एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट्र)।
वैश्विक स्तरपर मध्य- पूर्व एक बार फिर उस ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा दिखाई दे रहा है जहाँ क्षेत्रीय संघर्ष वैश्विक संकट का रूप ले सकता है। हाल के घटनाक्रमों में ईरान, इजराइल और यूनाइटेड स्टे ट्स के बीच बढ़ते सैन्य टक राव ने न केवल पश्चिम एशिया बल्कि पूरे विश्व की शांति और सुरक्षा को गंभीर चुनौती दे दी है। विशेष रूप से ईरान के सर्वोच्च नेता खामनेई की मौत के बाद उभरी प्रतिशोद्द की राजनीति और तीखी सैन्य बयान बाजी ने हालात को और अधिक विस्फोटक बना दिया है। खामेनेई की मौत के बाद ईरान में प्रतिशोध की भावना अत्यधिक तीव्र हो गई है। ईरान के सुरक्षा प्रति ष्ठान से जुड़े नेताओं और पूर्व कमांडरों ने खुले शब्दों में यह घोषणा की है कि इस घटना का बदला लिया जाएगा।
विशेष रूप से इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कार्प्स के पूर्व कमांडरों ने सीधे तौर पर अमेरिकी नेतृत्व को निशाना बनाते हुए कहा है कि ईरान अपने नेता के खून का हिसाब अवश्य लेगा।खामेनेई की मौत के बाद इजरायल की ओर से यह बयान देना कि नए सर्वोच्च नेता के चयन में शामिल लोगों को भी निशाना बनाया जा सकता है, यह दर्शाता है कि इजरायल इस संघर्ष को केवल सैन्य अभियान तक सी मित नहीं बल्कि राजनीतिक संरचना को प्रभावित करने की रणनीति के रूप में देख रहा है। ट्रंप ने ईरान की चेता वनियों को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि उन्हें इन धमकियों से कोई फर्क नहीं पड़ता। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान पहले ही इस युद्ध को हार चुका है और जब तक तेहरान बिना शर्त आत्म समर्पण नहीं करता, तब तक अमेरिकी सैन्य कार्रवाई जारी रहेगी। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि यदि इस संघर्ष को समय रहते कूटनीतिक उपायों से नियंत्रित नहीं किया गया,तो यह केवल क्षेत्रीय युद्ध तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि विश्व – व्यापी अस्थिरता का कारण बन सकता है।इस पूरे संघर्ष का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इसमें परमाणु हथियारों के उपयोग की आशं का से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता। ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय समु दाय में चिंता रही है। वहीं इजरायल के पास पहले से ही परमाणु हथियार होने की संभावना मानी जाती है, हालां कि उसने कभी आधिकारिक रूप से इसकी पुष्टि नहीं की है। यदि यह संघर्ष पूर्ण युद्ध में बदलता है और इसमें पर माणु हथियारों का प्रयोग होता है, तो इसके परिणाम केवल मध्य-पूर्व तक सीमित नहीं रहेंगे बल्कि पूरी दुनिया पर गंभीर प्रभाव डाल सकते हैं।
इतिहास में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद परमाणु हथियारों का प्रयोग नहीं हुआ है। लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में यदि क्षेत्रीय युद्ध नियंत्रण से बाहर हो जाता है तो यह संभावना भी पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता।
साथियों बात अगर हम खामेनेई की मौत और बदलती शक्ति- राजनीति को समझने की करें तो,हालिया घटनाओं में सबसे बड़ा झटका ईरान के सर्वोच्च नेता की मौत को माना जा रहा है।खामेनेई ईरान की राजनीति, धार्मिक नेतृत्व और सैन्य रणनीति के केंद्र में रहे थे। उनकी मृत्यु केवल एक नेता की मृत्यु नहीं बल्कि ईरान की राजनीतिक संरचना में एक बड़े परिवर्तन का संकेत भी है।खामेनेई की मौत के बाद ईरान के भीतर सत्ता संरचना को स्थिर बनाए रखना एक बड़ी चुनौती बन गया है। ईरान का संविधान सर्वोच्च नेता के चयन की प्रक्रि या को स्पष्ट रूप से निर्धा रित करता है,जिसके तहत 88 सदस्यीय विशेषज्ञ परिषद नए नेता का चयन करती है। यह परिषद धार्मिक विद्वानों और वरिष्ठ राजनीतिक नेता ओं से मिलकर बनी होती है। इस परिषद का निर्णय केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि राजनीतिक और सैन्य दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। खामेनेई की मौत के बाद इस परिषद ने नए सर्वोच्च नेता के चयन की प्रक्रिया को तेज कर दिया है। किंतु इस बीचइजरायल की ओर से यह चेतावनी दी गई है कि जो भी व्यक्ति ईरान के नए सर्वोच्च नेता के रूप में उभरेगा या चयन प्रक्रिया में शामिल होगा, उसे भी निशाना बनाया जा सकता है। यह बयान क्षेत्रीय तनाव को और अधिक भड़का ने वाला माना जा रहा है।
साथियों बात अगर हम ईरान की चेतावनी व ट्रंप कीप्रतिक्रिया और अमेरिकी रणनीति को समझने की करें तो, इस संदर्भ में ईरान के एक प्रमुख नेता ने अमेरिकी राष्ट्र पति ट्रम्प को सीधे चेतावनी देते हुए कहा कि उन्हें उनके कार्यों की भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान ट्रंप को कभी अकेला नहीं छोड़ेगा और उनके खि लाफ कार्रवाई जारी रखेगा।
यह बयान केवल व्यक्तिगत धमकी नहीं बल्कि एक व्या पक रणनीतिक संकेत माना जा रहा है कि ईरान इस संघर्ष को दीर्घकालिक प्रति शोध के रूप में देख रहा है। ईरान के भीतर यह धारणा मजबूत हो रही है कि अमेरिका और इजरायल ने मिलकर उस के सर्वोच्च नेता को निशाना बनाया है। इस कारण वहां जनता और सैन्य नेतृत्व के बीच प्रतिशोध की भावना और भी अधिक तीव्र हो गई है।
इन धमकियों पर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने अत्यंत कठोर प्रतिक्रिया दी है, ट्रंप का यह बयान अमेरिकी रणनीति को स्पष्ट करता है। अमेरिका लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रभाव को सीमित करने की नीति अपनाता रहा है। अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि यदि ईरान को अभी नहीं रोका गया तो वह मध्य-पूर्व में अपनी सैन्य और राजनीतिक ताकत को इतना मजबूत बना सकता है कि भविष्य में उसे नियंत्रित करना कठिन हो जाएगा। इसी कारण अमेरिका ने इजरायल के साथ मिलकर कई सैन्य अभियानों को अंजाम दिया है,जिनका उद्देश्य ईरान की सैन्य क्षमताओं और उसके परमाणु कार्यक्रम को सटीक रूप से कमजोर करना बताया जाता है।
साथियों बात अगर हम इस्लामिक देशों और वैश्विक प्रतिक्रिया को समझने की करें तो ईरान के खिलाफ हुए हमलों और खामेनेई की मौत के बाद कई इस्लामिक देशों में तीखी प्रतिक्रियाएँ देखने को मिल रही हैं। कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन हुए हैं और अमेरिका तथा इजरायल के खिलाफ नाराजगी बढ़ती दि खाई दे रही है।
यदि यह विरोध व्यापक राजनीतिक आंदोलन में बदल ता है तो इससे कई देशों की आंतरिक राजनीति भी प्रभावित हो सकती है। साथ ही इससे वैश्विक स्तर पर अमेरिका और उसकेसहयोगियों के प्रति असंतोष बढ़ सकता है।
कूटनीति की आवश्यकता इन परिस्थितियों में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या इस युद्ध को रोका जा सकता है। इतिहास बताता है कि जब भी संघर्ष चरम पर पहुंच ता है, तब कूटनीतिक प्रयास ही स्थायी समाधान का रास्ता बनते हैं। संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ, रूस, चीन और अन्य प्रमुख शक्तियाँ यदि सक्रिय कूटनीति क पहल करें तो संभव है कि इस संघर्ष को नियंत्रित किया जा सके।
युद्ध की आग को शांत करने के लिए संवाद, मध्यस् थता और अंतरराष्ट्रीय दबाव जैसे उपाय अत्यंत आवश्यक हैं। साथियों बात अगर हम मध्य- पूर्व में बढ़ती सैन्य गति विधियों को समझने की करें तो,हाल के दिनों में तेहरान के पास स्थित तेल उत्पादन और प्रसंस्करण इकाइयों पर मिसाइल हमले इस संघर्ष के सैन्य आयाम को और अधिक स्पष्ट करते हैं। इन हमलों से ईरान के ऊर्जा बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा है,जो उसकीअर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर हमला केवल सैन्य रणनीति नहीं बल्कि आर्थिक दबाव बनाने का भी प्रयास होता है। यदि ईरान की ऊर्जा उत्पादन क्षमता प्रभावित होती है तो उसकी अर्थव्यवस्था कमजोर होगी और युद्ध जारी रखने की उसकी क्षमता भी प्रभावित हो सकती है।हालांकि ऐसे हमले वैश्विक ऊर्जा बाजारों को भी प्रभावित कर सकते हैं क्योंकि मध्य -पूर्व विश्व के सबसे बड़े तेल उत्पादक क्षेत्रों में से एक है।इजरायल के प्रधानमंत्री लंबे समय से यह कहते रहे हैं कि ईरान इजरायल के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
इजरायल का आरोप है कि ईरान क्षेत्र में कई सशस्त्र संगठनों को समर्थन देता है, जिनमें लेबनान का हिजबुल्लाह और गाजा के कई संगठन शामिल हैं। इजरायल का मानना है कि यदि ईरान पर माणु हथियार विकसित करने में सफल हो जाता है तो यह पूरे क्षेत्र की सुरक्षा को खतरे में डाल देगा। इसी कारण इजरायल ने कई बार ईरान के सैन्य ठिकानों और परमाणु सुविधाओं को निशाना बनाने की चेतावनी दी है।
साथियों बात अगर हम भारत सहित विश्व के लिए संभावित प्रभाव को समझने की करें तो यदि यह संघर्ष लंबे समय तक चलता है तो इसका प्रभाव केवल मध्य-पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा। तेल की कीमतों में भारी वृद्धि, वैश् िवक व्यापार में बाधा और सुर क्षा संकट जैसे परिणाम साम ने आ सकते हैं। भारत जैसे देशों के लिए यह विशेष रूप से चिंताजनक होगा क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकता ओं का बड़ा हिस्सा मध्य-पूर्व से आयात करता है। साथ ही इस क्षेत्र में लाखों भारतीय काम करते हैं, जिनकी सुरक्षा भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकती है। मध्य-पूर्व लंबे समय से भू-राजनीतिक प्रतिस् पर्धा और वैचारिक संघर्ष का केंद्र रहा है। इस क्षेत्र में ऊर्जा संसाधनों की प्रचुरता, धार्मिक -सांस्कृतिक विविधता और वैश्विक शक्तियों के रणनीतिक हितों ने इसे लगातार संघर्षों का मैदान बनाया है।
ईरान और इजरायल के बीच दशकों से चली आ रही शत्रुता इस संघर्ष की प्रमुख धुरी है। ईरान स्वयं को इस्लामी क्रांति का प्रतिनिधि मानता है और पश्चिमी प्रभाव का विरोध करता रहा है, जब कि इजरायल अपने अस्तित्व और सुरक्षा कोसर्वोपरि मानते हुए किसी भी संभावित खतरे को समाप्त करने की नीति अपनाता रहा है।
अमेरिका का इस समी करण में प्रवेश इस पूरे संकट को और अधिक जटिल बना देता है। अमेरिका लंबे समय से इजरायल का रणनीतिक सहयोगी रहा है और मध्य-पूर्व में उसकी सैन्य तथा राजनीतिक उपस्थिति अत्यंत प्रभावशाली रही है। परिणाम स्वरूप जब भी ईरान और इजरायल के बीच तनाव बढ़ता है, अमेरिका अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष रूप से इसमें शा मिल हो जाता है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि मध्य-पूर्व में उभरता यह संघर्ष केवल तीन देशों के बीच की लड़ाई नहीं बल्कि वैश्विक शक्ति- राजनीति का प्रतिबिंब है। ईरान, इजराइल और यूनाइटेड स्टेट्स के बीच बढ़ता टकराव दुनिया को उस मोड़ पर ले जा सकता है जहाँ से वापस लौटना कठिन हो जाए।खामेनेई की मौत, ईरान की प्रतिशोध की चेतावनी, ट्रंप की कठोर प्रतिक्रिया और इजरायल की आक्रामक रण नीति, ये सभी घटनाएँ मिल कर एक ऐसे संकट को जन्म दे रही हैं जिसकी गूंज पूरी दुनिया में सुनाई दे रही है।ऐसे समय में विश्व समुदाय के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह युद्ध के रास्ते को छोड़कर शांति और कूटनीति का मार्ग अपनाने के लिए सभी पक्षों को प्रेरित करे।
यदि ऐसा नहीं हुआ तो इतिहास एक बार फिर मान वता को यह याद दिला सक ता है कि युद्ध की आग जब भड़कती है तो वह सीमाओं को नहीं पहचानती।
ईरान-अमेरिका-इजरायल टकराव और संभावित वैश्विक परिणाम- बढ़ता टकराव दुनिया को उस मोड़ पर ले जा सकता है जहाँ से वापस लौटना कठिन हो जाएगा?
