Breaking News

गेहूं के ज्वारे से सम्भव है कई रोगों का उपचार

(अर्जुन यादव)
गेहंू की रोग निवारक क्षमता को अब विष्व भर में मान्यता मिल रही है। अमेरिका की एक डाॅक्टर एन विग्मोर ने गेहूं की अनूठी रोग नाषक शक्ति को परखने के लिए अनेक प्रयोग किए और उन्होंने पाया कि अनेक साध्य-असा ध्य रोगों में गेहंू के प्रयोग के परिणाम अप्रत्याषित रूप से सुखद रहे। डाॅक्टर विग्मोर ने गेहूं के ज्वारे या घास के रस का प्रयोग किया। उनके प्रयोग अन्य चिकित्सकों ने भी दुहराए और उन्होंने डाॅ. विग् मोर का भरपूर समर्थन किया।
भारत में सन् 1977 में डाॅक्टर विग्मोर विष्व शाकाहा री कांग्रेस में भाग लेने आई थीं। उन्होंने गेहूं के ज्वारे के रस को ग्रीन ब्लड (हरा रक्त) की संज्ञा दी है। इस हरे रक्त की रचना हमारे रक्त से काफी मिलती-जुलती है।
हमारे खून में उपस्थित लौह तत्व के स्थान पर इसमें मैग्नीषि यम होता है। ‘हरा रक्त‘ हमारे खून का शुद्धिकरण करने के साथ-साथ लगभग 40 प्रतिषत रक्त का निर्माण भी करता है। यह रक्त संबंद्दी रोग थैलासीमिया के इलाज में भी सकारात्मक परिणाम देता है। गेहूं के ज्वारे के रस को लेकर डाॅ. विग्मोर ने एक पुस् तक ‘व्हाय सफर‘ लिखी है। एक अन्य पुस्तक ‘बी योर ओन डाॅक्टर‘ में उन्होंने ‘हरे रक्त‘ के बारे में विस्तार से लिखा है। इस पुस्तक का संक्षिप्त रूपांतरण ‘अपने डाॅक्टर आप बनो‘ शीर्षक से हिन्दी में भी प्रकाषित हुआ है। प्राकष्तिक चिकित्सा में मह त्वपूर्ण स्थान प्राप्त गेहूं के ज्वारे के रस का प्रयोग हमारे यहां काफी समय से हो रहा है। योग गुरु रामदेव द्वारा इसकी विषेष चर्चा से लोगों में इसके प्रति काफी जागरू कता और जिज्ञासा बढ़ी है। ‘हरे रक्त‘ के प्रचार-प्रसार के साथ ही इसका प्रचलन बढ़ने लगा है। अब यह एक उद्योग के रूप में सामने आ रहा है। दिल्ली की एक कंपनी साहिल एग्रो ने विषेष ढं़ग से उगाए चुने हुए गेहूं के ज्वारे या घास लोगों को उपलब्द्द कराने की व्यवस्था भी की है। गेहूं का पौधा पष्थ्वी से अनेक पोषक तत्व सोख लेता है और इसका सेवन करने वाले व्यक्ति की रोग प्रतिरोद्दक क्षम ता बढ़ जाती है। गेहूं सहित अन्य अंकुरित दाल- अनाजों का प्रयोग भी निरन्तर बढ़ रहा है। इसी प्रकार विभिन्न फल-सब्जियों के रस का गुणानुसार रोगोपचार में खून प्रयोग किया जा रहा है।
गेहूं की घास या ज्वारे की ‘फसल‘ स्वयं तैयार करना बेहद आसान है। सामान्य या छोटे आकार के 15 मिट्टी के गमले लें और उनमें किनारे से एक-डेढ़ इंच नीचे तक मिट्टी भर दें। मिट्टी जमीन के कुछ नीचे खोदने के बाद निकाली गयी हो। इन गमलों को ऐसे स्थान पर रखना चाहिए जहां सूरज की रोषनी तो आए पर सीधी धूप न लगे और वह स्थान हवादार भी हो। उत्तम श्रेणी के गेहंू लेकर साफ कर लें। गेहूं लगभग एक मुट्ठी पानी में भली-भांति होकर फैला दें। अब पहले गमले में इन गेहूं के दानों को बो दें और थोड़ा पानी डाल दें।
दूसरे दिन दूसरे गमले में, तीसरे दिन तीसरे गमले में- इसी प्रकार 15 दिन तक नित्य बुआई करते रहें। समय -समय पर सभी गमलों में थोड़ा-थोड़ा पानी डालते रहें। 8-12 दिनों में गेहूं के दाने अंकुरित होकर पौधों या ज्वारों में बदल जाएंगे। इनकी लम्बाई 7-8 इंच हो जाती है।
पहले गमले में से 25-30 पौद्दे जड़ के पास से काट लें। इन्हें पानी में धोकर कुछ देर रख दें फिर पीसकर ‘गेहूं‘ का रस निचोड़ कर छान लें। इस ताजा रस को ही रोगी को सुबह-षाम पिलाना चाहिए। यही प्रयोग प्रतिदिन करना चाहिए। खाली होते गमलों में पूर्ववत फिर गेहूं बोते जाना चाहिए। इस प्रकार हरे खून का नियमित सेवन करने वाले व्यक्ति का भयंकर से भयंकर रोग भी छूमंतर हो जाता है। डाॅ. विग्मारे ने हजारों रोगियों पर परीक्षण किया और उन्हें शत प्रतिषत सफलता मिली।
गेहूं के ज्वारे मानव स्वास् थ्य के प्रकष्ति का श्रेष्ठतम और एकदम सुरक्षित वरदान हैं। यह एक सर्वश्रेष्ठ प्राकष्तिक आहार है जिसमें रोगनाषी व पोषक विटामिन, खनिज व एन्जाइम प्रचुर मात्रा में होते हैं। इसका सेवन रोग प्रतिरो द्दक शक्ति बढ़ाता है और शरीर को पुष्ट व शक्तिषाली बनाता है। ‘हरे खून‘ में पाया जाने वाला क्लोरोफिल मानव रक्त में उपस्थित हेमिम के समान होता है। शायद इसी लिए गेहूं की घास के इस रस को ‘हरा रक्त‘ नाम दिया गया है। इस रस से कैंसर तक के इलाज के अनेक उदा हरण मौजूद हैं। थोड़े समय में ही इस प्रभावषाली प्रकष्ति -वरदान का असर स्पष्ट दि खाई देने लगता है। शरीर में नूतन ऊर्जा का संचरण होने लगता है। त्वचा, आंखों का रंग रूप बदल जाता है और ऐसा लगता है मानो कायाकल्प हो गया हो। उम्र कम दिखने लगती है। शरीर स्वस्थ हो जाता है और ऐसा लगता है मानो कायाकल्प हो गया हो। रक्त में हीमोग्लोबिन का स्तर बढ़ जाता है जो रोग प्रतिरो धक क्षमता का ही परिचायक है। इस हरे खून की मात्र 100 मिलीलीटर मात्रा 2.5 किलोग्राम पोषक सब्जियों के समान होती है।
गेहूं के ज्वारे के रस से कब्ज दूर होती है और वायु- उदर विकार दूर होते हैं। रक्त शुद्धि के गुण के कारण इसके सेवन से रक्त विकार जनित फोड़े-फुंसी व चर्म रोगों से भी मुक्ति मिलती है। मूत्राषय संबंधी विकार, जलन और शुक्र विकार आदि दूर होते हैं। गुर्दों की क्रियाषीलता बढ़ती है तथा पथरी भी गल जाती है। दांत व हड्डियों में मजबूती आती है। सिरदर्द से बचाव होता है। तनाव से मुक्ति मिलती है। केष सुंदर हैं और असमय सफेद नहीं होते। स्मरण शक्ति व नेत्र ज्योति बढ़ती है और स्नायु प्रबल होते हैं। रक्तचाप, हृदय विकार की षिकायत नहीं होती तथा लकवे की संभावना खत्म होती है। पेट के कीड़े बाहर निकल जाते हैं। रक्ताल् पता (एनीमिया), एथिरो स्लेरी सिस, आंतरिक हेमरेज आदि में इसका सेवन बहुत उपयोगी सिद्ध होता है। साधारण सर्दी, दमा, ब्राॅकाइटिस आदि श्वसन तंत्र संबंधी रोगों में ‘हरे रक्त‘ के सेवन से लाभ मिलता है। इन रोगों में दमा ऐसा है जिस के बारे में कहा जाता है कि दमा दम के साथ जाता है।
पाचन तंत्र के विभिन्न रोगों में हरा खून अत्यंत गुणकारी सिद्ध होता है। इससे बेहतर अन्य कोई उपचार नहीं है। कब्ज, अपच, मरोड़, जी मित लाना, खट्टी डकारें, पेट व आंतों का अल्सर, आतों की सूजन, गले में दर्द व सूजन, आंतों की सूजन, पेट के कीड़े, मधुमेह आदि परेषानियों में यह रस रामबाण औषधि की भांति कार्य करता है। कब्ज के उपचार के ज्वारे को भली भांति चबाते हुए मुंह में लुगदी जैसा बना लें और निगल जाएं। लाभ मिलेगा। पत्ता गोभी या बंद गोभी का रस मिलाकर सेवन करने से पेट व आंत के अल्सर में लाभ होता है।
दंत छिद्र, हिलते दांत, मसूढ़ों का संक्रमण, मसूढ़ों में अल्सर व इनसे खून आदि आना जैसे दांत व मसूढ़ों के विकारों में गेहूं के ज्वारों का रस पर्याप्त लाभदायक होता है। जोड़ों की सूजन, दर्द, आस्टियो-आर्थराइटिस, अस् िथ भंगुरता आदि रोगों में यह रस चिकित्सा लम्बे समय तक करनी पड़ती है। लाभ भी मिलता है पर धीमे-धीमे। एक्जिमा, मंुहासे, झाइयों, छाले, चोट, घाव, जन्तुओं के काटे का जहर, जलने से त्वचा को हुई क्षति में यह औषद्दि लाभदायक है क्योंकि इसके रक्त शोधक होने के गुण के कारण इसका उपचार सुनि ष्चित और प्रभावी होता है। चर्म संबंधी रोगों में रस पीने के साथ प्रभावित स्थान पर धीरे-धीरे लेपन भी करना चाहिए और गेहूं के ज्वारे के रस में भीगी पुल्टिस भी रखनी चाहिए। जल्दी ही लाभ मिलता है। गुर्दे संबंधी रोगों में यह बहुत उपयोगी होता है। यदि चुम्बकित जल का सेवन भी किया जाए तो परि णाम अच्छा और शीघ्र देखने को मिलता है।
अनिद्रा दौर्बल्य, ज्वर सिर दर्द आदि अन्य विभिन्न रोगों में यह ‘गेंहू रस‘ बहुत लाभप्रद सिद्ध होता है। गेहूं के ज्वारे का रस निःसंदेह बहुत गुणका री होता है पर इसके उपयोग से पहले कुछ आवष्यक बातें और सावधानियों पर भी ध्यान देना आवष्यक है अन्यथा अपे क्षित लाभ प्राप्त नहीं होगा-
– हरा रक्त सेवन करने से पहले व बाद में 25-30 मिनट तक कुछ भी खाना- पीना नहीं चाहिए। रस फ्रिज में या ऐसे ही रखने के बाद सेवन न करें। ताजा निकाला रस ही उपयोग में लाएं। आरम्भ में कम मात्रा (75 मिलीलीटर) में चुकन्दर व गेहूं के ज्वारे का रस मिलाकर सेवन करें। यदि आरम्भ में दस्त, उल्टी, सर्दी या थोड़ा ज्वर आदि हो तो घबराना नहीं चाहिए। यदि ऐसी परेषानी 3 दिन बाद भी ठीक न हो तो तत्काल रस का सेवन बंद कर देना या मात्रा बहुत कम कर देनी चाहिए। सामान्य होने पर रस सेवन पुनः आरंभ करें। रस को द्दीरे-धीरे पीना चाहिए। इसके सेवन काल में सादा और संतुलित भोजन निष्चित समय पर करना चाहिए।
अधिक मिर्च, मसाले तेल व खटाई के प्रयोग से बचना चाहिए। रस निकालने में असु विद्दा अनुभव हो तो ज्वारे सीधे ही चलकर प्रयोग करें। रस निकाले फोक में थोड़ा नमक मिलाकर खाया जा सक ता है। इसे फेंकना नहीं चाहिए। इसी प्रकार गाजर, पालक, आंवला, चुकंदर आदि के रसों का भी विभिन्न व्या धियों से मुक्त होने के लिए उपयोग किया जाता है।
इस बारे में पर्याप्त जान कारी प्राप्त करने के बाद या योग्य व्यक्ति की देखरेख में ही उपचार करना चाहिए।