोक्ता संरक्षण, निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा तथा व्यापारिक विश्वसनीयता तीनों प्रभावित होते हैं। इसलिए दुनियाँ के लगभग सभी विकसित देशों में लीगल मेट्रोलाॅजी से जुड़े कठोर मानक लागू हैं। भारत भी इसी वैश्विक व्यवस्था का सटीक हिस्सा है। साथियों, अब तक की व्यवस्था में कई बार ऐसा होता था कि कोई व्यापारी, निर्माता, पैकर या आयातक केवल किसी प्रक्रियात्मक या दस्तावेजी त्रुटि के कारण भी दंडात्मक कार्रवाई का सामना करता था। कई मामलों में गलती धोखाधड़ी नहीं बल्कि तकनीकी अथवा प्रशासनिक चूक होती थी। इससे छोटे व्यापारियों तथा एमएसएमई इकाइयों पर अना वश्यक आर्थिक और कानूनी बोझ पड़ता था। सरकार ने महसूस किया किजानबूझकर किए गए अपराध और पहली बार हुई प्रक्रियात्मक गलती में अंतर होना चाहिए। इसी सोच के तहत पहले सुधारो, फिर कार्रवाई की नीति अपनाई गई है। नई व्यवस्था के अनुसार यदि कोई विनियमित संस्था पहली बार प्रक्रियात्मक या नियामकीय नियमों का उल्लं घन करती है, तो संबंधित वि धिक मापविज्ञान अधिकारी सीद्दे जुर्माना या अभियोजन शुरू करने के बजाय सुधार नोटिस जारी करेगा। इस नो टिस में स्पष्ट रूप से बताया जाएगा कि कौन-सी कमी पाई गई है, उसे किस प्रकार दूर करना है तथा निर्धारित समय सीमा के भीतर अनुपालन कर ना होगा। यदि संबंधित संस्था समय पर त्रुटि सुधार देती है तो अनावश्यक मुकदमेबाजी तथा दंडात्मक कार्रवाई से बचा जा सकेगा। इससे प्रशासनिक संसाधनों की भी बचत होगी और उद्योग जगत में विश्वास का वातावरण बनेगा।
साथियों, यह सुधार विशेष रूप से निर्माताओं, आयातकों पैकिंग करने वालों, डीलरों, मरम्मत कर्ताओं, व्यापारियों, वितरकों तथा सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के लिए महत्वपूर्ण है। अक्सर छोटे व्यवसायों के पास बड़े उद्योगों जैसी कानूनी विशेषज्ञता उपल ब्ध नहीं होती। ऐसे में दस्तावे जी या पंजीकरण संबंधी त्रुटि यां अनजाने में हो सकती हैं। नई व्यवस्था ईमानदार व्यवसा यों को बिना भय के नियमों का पालन करने हेतु प्रेरित करेगी। सरकार ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि यह राहत केवल पहली बार होने वाली प्रक्रियात्मक अथवा नि यामकीय त्रुटियों तक सीमित रहेगी। यदि सुधार नोटिस के बावजूद निर्धारित समय में अनु पालन नहीं किया जाता अथवा भविष्य में वही उल्लंघन दोह राया जाता है, तो संबंधित संस्था के विरुद्ध विधिक माप विज्ञान अधिनियम के अनुसार कठोर कार्रवाई की जाएगी। नई व्यवस्था में बार-बार नियम तोड़ने वालों के लिए दंड और अधिक कठोर बनाया गया है। दूसरी बार उल्लंघन पर लग भग आठ गुना तक तथा तीसरी बार बार-बार नियम तोड़ने पर बीस गुना तक जुर्माने का प्रावधान किया गया है। इससे स्पष्ट संदेश जाता है कि सर कार ईमानदार व्यापार को प्रोत्साहित करेगी, लेकिन जान बूझकर नियमों की अवहेलना करने वालों को किसी प्रकार की सटीकता से राहत नहीं मिलेगी। साथियों, सबसे महत्व पूर्ण बात यह है कि सरकार ने उपभोक्ताओं को आश्वस्त किया है कि इस सुधार से उनके अधिकार किसी भी प्रकार कमजोर नहीं होंगे। यदि कोई व्यापारी जानबूझकर कम वजन देता है, नाप-तौल के उपकरणों में छेड़छाड़ कर ता है, झूठी जानकारी देता है, उपभोक्ताओं को धोखा देता है या बार-बार नियमों का उल्लंघन करता है, तो उसके विरुद्ध बिना किसी ढिलाई के तत्काल कठोर कार्रवाई जारी रहेगी। अर्थात यह सुधार केवल ईमानदार व्यवसायों को राहत देने के लिए है, धोखाधड़ी कर ने वालों को संरक्षण देने के लिए नहीं। सुधार नोटिस व्यव स्था मुख्य रूप से उन मामलों पर लागू होगी जो प्रक्रियात्मक और नियामकीय प्रकृति के हैं। इनमें पंजीकरण आवश्यक ताएं, दस्तावेजों का रखरखाव, रिकार्ड संधारण, माडल अनु मोदन, बाट एवं माप उपकरणों का निर्माण, बिक्री और मरम्मत, आयात संबंधी प्रक्रियाएं, पैकेट बंद वस्तुओं के नियम, वैधानिक घोषणाएं तथा नियत समय में रिटर्न दाखिल करना जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं। इन क्षेत्रों में पहली बार हुई त्रुटि पर सुधार का सटीकता से अवसर दिया जाएगा।
साथियों, विधिक माप विज्ञान अधिनियम की अनेक द्दाराएं इस सुधार के दायरे में लाई गई हैं। इनमें धारा 25 (गैर- मानक बाट या माप का उपयोग), धारा 27 (गैर- मानक बाट या माप का निर्माण या बिक्री), धारा 28 (निर्धारित मानकों के विरुद्ध लेन-देन), धारा 29 (गैर- मानक इकाइयों का उद्धरण या प्रकाशन), द्दारा 31 (आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत न करना), धारा 32 (माडल अनुमोदन प्राप्त न करना), द्दारा 34 (गैर-मानक बाट या माप से बिक्री या वितरण), धारा 35 (गैर-मानक माप के आधार पर सेवाएं प्रदान करना), धारा 36 (1) (गैर- मानक पैकेजिंग वाली वस्तुओं की बिक्री), धारा 38 (पंजीक रण के बिना आयात), धारा 39 (गैर-मानक बाट और माप का आयात), धारा 41(1) एवं 41(2) (झूठी जानकारी या झूठे विवरण देना), धारा 45 (बिना पंजीकरण निर्माण), द्दारा 46 (बिना पंजीकरण मर म्मत, बिक्री या व्यापार) तथा धारा 47 (पंजीकरण प्रमाण पत्र में छेड़छाड़) जैसे प्रावधान शामिल हैं।
साथियो, इन धाराओं में पहली बार की प्रक्रियात्मक चूक पर सुधार नोटिस का लाभ मिल सकेगा, जबकि गं भीर या जानबूझकर किए गए अपराधों में कठोर कार्रवाई यथा वत जारी रहेगी। यह सुधार वैश्विक स्तर पर अपनाए जा रहे ‘रिस्पांसिव रेगुलेशन’, ‘ट्रस्ट – बेस्ड गवर्नेंस’ तथा ‘कम्पलायंस फर्स्ट , पनिशमेंट लाटर’ जैसे सिद्धांतों के अ नुरूप है। विकसित अर्थव्यव स्थाओं में नियामक संस्थाएं पहले व्यवसायों को नियम सम झाती हैं, सुधार का अवसर देती हैं और केवल बार-बार उल्लंघन करने वालों पर कठोर कार्रवाई करती हैं। भारत की नई व्यवस्था भी इसी आधुनि क नियामकीय दर्शन की ओर बढ़ता कदम है।
साथियों, विश्व बैंक, आर्थिक सहयोग और विकास संगठन सहित अनेक अंतरराष्ट्रीय सं स्थाएं लंबे समय से यह सुझाव देती रही हैं कि नियमन का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं बल्कि अनुपालन सुनिश्चित करना होना चाहिए। यदि व्यव साय स्वेच्छा से नियमों का पा लन करें तो मुकदमों, निरीक्ष णों और प्रशासनिक लागत में उल्लेखनीय कमी आती है। भारत का यह सुधार इसी दिशा में महत्वपूर्ण माना जा सकता है। साथियों, व्यापारिक दृष्टि से यह सुधार विशेष महत्व रखता है। इससे छोटे उद्योगों पर अनुपालन लागत कम होगी, कानूनी विवाद घटेंगे, निवेश कों का विश्वास बढ़ेगा तथा विनिर्माण क्षेत्र को प्रोत्साहन मिलेगा। विशेष रूप से मेक इन इंडिया, आत्मनिर्भर भारत, स्टार्टअप इंडिया तथा एमएस एमई विकास जैसे कार्यक्रमों को इससे अप्रत्यक्ष लाभ मिल ने की संभावना है। विदेशी निवेशक भी ऐसे देशों को प्राथ मिकता देते हैं जहां नियम स्पष्ट, पारदर्शी और पूर्वानुमेय हों। दूसरी ओर उपभोक्ता हित भी पहले की तरह सुरक्षित रहेंगे। यदि कोई व्यापारी जान बूझकर कम वजन देकर आर्थि क लाभ कमाता है, पैकेज पर गलत जानकारी लिखता है, माप उपकरणों में तकनीकी छेड़छाड़ करता है या उपभोक्ता को भ्रमित करता है, तो ऐसे मामलों में सुधार नोटिस का दुरुपयोग नहीं किया जा सके गा। सरकार ने स्पष्ट किया है कि उपभोक्ता हितों के वि रुद्ध गंभीर अपराधों पर कठो र दंडात्मक कार्रवाई जारी रहेगी। इस प्रकार यह सुधार व्यापार और उपभोक्ताकृदोनों के हितों के बीच संतुलन स्थापित करता है। प्रशासनिक दृष्टि से भी यह व्यवस्था अत्यंत मह त्वपूर्ण है। अब प्रवर्तन अधिकारी अपना अधिक समय और संसा धन उन मामलों पर केंद्रित कर सकेंगे जिनमें वास्तविक धोखाधड़ी, संगठित उल्लंघन अथवा उपभोक्ता शोषण हो रहा है। इससे निरीक्षण प्रणा ली अधिक प्रभावी बनेगी तथा न्यायिक तंत्र पर मुकदमों का बोझ भी कम होगा।
दीर्घकालिक दृष्टि से देखा जाए तो यह सुधार केवल एक कानूनी संशोधन नहीं बल्कि शासन की बदलती सोच का प्रतीक है।
सरकार अब डर आधारित अनुपालन के बजाय विश्वास आधारित अनुपालन को बढ़ा वा देना चाहती है। इससे उद्योग और सरकार के बीच सहयोग की भावना विकसित होगी, नियामकीय पार दर्शिता बढ़ेगी तथा आर्थिक गतिवि धियों को गति मिलेगी।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि कहा जा सकता है कि वि धिक मापविज्ञान अधिनियम, 2009 के अंतर्गत लागू की गई ‘सुधार नोटिस’ व्यवस्था भारत की नियामकीय प्रणाली में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह सुधार एक ओर ईमानदार कारोबारियों को पहली गलती सुधारने का अवसर देता है, वहीं दूसरी ओर उपभोक्ताओं के साथ धोखाधड़ी करने वालों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की नीति को और मजबूत करता है। ‘पहले सुधारो, फिर कार्र वाई’ का यह सिद्धांत भारत को अधिक पारदर्शी, उत्तर दायी, व्यवसाय-अनुकूल और उपभोक्ता-केंद्रित अर्थव्यव स्था बनाने की दिशा में एक दूरदर्शी कदम है। यदि इसका प्रभावी क्रियान्वयन राज्यों में समान रूप से किया जाता है, तो यह न केवल व्यापार सुगम ता को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा एगा बल्कि भारत की वैश्विक आर्थिक विश्वस नीयता और विश्वास- आधारित शासन की पहचान को भी मजबूत करेगा।
पहली गलती पर सुधार का अवसर, जानबूझ कर की गई धोखाधड़ी पर कठोर कार्रवाई – यही है भारत के विधिक माप विज्ञान तंत्र में शुरू हुए नए सुधारों का मूल दर्शन
