एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट्र)
वैश्विक बाजार व्यवस्था में उपभोक्ता विश्वास सबसे बड़ा पूंजीगत आधार माना जाता है। यदि ग्राहक को यह भरोसा न रहे कि जो उत्पाद वह खरीद रहा है वह सुरक्षित, प्रमाणित और नियमानुसार है, तो संपूर्ण बाजार संरचना डग मगा सकती है। भारत जैसे विशाल और विविधता पूर्ण देश में, जहाँ रोजाना करोड़ों लोग पैकेज्ड खाद्य पदार्थ,पेय पदार्थ और दवाइयाँ खरीदते हैं, वहाँ एक्सपायरी डेट के साथ छेड़छाड़ का बढ़ता गोर खधंधा न केवल आर्थिक अप राध है बल्कि सार्वजनिक स्वा स्थ्य के लिए गंभीर खतरा भी है। हाल के समय में सामने आए मामलों जिनमें एक्सपा यर्ड माल पर थिनर, एसीटोन जैसे रसायनों से तारीख मिटा कर नई तारीख छापने की घटनाएँ शामिल हैं, ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कुछ असामाजिक तत्व लाभ के ला लच में नागरिकों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने से भी पीछे नहीं हट रहे।
मैं एडवोकेट किशन सन मुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह बताना चाहता हूं कि खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में भारत ने सुदृढ़ कानूनी ढाँचा बनाया है। खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 देश में खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता, पैकेजिंग, लेबलिंग और लाइसें सिंग को नियंत्रित करता है। इसी के अंतर्गत भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण की स्थापना की गई, जिसका दायित्व खाद्य मानकों का निद्र्दारण, निरीक्षण और प्रवर्तन सुनिश्चित करना है।
इस अधिनियम के अनुसार किसी भी खाद्य व्यवसाय संचा लक के लिए वैध फूड लाइ सेंस अनिवार्य है। यदि लाइसेंस एक्सपायर हो चुका है और फिर भी व्यवसाय जारी है,तो यह स्पष्ट आपराधिक उल्लं घन है। एक्सपायर्ड उत्पाद बेचना या उसकी तारीख बद लना न केवल लाइसेंस शर्तों का उल्लंघन है, बल्कि यह द्दोखाधड़ी और स्वास्थ्य संकट का सीधा निमंत्रण है।
उपभोक्ता संरक्षण के संदर्भ में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस कानून के तहत भ्रामक व्यापारिक प्रथाएँ, गलत विज्ञापन, गुणवत्ता में कमी या सुरक्षा से समझौता करने पर कठोर दंड का प्राव धान है। यदि कोई विक्रेता जानबूझकर एक्सपायर्ड माल बेचता है या एक्सपायरी डेट बदलकर उपभोक्ता को भ्रमित करता है, तो उपभोक्ता इस अधिनियम के तहत जिला, राज्य या राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज कर सकता है। साथ ही, केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण को भी भ्रामक और असुरक्षित व्यापारिक प्रथाओं पर कार्रवाई का अधिकार प्राप्त है।
साथियों बात अगर हम एक्सपायरी डेट, बेस्ट बिफोर और यूज बाय, इन तीन शब्दों का अंतर को समझने की करें तो, प्रत्येक ग्राहक के लिए अत्यंत आवश्यक है।
एक्सपायरी डेट या यूज बाय वह अंतिम तिथि है जि सके बाद उत्पाद का सेवन स्वास्थ्य के लिए असुरक्षित हो सकता है। विशेषकर डेय री उत्पाद, मांस, रेडी-टू-ईट फूड और दवाइयाँ इस श्रेणी में आती हैं। बेस्ट बिफोर का अर्थ है कि उस तिथि तक उत्पाद की गुणवत्ता सर्वोत्तम रहेगीयउसके बाद गुणवत्ता में गिरावट संभव है, किंतु हर स्थिति में वह तुरंत हानिका रक हो, यह आवश्यक नहीं। दवाइयों के संदर्भ में स्थिति और भी गंभीर है, उनकी एक्स पायरी के बाद प्रभावशीलता घट सकती है या रासायनिक संरचना बदल सकती है, जिस से दुष्प्रभाव हो सकते हैं। इसलिए दवा खरीदते समय एक्सपायरी डेट देखना अनि वार्य सावधानी है।
साथियों बात अगर हम हाल ही में 2 दिन पूर्व घटित हुए एक चर्चित प्रकरण को समझने की करें तो,अमूल ब्रांड के लगभग 30 हजार किलो एक्सपायर्ड नाॅन-डेयरी उत्पाद, जैसे नूडल्स, केचअप, मेयोनीज और एनर्जी ड्रिंक, एक फर्म से जब्त किए गए। रिपोर्टों के अनुसार लगभग 6 करोड़ रुपये मूल्य के इस माल में से हजा रों कार्टन में निर्माण और एक्स पायरी तिथि मिटाकर पुनः बाजार में उतारने की तैयारी थी, और संबंधित फर्म का फूड लाइसेंस भी एक्सपायर था।
यदि फूड सेफ्टी टीम समय पर कार्रवाई न करती, तो यह माल लाखों उपभोक्ताओं तक पहुँच सकता था। यह घटना बताती है कि संगठित स्तर पर भी तारीख बदलने की तकनीक अपनाई जा रही है,जिसमें केमिकल से प्रिंट हटाकर नई तारीख छापना शामिल है। यह न केवल कानू नन अपराध है, बल्कि यह उपभोक्ताके जीवन के साथ गंभीरखिलवाड़ है।
ऐसी घटनाएँ यह प्रश्न उठाती हैं कि क्या हम अनजाने में एक्सपायर्ड माल का सेवन कर रहे हैं? किराना दुकानों सुपरमार्केट, आनलाइन प्लेट फार्म और यहाँ तक कि सर कारी उचित मूल्य की दुकानों में भी यदि निगरानी ढीली हो, तो जोखिम बढ़ जाता है। विशेष चिंता तब और गहरी हो जाती है जब सार्व जनिक वितरण प्रणाली या स्कूल मिड-डे मील जैसी योजनाओं में गुणवत्ता से सम झौता हो। गरीब और मध्यम वर्गीय परिवार अक्सर सस्ती वस्तुओं की ओर आकर्षित होते हैंय यदि वही वस्तुएँ एक्सपायर्ड या छेड़छाड़ की हुई हों, तो स्वास्थ्य संकट कई गुना बढ़ जाता है।
साथियों बात अगर हम स्वास्थ्य विशेषज्ञों की एडवा इस को समझने की करें तो उनके अनुसार एक्सपायर्ड खा द्य पदार्थों के सेवन से फूड पाइजनिंग, उल्टी-दस्त, पेट दर्द, बैक्टीरियल संक्रमण, यहाँ तक कि गंभीर मामलों में अस् पताल में भर्ती होने की नौबत आ सकती है। दूषित या एक्स पायर्ड पेय पदार्थों से फंगल ग्रोथ, टाॅक्सिन्स और रासाय निक बदलाव की संभावना रहती है। बच्चों, बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं के लिए जोखिम अधिक होता है। दवा इयों के मामले में एक्सपायरी के बाद दवा की प्रभावशीलता कम हो सकती है, जिससे उप चार विफल हो सकता है और रोग जटिल हो सकता है।
ऐसी स्थिति में नागरिकों की भूमिका भी उतनी ही मह त्वपूर्ण है जितनी प्रशासन की। हर ग्राहक को खरीदारी से पहले पैकेट के पीछे, नीचे या सील के पास बारीक अक्षरों में अंकित तिथि अवश्य देखनी चाहिए। यदि तारीख धुंधली हो, दोबारा छपी हुई लगे या पैकेजिंग संदिग्ध प्रतीत हो, तो उत्पाद न खरीदें। बिल अव श्य लें ताकि शिकायत की स्थिति में प्रमाण उपलब्ध रहे। उपभोक्ता हेल्पलाइन 1915 (राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन) पर शिकायत दर्ज की जा सकती है या एफएसएसएआई की फूड सेफ्टी कनेक्ट ऐप के माध्यम से भी रिपोर्ट किया जा सकता है। सामूहिक जाग रूकता ही इस काले खेल को रोकने का प्रभावी माध्यम बन सकती है। केंद्रीय और राज्य स्तर पर उपभोक्ता मंत्रा लयों तथा खाद्य सुरक्षा विभागों को नियमित निरीक्षण अभियान, सैंपलिंग ड्राइव और आकस् िमक छापे तेज करने चाहिए। डिजिटल ट्रैकिंग, क्यूआर कोड आधारित सत्यापन और सप्लाई चेन मानिटरिंग जैसे तकनीकी उपाय अपनाए जा सकते हैं। लाइसेंस नवीनीकरण की सख्त निगरानी, बार-बार उल् लंघन करने वालों के लाइसेंस निरस्त करना और भारी आ र्थिक दंड लगाना आवश्यक है। साथ ही, दोषियों के वि रुद्ध आपराधिक मुकदमा चला कर जेल भेजना एक सशक्त संदेश देगा कि उपभोक्ता स्वा स्थ्य से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
साथियों बात अगर हम जनजागरूकता अभियान की अनिवार्यता को समझने की करें तो यह उतना ही महत्वपूर्ण हैं। स्कूलों, कालेजों, सामुदा यिक केंद्रों और मीडिया प्लेट फार्म पर एक्सपायरी डेट, बेस्ट बिफोर और यूज बाय के अंतर को समझाने वाले कार्यक्रम आ योजित होने चाहिए। स्वयंसेवी संस्थाएँ और सामाजिक संग ठन दुकानों पर जागरूकता पोस्टर लगा सकते हैं, रैंडम चेक कर सकते हैं और संदिग्द्द मामलों की सूचना दे सकते हैं। यदि नागरिक सक्रिय भागीदारी करें,तो प्रशा सन पर भी कार्रवाई का बड़ा सटीक दबाव बढ़ेगा।
साथियों बात अगर हम अंतरराष्ट्रीय स्तरपर भी खाद्य सुरक्षा को लेकर सख्त मानक लागू हैं इसको समझने की करें तो । यूरोपियन यूनियन में यूज बाय और बेस्ट बिफोर की स्पष्ट परिभाषाएँ हैं तथा लेबलिंग में किसी प्रकार की हेराफेरी पर भारी जुर्माना और आपराधिक दंड का प्रावधान है। अमेरिका में फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन पैकेजिंग और लेबलिंग मानकों की निगरानी करता है। भारत में भी समान रूप से कठोर कानून मौजूद हैं, परंतु चुनौती प्रवर्तनकी है। यदि निरीक्षण धीमे हों, सैंप लिंग नियमित न हो और जन जागरूकता सीमित रहे, तो कानून की शक्ति कागजों तक सीमित रह जाती है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खाद्य अपव्यय और खाद्य सुरक्षा के बीच संतुलन की भी चर्चा होती है। कई बार बेस्ट बिफोर तिथि पार होने के बाद भी उत्पाद उपभोग योग्य होता है, परंतु यूज बाय तिथि के बाद सेवन जोखिमपूर्ण हो सकता है। इसलिए वैज्ञानिक समझ और स्पष्ट संप्रेषण आवश्यक है ताकि अनावश्यक भय न फैले, किंतु सुरक्षा से समझौता भी न हो। भारत को भी अपने लेबलिंग मानकों को सरल, स्पष्ट और उपभोक्ता- अनुकूल बनाना चाहिए।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि एक्सपायरी डेट बदलकर माल बेचना केवल एक आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि यह सामाजिक नैतिकता और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर आघात है। यदि हम सजग नहीं होंगे, तो यह काला कारोबार और फैल सकता है। कानून मौजूद हैं, संस्थाएँ मौजूद हैं, परंतु प्रभावी प्रवर्तन, पारदर्शिता और नागरिक भागी दारी के बिना लक्ष्य अधूरा रहेगा। प्रत्येक ग्राहक की जिम्मे दारी है कि वह खरीदारी से पहले तिथि जांचे, संदिग्ध उत्पाद की शिकायत करे और अपने परिवार को जागरूक बनाए। सरकार की जिम्मेदा री है कि वह नियमित जांच, कड़ी सजा और व्यापक जन जागरण के माध्यम से इस गोरख धंधे पर अंकुश लगाए। उपभोक्ता स्वास्थ्य किसी भी राष्ट्र की मानव पूंजी का आ धार है। यदि नागरिक स्वस्थ रहेंगे तभी राष्ट्र सशक्त और समृद्ध बन सकेगा।
इसलिए एक्सपायरी डेट की जांच के वल एक छोटी सावधानी नहीं, बल्कि एक बड़े सामाजिक उत्तरदायित्व का हिस्सा है,जिसे अपनाकर हम स्वयं को, अपने परिवार को और समाज को संभावित स्वास् थ्य संकट से बचा सकते हैं।
हर ग्राहक को खरीदारी से पहले पैकेट के पीछे, नीचे या सील के पास बारीक अक्षरों में अंकित तिथि अवश्य देखें,तारीख धुंधली, दोबारा छपी हुई या पैकेजिंग संदिग्ध हो, उत्पाद न खरीदें,शिकायत करें
