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पर्यटन स्थलों पर सुरक्षा उपकरण, विशेषकर थर्डपार्टी से नियमित सुरक्षा आडिट,नियमित और औचक निरीक्षण भारतीय न्याय संहिता की धाराओं में पारदर्शी कार्यवाही, सहित पूर्ण जवाबदेही अस्त्र चलाना जरूरी

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट्र)।
वैश्विक स्तरपर पूरी दुनियाँ नजरें भारतीय पर्यटक स्थल पर लग गई जब 30 अप्रैल 20 26 की शाम बरगी डैम (नर्मदा के बैकवाटर) में भीषण क्रूज हादसा, हुआ जिसमें प्रारंभिक रिपोर्टों के अनुसार 13 लोगों की मृत्यु हुई, केवल एक आक स्मिक दुर्घटना नहीं बल्कि हमारे पर्यटन तंत्र में गहरे पैठे सुरक्षा-संस्कृति के अभाव और प्रशासनिक लापरवाही का कठोर उदाहरण बनकर सामने आया है। जब घटनास्थल से यह तथ्य उभरकर आता है कि कई पर्यटकों ने लाइफ जैकेट नहीं पहनी थी और यह भी कि उन्हें व्यवस्थित रूप से पहनने के लिए बाध्य नहीं किया गया तथा मौसम विभाग के अलर्ट को भी नजर नजर अंदाज कर दिया गया था तो यह सवाल स्वतः उठता है कि क्या यह केवल एक त्रुटि थी या नियमों की सुनि योजित अनदेखी? इस त्रासदी का दर्द तब और गहरा हो जा ता है जब इसे हाल ही में मथु रा में हुए समान हादसे के संदर्भ में देखा जाए, जहाँ 26 लोगों की जान चली गई थी और वहाँ भी लाइफ जैकेट का अभाव या उपयोग न होना प्रमुख कारणों में शामिल था।
मैं एडवोकेट किशन सनमु खदास भावनानीं गोंदिया महा राष्ट्र यह मानता हूं कि इन दो घटनाओं के बीच का समय इतना कम है कि यह निष्कर्ष निकलना स्वाभाविक है,हमने सबक नहीं सीखा। यह स्थिति केवल किसी एक राज्य या एक प्रशासनिक इकाई की विफलता नहीं है, यह पूरे देश के पर्यटन प्रबंधन तंत्र में व्याप्त प्रणालीगत खामियों को उजा गर करती है। भारत जैसे विशा ल और विविधतापूर्ण देश में, जहाँ धार्मिक, प्राकृतिक और साहसिक पर्यटन तेजी से बढ़ रहा है, वहाँ सुरक्षा मानकों का अनुपालन केवल एक औपचारि कता नहीं बल्कि जीवन-मृत्यु का प्रश्न बन जाता है। फिर भी, जमीनी हकीकत यह है कि कई पर्यटन स्थलों पर नियम पुस्तकों तक सीमित हैं और उनका पालन ‘मुनाफे’ के दबाव में दरकिनार कर दिया जाता है। बरगी डैम की घटना में भी यही परिलक्षित होता है जहाँ पर्यटकों की सुरक्षा सुनि श्चित करने के बजाय क्रूज संचालन जारी रखा गया, भले ही परिस्थितियाँ बिल्कुल भी अनुकूल न हों।
साथियों बात अगर हम लाइफ जैकेट का अभाव या उनका उपयोग न कराया जाना इसको समझने की करें तो, इस पूरे प्रकरण का सबसे गंभीर और स्पष्ट लापरवाही का बिंदु है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जल – पर्यटन में यह एक बुनियादी और अनिवार्य सुरक्षा उपाय माना जाता है। किसी भी नाव या क्रूज के पानी में उतरने से पह ले यह सुनिश्चित करना आप रेटर की जिम्मेदारी होती है कि प्रत्येक यात्री सही ढंग से लाइफ जैकेट पहने।
यह केवल एक उपकरण नहीं बल्कि संकट की घड़ी में जीवन और मृत्यु के बीच की अंतिम दीवार होती है। ऐसे में यदि यह पाया जाता है कि जैकेट उपलब्ध नहीं थीं, या उपलब्ध होने के बाव जूद यात्रियों को पहनने के लिए बाध्य नहीं किया गया, तो यह सीधा-सीधा आपरा धिक लापरवाही का सटीक मामला बनता है।
साथियों दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है मौसम की चेतावनियों की अनदेखी। यदि मौसम वि भाग जैसे भारत मौसम विज्ञान विभाग द्वारा पहले से तेज हवा ओं या खराब मौसम की चेताव नी जारी की गई थी, और इस के बावजूद क्रूज संचालन जारी रहा, तो यह केवल जोखिम उठाने का मामला नहीं बल्कि जानबूझकर खतरे को आमं त्रित करने जैसा है। 40-50 किमीध्घंटा की तेज हवाएँ किसी भी जलयान के लिए गंभीर चुनौती होती हैं, विशेषकर तब जब उसमें आम पर्यटक सवार हों। ऐसे में प्रशासन और आपरेटर दोनों की जिम्मेदारी बनती है कि वे गतिविधियों को तत्काल रोकें, न कि मुनाफे या दबाव के चलते उन्हें जारी रखें। साथियों ओवरलोडिंग और सुरक्षा मानकों का उल्लंघन भी ऐसे हादसों के प्रमुख कार णों में शामिल होते हैं। कई बार देखा गया है कि अधिक से अधिक यात्रियों को समायो जित करने के लिए नावों में उनकी निर्धारित क्षमता से ज्यादा लोगों को बैठाया जाता है। इससे न केवल संतुलन बिगड़ता है बल्कि आपातका लीन स्थिति में बचाव कार्य भी जटिल हो जाता है। यदि बरगी डैम हादसे में भी ऐसा कोई तत्व सामने आता है, तो यह और अधिक गंभीरता से जांच और कार्रवाई की मांग करता है। यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य है कि सुरक्षा उपकरण जैसे लाइफ बोट, सिग्नलिंग डिवाइस, प्रशिक्षित स्टाफ का अभाव स्थिति को और घातक बना देता है।
साथियों प्रशासनिक जवाब देही इस पूरे विमर्श का केंद्र बिंदु है। पर्यटन विभाग और स्थानीय प्रशासन की यह प्राथ मिक जिम्मेदारी होती है कि वे सभी ऑपरेटरों को लाइसेंस देने से पहले उनकी सुरक्षा तैयारियों की जांच करें और नियमित अंतराल पर निरीक्षण करें।
यदि यह पाया जाता है कि नियमों का उल्लंघन लंबे समय से हो रहा था और इस के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं की गई, तो यह केवल चूक नहीं बल्कि ‘सांठगांठ’ या ‘सिस्ट मेटिक फेल्योर’ की ओर संकेत करता है। ऐसे मामलों में केवल निचले स्तर के कर्मचारियों को दोषी ठहराना पर्याप्त नहीं होता, उच्च स्तर के अधिकारियों की भूमिका की भी गहन जांच आवश्यक होती है।
साथियों कानूनी दृष्टिकोण से देखें तो ऐसी घटनाओं में भारतीय न्याय संहिता (बीएन एस) या पूर्ववर्ती आईपीसी की धाराएँ स्पष्ट रूप से लागू होती हैं। धारा 304ए (लापरवाही से मृत्यु) ऐसे मामलों में सामा न्यतः लगाई जाती है, जहाँ किसी की असावधानी या लापरवाही के कारण किसी की जान चली जाती है। परंतु यदि यह सिद्ध हो जाए कि जोखिम के बारे में पूर्व जान कारी थी और फिर भी जान बूझकर उसे नजरअंदाज किया गया, तो धारा 304 (गैर-इरा दतन हत्या) या यहाँ तक कि धारा 302 (हत्या) के तहत भी मामला बन सकता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि जांच में मेनस रिया, अप राध की मानसिक स्थिति कित नी गंभीर पाई जाती है। बरगी और मथुरा जैसी घटनाओं के संदर्भ में यह बहस प्रासं गिक है कि क्या केवल लापर वाही कहना पर्याप्त है, या इसे अधिक कठोर आपराधिक श्रेणी में रखा जाना चाहिए।
साथियों दिनांक 26 अप्रैल 2026 को मैं खुद अपने पूरे परिवार सहित उत्तराखंड राज्य के एक पर्यटक स्थल ऋषि केश के रामझूला व गंगा तट पर था, ऋषिकेश में राम झूला और नाव यात्रा के दौरान इस समस्या की व्यापकता को और स्पष्ट रूप से मैंने देखा कि राम झूला के बीच में दो बड़े सांड व दो गाय खड़ी थी मैंने गाइड से पूछा तो उन्होंने कहा साहब यह रोज की बात है इस पर मैंने कहा अगर यह दोनों सांड आपस में लड़े तो जान माल का काफी नुकसान होगा तो गाइड ने कहा साहब यहां सुनने वाला कोई नहीं है फिर जब नीचे मैं अपने परि वार सहित नाव से दूसरा किना रा पार करने के लिए प्रति व्यक्ति 40 रूपए की टिकट लेकर नाव पर बैठा तो वहां देखा कि किसी ने लाइफ सेफ जैकेट नहीं पहना था मगर मेरे आग्रह करने पर फिर सभी ने लाइफ सेव जैकेट पहने जब एक पर्यटक को स्वयं दूस रों को लाइफ जैकेट पहनने के लिए प्रेरित करना पड़े, और नाव संचालक या कप्तान इस बुनियादी जिम्मेदारी को नजर अंदाज कर दे, तो यह केवल एक स्थान की समस्या नहीं बल्कि पूरे तंत्र में व्याप्त सुरक्षा के प्रति उदासीनता का प्रमाण है। यह स्थिति दर्शाती है कि नियम केवल कागजों पर मौजूद हैं, जबकि जमीनी स्तर पर उनका पालन सुनिश्चित कर ने वाला कोई प्रभावी तंत्र नहीं है। साथियों भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए बहु-स्तरीय और सख्त कदम उठाने की आवश्यकता है। सब से पहले, लाइफ जैकेट का अनिवार्य उपयोग केवल एक नियम नहीं बल्कि ‘नान- नेगो शिएबल’ शर्त होना चाहिए बिना जैकेट के किसी भी यात्री को नाव या क्रूज पर चढ़ने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। इसके लिए तकनीकी उपाय जैसे बोर्डिंग गेट पर सेंसर या डिजिटल चेक भी अपनाए जा सकते हैं।
दूसरा, आपरेटरों के लाइ सेंसिंग सिस्टम को पारदर्शी और सख्त बनाया जाना चाहि ए, जिसमें नियमित और औच क निरीक्षण शामिल हों।
तीसरा, मौसम संबंधी गाइड लाइंस को कानूनी रूप से बाध्यकारी बनाया जाए यदि चेतावनी जारी हो, तो संचा लन स्वतः निलंबित हो जाए। इसके अतिरिक्त, क्रूज और नावों पर कार्यरत कर्मचारियों का प्रशिक्षण अत्यंत आवश्यक है। उन्हें आपातकालीन स्थि तियों से निपटने, प्राथमिक उप चार देने और बचाव कार्यों का संचालन करने में दक्ष होना चाहिए। क्षमता का कड़ाई से पालन भी अनिवार्य है इसमें किसी भी प्रकार की ढील सीधे खतरे को आमंत्रित कर ती है। अंततः, पर्यटन स्थलों पर नियमित ‘सुरक्षा आडिट’ विशेषकर थर्ड-पार्टी एजेंसियों द्वारा कराया जाना चाहिए, ताकि निष्पक्ष मूल्यांकन हो सके और खामियों को समय रहते दूर किया जा सके।
बरगी डैम और मथुरा जैसी त्रासदियाँ हमें यह सिखाती हैं कि विकास और पर्यटन के नाम पर यदि सुरक्षा से समझौ ता किया गया, तो उसकी कीमत मानव जीवन से चुका नी पड़ती है।
यह केवल आं कड़ों का खेल नहीं बल्कि उन परिवारों की पीड़ा है जिन्होंने अपने प्रियजनों को खो दिया। इसलिए अब समय आ गया है कि ‘दुर्घटना’ शब्द के पीछे छिपने के बजाय ‘जवाबदेही’ को केंद्र में लाया जाए। जब तक दोषियों पर कठोर और उदाहरणात्मक कार्रवाई नहीं होगी चाहे वे आपरेटर हों, अधिकारी हों या नीति- निर्मा ता तब तक यह चक्र नहीं टूटे गा। अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि यह केवलसरकार या प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं बल्कि समाज के प्रत्येक नागरिक की भी भूमिका है। जागरूकता, सतर्कता और निय मों के प्रति सम्मान ये तीनों मिलकर ही एक सुरक्षित पर्य टन संस्कृति का निर्माण कर सकते हैं। लेकिन नेतृत्व की जिम्मेदारी शासन और प्रशा सन पर ही आती है, और उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में कोई भी पर्यटक केवल एक लापरवाही के का रण अपनी जान न गंवाए।
बरगी डैम की यह त्रासदी एक चेतावनी है, यदि अब भी नहीं चेते, तो अगली खबर किसी और शहर, किसी और नदी से आ सकती है।

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