एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट्र)।
वैश्विक स्तर पर भारतीय राजनीति में विचारधारा, संग ठन और जनाधार को हमेशा किसी भी दल की सबसे बड़ी ताकत माना जाता रहा है। लंबे समय तक यह धारणा कायम रही कि जो नेता वर्षों तक किसी पार्टी की वैचारिक लड़ाई लड़ते हैं, संघर्ष करते हैं और संगठन को जमीन पर मजबूत बनाते हैं, वही अंततः सत्ता के शीर्ष पदों तक पहुं चते हैं। लेकिन पिछले एक दशक में भारतीय राजनीति का चेहरा तेजी से बदला है। अब राजनीति केवल वैचारिक प्रतिबद्धता का खेल नहीं रह गई, बल्कि यह चुनावी प्रबंद्दन, क्षेत्रीय प्रभाव, सामाजिक समी करण और रणनीतिक विस्तार का अत्यंत जटिल माडल बन चुकी है। इसी बदलते राजनी तिक दौर में एक नई प्रवृत्ति बेहद तेजी से उभरी है, दूसरे दलों से आए नेताओं को मुख् यमंत्री या उपमुख्यमंत्री जैसे शीर्ष पद देकर क्षेत्रीय राजनी ति पर वर्चस्व स्थापित करना। बिहार अरुणाचल प्रदेश सहित पश्चिम बंगाल में शुभेंदु अद्दि कारी का मुख्यमंत्री बनना और असम में हिमंत बिस्वा सरमा का लगातार मजबूत होते जाना केवल व्यक्तिगत राजनीतिक सफलताएं नहीं हैं, बल्कि यह उस व्यापक रणनीतिक राजनी ति का हिस्सा हैं जिसे बीजेपी ने पिछले दशक में व्यवस्थित रूप से विकसित किया है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि यह रणनीति केवल चुनाव जीतने तक सीमि त नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य उन राज्यों में स्थायी राजनीति क आधार बनाना है जहां कभी पार्टी का जनाधार बेहद कम जोर माना जाता था। भाजपा ने यह समझ लिया कि केवल संगठनात्मक विस्तार से क्षेत्रीय किले नहीं जीते जा सकते, बल्कि वहां के प्रभावशाली क्षेत्रीय चेहरों को अपने साथ जोड़कर राजनीतिक समीकर णों को बदला जा सकता है। दरअसल भारतीय राजनीति में दलबदल कोई नई घटना नहीं है। आया राम गया राम की राजनीति दशकों से भार तीय लोकतंत्र का हिस्सा रही है। लेकिन पहले दलबदल अक्सर व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा या तत्काल राजनीतिक लाभ तक सीमित रहता था। आज स्थिति अलग है। अब दलब दल को राजनीतिक दल एक रणनीतिक निवेश की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। दूसरे दलों से आने वाले नेताओं को केवल पार्टी में शामिल नहीं किया जा रहा, बल्कि उन्हें सत्ता के सबसे ऊंचे पद देकर यह संदेश दिया जा रहा है कि चुनाव जिताने की क्षमता, क्षेत्रीय प्रभाव और जनाधार संगठनात्मक वरिष्ठता से सटी कता से अधिक महत्वपूर्ण हो चुके हैं। साथियों बात अगर हम पश्चिम बंगाल की करें तो इसका सबसे बड़ा उदाहरण बनकर सामने आया। लंबे समय तक भाजपा के लिए बंगाल एक कठिन राजनीतिक क्षेत्र माना जाता था। यहां तृणमूल कांग्रेस का प्रभुत्व था और ममता बनर्जी का जनाधार बेहद मजबूत था।ऐसे में भाजपा ने केवल वैचारिक राजनीति के सहारे संघर्ष करने के बजाय तृणमूल कांग्रेस के भीतर असं तोष और महत्वाकांक्षाओं को पहचानने की रणनीति अपनाई। शुभेंदु अधिकारी, जो कभी ममता बनर्जी के सबसे भरोसे मंद नेताओं में गिने जाते थे, भाजपा के लिए वही चेहरा बने जिसने बंगाल में पार्टी को आक्रामक राजनीतिक पहचान दी। अंततः भाजपा की जीत के बाद उनका मुख्यमंत्री बन ना यह दर्शाता है कि पार्टी अब उन नेताओं को शीर्ष पर पहुंचाने में संकोच नहीं करती जो दूसरे दलों से आए हों, बशर्ते वे चुनावी सफलता दि लाने की क्षमता रखते हों।
इसी तरह असम में हिमंत बिस्वा सरमा का राजनीतिक सफर भी भारतीय राजनीति के बदलते समीकरणों की बड़ी कहानी है। कभी कांग्रेस के रणनीतिकार माने जाने वाले हिमंत सरमा ने जब भाजपा का दामन थामा, तब शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि वे पूर्वोत्तर में भाजपा के सबसे प्रभावशाली चेहरे बन जाएंगे। भाजपा ने न केवल उन्हें स्वीकार किया, बल्कि उन्हें असम का मुख्यमंत्री बनाकर पूर्वोत्तर की राजनीति का केंद्रीय चेहरा बना दिया। आज स्थिति यह है कि पूर्वोत्तर भारत में भाजपा के विस्तार का सबसे बड़ा श्रेय हिमंत बिस्वा सरमा को दिया जाता है। यह भाजपा की उस राजनीतिक समझ को दिखाता है जिसमें क्षेत्रीय प्रभाव रखने वाले नेताओं को पार्टी की राष्ट्रीय रणनीति के साथ जोड़ दिया गया।
साथियों दरअसल पीएम और गृहमंत्री की जोड़ी ने भार तीय राजनीति में चुनावी रणनी ति को एक नए स्तर पर पहुं चाया है। दोनों नेताओं ने यह महसूस किया कि कई राज्यों में भाजपा के पास वैचारिक कार्यकर्ता तो हैं, लेकिन स्था नीय सामाजिक समीकरणों को प्रभावितकरने वाले प्रभाव शाली चेहरे नहीं हैं। ऐसे में विपक्षी दलों के असंतुष्ट या महत्वाकांक्षी नेताओं को अपने साथ लाकर उन्हें नेतृत्व सौंपना अधिक व्यावहारिक राजनीतिक रणनीति साबित हो सकता है। यही कारण है कि अब भाजपा में शामिल होने वाले नेताओं को केवल राजनीतिक शरण नहीं मिलती, बल्कि उन्हें सत्ता और संगठन दोनों में निर्णायक भूमिका भी दी जाती है।
बिहार में सम्राट चैधरी का सीएम बनना इसी राजनीतिक प्रयोग का नया उदाहरण माना जा रहा है। सम्राट चैधरी पहले राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल यूनाइटेड का हिस् सा रह चुके थे। लेकिन भा जपा में आने के बाद जिस तेजी से उनका राजनीतिक कद बढ़ा, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि पार्टी अब पुराने बनाम नए की बहस से आगे निकल चुकी है। पार्टी के लिए सबसे महत्वपूर्ण वह नेता है जो सामाजिक समीकरणों को साध सके, विपक्ष को कमजोर कर सके और चुनावी जीत सुनिश्चित कर सके। त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर जैसे राज्यों में भी यही प्रवृत्ति स्पष्ट दिखाई देती है। त्रिपुरा में माणिक साहा का तेजी से उभरना, अरुणाचल प्रदेश में पेमा खांडू का कांग्रेस से भाजपा तक का सफर और मणिपुर में एन.बीरेन सिंह का कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आना,यह दर्शाता है कि भाजपा ने क्षेत्री य नेतृत्व के पुनर्निर्माण की कला में महारत हासिल कर ली है। अरुणाचल प्रदेश का घटनाक्रम तो भारतीय राजनी ति के सबसे दिलचस्प अध्यायों में गिना जाएगा, जहां कांग्रेस के मुख्यमंत्री रहे पेमा खांडू ने पहले पूरी सरकार के साथ पार्टी बदली और फिर भाजपा में विलय कर लिया।
यह केवल दलबदल नहीं था, बल्कि सत्ता संरचना के संपूर्ण पुनर्गठन का उदाहरण था। साथियों इस पूरी रणनी ति का एक महत्वपूर्ण पहलू डबल इंजन सरकार का विचार भी है। भाजपा लगातार यह संदेश देती रही है कि यदि केंद्र और राज्य में एक ही दल की सरकार हो तो विकास कार्य तेजी से होते हैं। लेकिन इस माडल को सफल बनाने के लिए राज्यों में मजबूत क्षेत्री य चेहरों की आवश्यकता थी। यही कारण है कि पार्टी ने उन नेताओं को आगे बढ़ाया जिनकी अपने क्षेत्रों में व्यक्ति गत पकड़ मजबूत थी। इससे भाजपा को दोहरा लाभ मिला एक ओर विपक्ष कमजोर हुआ और दूसरी ओर पार्टी को स्था नीय स्तर पर स्वीकार्यता मिली। हालांकि इस रणनीति ने भाज पा को चुनावी सफलता दिलाई है। साथियों लेकिन इसके साथ कई विवाद और आलोचनाएं भी जुड़ी हुई हैं। सबसे बड़ा आरोप यह लगाया जाता है कि भाजपा वॉशिंग मशीन की तरह काम करती है। विपक्ष का कहना है कि जिन नेताओं पर भाजपा विपक्ष में रहते हुए भ्रष्टाचार के आरोप लगा ती है, वही नेता भाजपा में शामिल होते ही स्वच्छ घोषित कर दिए जाते हैं।
शुभेंदु अधिकारी का मामला इसी बहस को फिर से केंद्र में ले आया है। नारदा स्टिंग आपरेशन का मुद्दा वर्षों तक भाजपा ने तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ इस्तेमाल किया। उस समय भाजपा नेताओं ने तृणमूल के कई नेताओं, जिन में शुभेंदु अधिकारी का नाम भी शामिल था, पर गंभीर भ्रष्टा चार के आरोप लगाए थे। लेकिन जब वही शुभेंदु अधि कारी भाजपा में आए और अंततः मुख्यमंत्री बने, तब विपक्ष ने भाजपा पर राजनीतिक नैति कता छोड़ने का आरोप लगा या। शिवसेना (यूबीटी) नेता सहित कई विपक्षी नेताओं ने कहा कि भाजपा भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई नहीं लड़ रही, बल्कि राजनीतिक लाभ के अनु सार अपने मानदंड बदल रही है।दरअसल यह बहस केवल भाजपा तक सीमित नहीं है। भारतीय राजनीति की लगभग सभी बड़ी पार्टियां अपने- अप ने दौर में दलबदलुओं का इस् तेमाल करती रही हैं। कांग्रेस ने भी लंबे समय तक क्षेत्रीय नेताओं को साथ लेकर अपनी शक्ति बढ़ाई थी। कई क्षेत्रीय दलों ने भी विपक्षी नेताओं को शामिल कर सत्ता का विस् तार किया। फर्क केवल इतना है कि भाजपा ने इस रणनीति को अत्यधिक आक्रामक और संगठित रूप में लागू किया है। साथियों राजनीतिक विश् लेषकों के अनुसार यह बदलाव भारतीय राजनीति में आइडि योलॉजिकल पाॅलिटिक्स से इलेक्टोरल पाॅलिटिक्स की ओर संक्रमण को दर्शाता है। अब दलों के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता चुनाव जीतना है। यदि कोई नेता जनाधार, जा तीय समीकरण, क्षेत्रीय प्रभाव और संगठनात्मक नेटवर्क लेकर आता है, तो उसका राज नीतिक अतीत गौण हो जाता है। यही कारण है कि आज राजनीतिक दलों के भीतर वैचा रिक निष्ठा की जगह विनिंग एबिलिटी यानी जीतने की क्षम ता अधिक महत्वपूर्ण बन चुकी है। साथियों यह रणनीति दक्षिण भारत में भी आने वाले वर्षों में और अधिक दिखाई दे सकती है। तमिलनाडु, तेलं गाना, आंध्र प्रदेश और केरल जैसे राज्यों में भाजपा अभी भी पूर्ण राजनीतिक प्रभुत्व स्था पित नहीं कर पाई है। ऐसे में संभावना है कि पार्टी वहां भी प्रभावशाली क्षेत्रीय नेताओं को अपने साथ जोड़ने की रण नीति को और आक्रामक रूप से अपनाएगी। तेलंगाना में पहले ही कांग्रेस और बीआर एस के कई नेता भाजपा में शामिल हो चुके हैं।
तमिलनाडु में भी भाजपा क्षेत्रीय चेहरों की तलाश में लगातार सक्रिय दिखाई देती है।भारतीय लोकतंत्र के लिए यह बदलाव कई बड़े सवाल भी खड़े करता है। क्या राज नीतिक विचारधारा अब अप्रासं गिक होती जा रही है? क्या संगठन के पुराने कार्यकर्ताओं की भूमिका कम होती जा रही है? क्या राजनीति अब केवल सत्ता प्रबंधन का माध्यम बनती जा रही है?
ये ऐसे प्रश्न हैं जिन पर आने वाले वर्षों में गंभीर बहस होगी।भाजपा की रणनीति का एक बड़ा असर क्षेत्रीय दलों पर पड़ा है। जिन राज्यों में कभी क्षेत्रीय दल अजेय माने जाते थे, वहां अब उनके भीतर असुरक्षा की भावना बढ़ी है। नेताओं को डर रहता है कि यदि पार्टी नेतृत्व कमजोर हुआ या चुनावी पराजय का खतरा पैदा हुआ, तो बड़े नेता दूसरी पार्टी में जा सकते हैं। इससे क्षेत्रीय दलों की आंतरिक एक जुटता भी प्रभावित हुई है। इसके अलावा यह प्रवृत्ति राज नीतिक कार्यकर्ताओं के मनोबल को भी प्रभावित करती है। जो कार्यकर्ता वर्षों तक पार्टी के लिए संघर्ष करते हैं, उन्हें तब निराशा होती है जब बाहर से आए नेताओं को सीधे शीर्ष पद मिल जाते हैं। लेकिन राज नीतिक दलों के लिए चुनावी सफलता सबसे अधिक सटीक महत्वपूर्ण हो चुकी है। यही कारण है कि वैचारिक समर्पण की तुलना में प्रभावशाली चेहरों की मांग पूर्ण सटीकता से बढ़ती जा रही है।
साथियों फिर भी यह कह ना गलत होगा कि यह रणनीति पूरी तरह नकारात्मक है। कई बार दूसरे दलों से आए नेता अपने प्रशासनिक अनुभव, क्षे त्रीय समझ और राजनीतिक कौशल के कारण बेहतर शासन भी दे सकते हैं। हिमंत बिस्वा सरमा को भाजपा का सफल प्रशासक माना जाता है। इसी प्रकार कई राज्यों में दलबदल कर आए नेताओं ने चुनावी राजनीति में नए समीकरण बनाए हैं। इसलिए इस रण नीति को केवल नैतिकता बना म अवसरवाद के चश्मे से देख ना पर्याप्त नहीं होगा। दरअ सल भारतीय राजनीति आज एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुकी है जहां सत्ता की लड़ाई पहले से कहीं अधिक पेशेवर, रणनीतिक और परिणाम केंद्रि त हो गई है। राजनीतिक दल अब केवल विचारधारा के आ धार पर चुनाव नहीं जीत सक ते। उन्हें सामाजिक गठजोड़, मीडिया प्रबंधन, क्षेत्रीय नेतृत्व और चुनावी गणित सभी को साथ लेकर चलना पड़ता है। भाजपा ने इस माडल को सब से प्रभावी ढंग से लागू किया है और यही कारण है कि वह लगातार नए राज्यों में अपनी पकड़ मजबूत करती जा रही है। शुभेंदु अधिकारी से हिमंत बिस्वा सरमा तक की राजनी तिक यात्राएं केवल व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की कहानियां नहीं हैं, बल्कि वे भारतीय राजनीति के बदलते चरित्र का प्रतीक हैं। यह वह दौर है जहां दलों की सीमाएं पहले की तरह कठोर नहीं रहीं। नेता अब विचा रधारा से अधिक राजनीतिक संभावनाओं के आधार पर फैसले ले रहे हैं। वहीं राज नीतिक दल भी उन नेताओं को अपनाने में संकोच नहीं कर रहे जो उन्हें चुनावी बढ़त दिला सकते हैं। आने वाले वर्षों में यह रणनीति भारतीय राजनीति को और अधिक बदल सकती है। विशेषकर दक्षिण भारत और उन राज्यों में जहां भाजपा अभी विस्तार के दौर में है, वहां दलबदल और क्षे त्रीय नेतृत्व के पुनर्गठन की राजनीति और तेज हो सकती है। इससे भारतीय लोकतंत्र में प्रतिस्पर्धा और आक्रामक होगी, लेकिन साथ ही वैचारि क राजनीति की जगह सत्ता केंद्रित राजनीति और मजबूत होती दिखाई दे सकती है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विशेषण करें तो हम पाएंगे कि भारतीय राजनीति का यह नया अध्याय यह बता ता है कि लोकतंत्र में केवल विचारधारा ही निर्णायक नहीं होती,बल्कि रणनीति, समय और सत्ता प्रबंधन भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं। राजनीति में स्थायी मित्र या दुश्मन नहीं होते स्थायी केवल सत्ता की आवश्यकता और चुनावी गणित होता है। और यही बदलती राजनीति आज भारत के लोकतांत्रिक परिदृश्य को नए रूप में गढ़ रही है।
राजनीति केवल वैचारिक प्रतिब(ता का खेल नहीं रह गई, बल्कि यह चुनावी प्रबंधन, क्षेत्राीय प्रभाव, सामाजिक समीकरण और रणनीतिक विस्तार का बन चुकी है अत्यंत जटिल माडल
