एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट्र)।
वैश्विक स्तर पर पश्चिम एशिया में चल रहा सैन्य तनाव केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि उसने पूरी दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा को चुनौती दे दी है। ईरान और कई अरब देशों के बीच बढ़ते सैन्य टकराव ने वैश्विक तेल आपूर्ति की जीवनरेखा माने जाने वाले समुद्री मार्गों को अस्थिर कर दिया है। इसका सबसे बड़ा प्रभाव उस संकीर्ण समुद्री मार्ग पर पड़ा है जिस के माध्यम से दुनिया का लग भग एक-तिहाई समुद्री तेल व्यापार गुजरता है। जैसे – जैसे संघर्ष बढ़ रहा है, तेल बाजार में अनिश्चितता और भय का माहौल बन गया है। ऐसे समय में भारत जैसे ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे अपनी घरेलू ऊर्जा जरूरतों को कैसे स्थिर रखें। इसी संदर्भ में अमेरिका द्वारा भारत को रूस से कच्चा तेल खरीदने के लिए 30 दिनों की अस्थायी छूट देना एक अत्यंत महत्वपूर्ण भू- राज नीतिक और आर्थिक निर्णय बन गया है जबकि कांग्रेस अमेरिका की ओर से मिली छूट को न सिर्फ भारतीय संप्र भुता पर हमला बता रही है, बल्कि केंद्र सरकार की यह कहकर आलोचना कर रही है कि आखिर अमेरिका इस तरह से हमें कबतक ब्लैकमेल करता रहेगा।
मैं एडवोकेट किशन सन मुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूँ कि यह निर्णय न केवल भारत की ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित करे गा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा राज नीति के नए समीकरण भी स्थापित कर सकता है। बता दें भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता देश है और अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है। देश की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है और इसके साथ ही ऊर्जा की मांग भी लगातार बढ़ रही है। पिछले कुछ वर्षों में भारत की दैनिक तेल खपत में लगातार वृद्धि हुई है और अनुमान है कि आने वाले वर्षों में यह और बढ़ेगी।
ऐसी स्थिति में यदि वैश् िवक आपूर्ति बाधित होती है तो उसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ सक ता है। इसलिए भारत के लिए ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण और आपूर्ति की स्थिरता बनाए रखना अत्यंत आवश्यक हो गया है। इसी पृष्ठभूमि में अमेरिका द्वारा भारत को रूस से कच्चा तेल खरीदने की 30 दिन की अस्थायी छूट देना एक महत्वपूर्ण रणनीतिक कदम है। अमेरिकी वित्त विभाग ने यह स्पष्ट किया है कि यह छूट केवल उन तेल टैंकरों के लेन- देन के लिए दी गई है जो पहले से समुद्र में फंसे हुए हैं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि वैश् िवक बाजार में तेल का प्रवाह पूरी तरह से बाधित न हो। अमेरिकी अधिकारियों का कह ना है कि यह कदम अल्पका लिक है और इससे रूसी सर कार को कोई बड़ा आर्थिक लाभ नहीं होगा।
लेकिन यह वैश्विक ऊर्जा संकट को अस्थायी रूप से कम करने में मदद कर सकता है। इस संकट ने एक बार फिर रूस को वैश्विक ऊर्जा बाजार में महत्वपूर्ण खिलाड़ी बना दिया है। पश्चिमी प्रतिबं द्दों के बावजूद रूस दुनिया के सबसे बड़े तेल निर्यातकों में से एक बना हुआ है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने रूस से तेल आयात में काफी वृद्धि की है। इसका मुख्य कारण यह है कि रूसी तेल अपेक्षाकृत सस्ता मिलता है और भारत की रिफाइनरियों के लिए उपयुक्त भी है। वर्तमान संकट के दौरान रूस भारत के लिए एक महत्वपूर्ण वैकल्पिक स्रोत के रूप में सामने आया है। इससे दोनों देशों के बीच ऊर्जा सहयोग और बहुत सटीक मजबूत हो सकता है।
साथियों बात अगर हम पश्चिम एशिया का संघर्ष और तेल आपूर्ति की अस्थिरता को समझने की करें तो,पश्चिम एशिया लंबे समय से विश्व ऊर्जा बाजार का केंद्र रहा है। दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक देशों का बड़ा हिस् सा इसी क्षेत्र में स्थित है। लेकिन वर्तमान संघर्ष ने इस पूरे क्षेत्र की स्थिरता को झकझोर दिया है। ईरान और उसके विरोधी देशों के बीच सैन्य टकराव ने तेल उत्पादन और निर्यात दोनों को प्रभावित किया है। कई तेल टैंकर समुद्र में फंस गए हैं और कई मार्गों पर सुरक्षा जोखिम इतना बढ़ गया है कि कंपनियां वहां से जहाज भेजने में हिचकिचा रही हैं। इस स्थिति ने वैश्विक बाजार में तेल की आपूर्ति को अस्थिर बना दिया है। परिणा मस्वरूप अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ गया है और ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों के लिए स्थिति और जटिल हो गई है। साथियों बात अगर हम हार्मुज जलडमरूमध्य- वैश्विक ऊर्जा की जीवन रेखा इस को समझने की करें तो पश्चिम एशिया के संकट का सबसे बड़ा प्रभाव उस समुद्री मार्ग पर पड़ा है जिसे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की धुरी कहा जाता है। यह जलमार्ग ईरान और अरब प्रायद्वीप के बीच स्थित है और दुनिया के तेल व्यापार के लिए अत्यंत महत्व पूर्ण है। यदि इस मार्ग से आ पूर्ति बाधित होती है तो उसका असर तुरंत वैश्विक तेल कीमतों पर पड़ता है।
वर्तमान संघर्ष के कारण इस क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां बढ़ गई हैं और कई जहाजों को रोकना या मोड़ना पड़ा है। इससे तेल की आपूर्ति में अनिश्चितता पैदा हो गई है। यही कारण है कि कई देशों ने वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों की तलाश शुरू कर दी है।
साथियों बात अगर हम भारतीय रिफाइनरियों की क्षम ता और संभावनाएं इसको सम झने की करें तो भारत के पास दुनियाँ की सबसे बड़ी रिफाइ निंग क्षमताओं में से एक है। देश की कई बड़ी रिफाइन रियां प्रतिदिन लाखों बैरल कच्चे तेल को संसाधित करने में सक्षम हैं। इन रिफाइनरियों की आयात क्षमता और भंडा रण क्षमता यह तय करती है कि भारत कितनी मात्रा में तेल खरीद सकता है। विशेष ज्ञों के अनुसार यदि भारत अपनी अधिकतम क्षमता का उपयोग करे तो वह अगले 30 दिनों में रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल आयात कर सक ता है। ऐतिहासिक आंकड़े और संभावित आयात ऊर्जा क्षेत्र के आंकड़ों के अनुसार भारत ने पिछले वर्षों में रूस से तेल आयात के कई रिकार्ड बनाए हैं। उदाहरण के लिए जून 2025 में भारत ने प्रति दिन लगभग 2.1 मिलियन बैर ल रूसी तेल खरीदा था, जो अब तक का सबसे बड़ा आं कड़ा है। यदि भारत इसी स्तर पर फिर से आयात शुरू करता है तो 30 दिनों में लग भग 63 मिलियन बैरल तेल खरीदा जा सकता है। यह मात्रा भारत की ऊर्जा जरू रतों को कुछ समय तक स्थिर रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
साथियों बात अगर हम भारत की दैनिक तेल खपत और वास्तविकता इसको सम झने की करें तो, भारत की दैनिक तेल खपत लगातार बढ़ रही है। हाल के वर्षों में यह आंकड़ा लगभग 5.6 मिलि यन बैरल प्रतिदिन से बढ़कर 5.7 मिलियन बैरल तक पहुंच गया है। अनुमान है कि 2026 तक यह लगभग 6 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंच सक ता है। इस हिसाब से यदि भारत 30 दिनों में रूस से लगभग 60 मिलियन बैरल तेल आयात करता है तो यह देश की लगभग 10 दिनों की जरूरतों को पूरा करने के बराबर होगा। इसलिए यह छूट दीर्घकालिक समाधान नहीं है, लेकिन अल्पकालिक राहत जरूर प्रदान कर सकती है। तेल आयात केवल खरीद पर निर्भर नहीं करता, बल्कि इसके लिए पर्याप्त भंडारण और परिवहन व्यव स्था भी जरूरी होती है।
भारत की रणनीतिक पेट्रो लियम भंडारण सुविधाएं सीमित हैं, हालांकि सरकार पिछले कुछ वर्षों में इन्हें बढ़ाने का प्रयास कर रही है। यदि भारत को बड़ी मात्रा में तेल आयात करना है तो रिफाइनरियों और भंडारण केंद्रों की क्षमता का भी पूरा उपयोग करना होगा। इसके अलावा समुद्री परिवहन और बीमा जैसी चुनौतियां भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
साथियों बात अगर हम समुद्र में फंसे टैंकर और तत् काल अवसर इसको समझने की करें तो, रूस के अनुसार लगभग 9 मिलियन बैरल तेल पहले से ही जहाजों में लोड होकर समुद्र में मौजूद है और भारत के संकेत का इंतजार कर रहा है। इसके अलावा लगभग 6 मिलियन बैरल तेल भेजने का अतिरिक्त प्रस्ताव भी दिया गया है।
इस तरह कुल मिलाकर लगभग 15 मिलियन बैरल तेल तुरंत उपलब्ध हो सकता है। यदि भारत तेजी से निर्णय लेता है तो वह इस अवसर का लाभ उठाकर अपनी ऊर्जा आपूर्ति को मजबूत कर सकता है।
साथियों बात अगर हम अमेरिका -भारत ऊर्जा संबंद्द और रणनीतिक संतुलन को समझने की करें तोअमेरिका ने यह भी संकेत दिया है कि वह चाहता है कि भारत भविष्य में अमेरिकी तेल की खरीद बढ़ाए। पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका भारत के लिए एक महत्वपूर्ण ऊर्जा आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा है। लेकिन भारत की ऊर्जा नीति हमेशा बहु- स्रोत रणनीति पर आधारित रही है। इसका उद्देश्य यह है कि किसी एक देश या क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता न हो। इसलिए भारत अमेरिका, रूस, मध्य-पूर्व और अन्य देशों से तेल खरीदकर अपने ऊर्जा स्रोतों को संतुलित रखने की कोशिश करता है।
साथियों बात अगर हम वैश्विक तेल बाजार पर संभा वित प्रभाव को समझने की करें तो, यदि पश्चिम एशिया का संकट लंबे समय तक जारी रहता है तो इसका असर वैश् िवक तेल बाजार पर गहरा पड़ सकता है। तेल की कीमतों में तेजी आने से दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ेगा। विशेष रूप से विकास शील देशों के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण हो सकती है क्यों कि उनकी अर्थव्यवस्था ऊर्जा आयात पर अधिक निर्भर होती है। ऐसे में वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों और रणनीतिक भंडारण की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाएगी।
भू- राजनीतिक संतुलन और भारत की कूटनी ति भारत की विदेश नीति हमेशा संतुलन और बहुपक्षीय सहयोग पर आधारित रही है। वर्तमान संकट में भी भारत को अमेरिका, रूस और पश्चिम एशिया के देशों के साथ अपने संबंधों को संतुलित रखना होगा। एक ओर भारत को अप नी ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित रखना है, तो दूसरी ओर उसे वैश्विक राजनीतिक समीकर णों को भी ध्यान में रखना होगा। यह एक जटिल कूटनी तिक चुनौती है, लेकिन भारत ने अतीत में भी ऐसे संतुलन को सफलतापूर्वक बनाए रखा है। वर्तमान संकट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ऊर्जा सुरक्षा केवल आयात पर निर्भर रहकर सुनिश्चित नहीं की जा सकती। भारत को दीर्घकालिक रणनीति के तहत वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों जैसे सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और हाइड्रोजन पर अधिक निवेश करना होगा। इसके साथ ही घरेलू तेल और गैस उत्पादन को भी बढ़ाने की जरूरत है। रणनी तिक पेट्रोलियम भंडार का विस्तार भी ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण कदम हो सक ता है। अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि संकट में अवसर और भविष्य की दिशा,पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष वैश् िवक ऊर्जा व्यवस्था के लिए एक गंभीर चेतावनी है।
इस संकट ने यह दिखा दिया है कि भू-राजनीतिक तनाव किस तरह वैश्विक अर्थ व्यवस्था को प्रभावित कर सक ता है। अमेरिका द्वारा भारत को रूस से तेल खरीदने की 30 दिन की छूट एक अस्थायी समाधान है, लेकिन इससे भारत को अपनी ऊर्जा आपूर्ति को स्थिर रखने का अवसर मिल सकता है।
साथ ही यह स्थिति भारत के लिए एक बड़े सबक की तरह भी है कि ऊर्जा सुरक्षा के लिए दीर्घकालिक और बहुआयामी रणनीति अपनाना आवश्यक है। यदि भारत इस संकट से सीख लेकर अपनी ऊर्जा नीति को और मजबूत बनाता है तो भविष्य में ऐसे वैश्विक संकटों का प्रभाव कम किया जा सकता है।
हार्मुज संकट ने यह दिखा दिया है कि भू- राजनीतिक तनाव किस तरह वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है, क्या अमेरिका की ओर से मिली छूट भारतीय संप्रभुता पर हमला
