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निर्विरोध चुनाव बनाम नोटा – भारत के लोकतंत्र में जन- इच्छा, कानून और नैतिकता की टकराहट

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट्र)।
वैश्विक स्तर पर भारत, जिसे गर्व से विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है, वहाँ चुनाव केवल प्रतिनिधि चुनने की प्रक्रिया नहीं हैं, बल्कि यह जनता की साम ूहिक चेतना, असहमति, सह मति और विश्वास का संवैधा निक माध्यम हैं। लोकतंत्र की आत्मा इस सिद्धांत पर टिकी है कि सत्ता जनता से निकल ती है, जनता द्वारा संचालित होती है और जनता के हित में कार्य करती है। ऐसे में यह प्रश्न अत्यंत गंभीर हो जाता है कि जब किसी निर्वा चन क्षेत्र में केवल एक ही उम्मीदवार मैदान में रह जाता है और वह निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिया जाता है, तब मतदाता की इच्छा, असह मति औरअधिकार का क्या होता है? विशेषकर तब, जब वही मतदाता नोटा (नन आफ द अबव) जैसे विकल्प के मा ध्यम से यह कहने का संवैधा निक अधिकार रखता है कि हमें यह उम्मीदवार स्वीकार नहीं है। जनप्रतिनिधित्व अधि नियम 1951 की धारा 53 (2) स्पष्ट रूप से कहती है कि यदि किसीनिर्वाचन क्षेत्र में जितने पद हैं, उतने ही उम्मीदवार शेष रह जाएँ, तो निर्वाचन अधिकारी उन्हें बिना मतदान के निर्वाचित घोषित करेगा। इसी प्रकार, चुनाव संचालन नियम, 1961 का नियम 11, तथा फार्म 21 और 21बी, निर्विरोध चुनाव के परि णाम घोषित करने की प्रक्रिया को वैधानिक रूप देते हैं।
कानूनी दृष्टि से यह व्य वस्था प्रशासनिक सरलता और संसाधनों की बचत के उद्देश्य से बनाई गई थी। किंतु आज, जब लोकतंत्र केवल प्रक्रिया नहीं बल्कि जन- भागीदारी और जन-सहमति का प्रतीक बन चुका है, तब यह प्रावधान अपने औचित्य परपुनर्विचार की माँग करता है। मैं एडवो केट किशन सनमुखदास भाव नानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि भारतीय संवि धान केवल शासन की संरचना नहीं, बल्कि एक जीवंत लोक तांत्रिक दस्तावेज है, जिसकी आत्मा जन-सहमति, जन- भागी दारी और जन- उत्तर दायित्व में निहित है।
भारत को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहे जाने का आधार केवल चुनावों की संख्या नहीं, बल्कि यह तथ्य है कि यहाँ प्रत्येक नागरिक को राज नीतिक भागीदारी और अभिव्य क्ति का समान अधिकार प्राप्त है।ऐसे में जब किसी निर्वाचन क्षेत्र में कोई उम्मीदवार निर्वि रोध निर्वाचित घोषित कर दिया जाता है और मतदाताओं को मतदान का अवसर ही नहीं दिया जाता, तब यह प्रश्न उठनास्वाभाविक है कि क्या यह व्यवस्था संविधान की मूल भावना के अनुरूप है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 से 329 तक चुनावों की संवै धानिक रूपरेखा निर्धारित की गई है। यद्यपि मतदान का अधिकार एक वैधानिक अद्दि कार है, किंतु सर्वोच्च न्याया लय ने समय- समय पर यह स्पष्ट किया है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संविधान के मूल ढाँचे का हिस्सा हैं।
लोकतंत्र में चुनाव का अर्थ केवल प्रतिनिधि चुनना नहीं है, बल्कि यह नागरिक की सहमति और असहमति दोनों की अभिव्यक्ति का माध्यम है। यदि किसी नागरिक को केवल स्वीकृति का अवसर मिले, परंतु अस्वीकृति का नहीं, तो लोक तंत्र अधूरा रह जाता है।
साथियों बात अगर हम नोटा, असहमति का संवैधानिक अधिकार इसको समझने की करें तो, भारत में नोटा विकल्प को 2013 में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले (पीयूसीएल बनाम भारत संघ) के माध्यम से मान्यता दी गई। इसका उद्देश्य स्पष्ट था,मतदाता को यह अधिकार देना कि वह चुनाव में भाग तो ले, परंतु किसी भी उम्मीदवार को स्वीकार न करे। नोटा लोकतंत्र में नका रात्मक सहमति का प्रतीक है। यह वोटर की वह चुप आवाज है जो कहती है, मैं चुनाव प्रणाली में विश्वास करता हूँ, लेकिन उम्मीदवारों में नहीं।
ऐसे में यह प्रश्न स्वाभा विक है कि जब चुनाव ही नहीं होता, तो नोटा का अस्तित्व किस लिए? यह विकल्प मत दाता की अभिव्यक्ति की स्वतं त्रता (अनुच्छेद 19 (1)(ं) से जुड़ा हुआ है। नोटा का उद्देश्य यह था कि नागरिक यह कह सके, मैं चुनाव प्रणाली में विश्वास करता हूँ, किंतु प्रस्तुत विकल्पों से संतुष्ट नहीं हूँ।
नोटा, संविधान के उस मूल सिद्धांत को मूर्त रूप देता है, जिसमें नागरिक को केवल शासक चुनने का नहीं, बल्कि शासन के स्वरूप पर प्रश्न उठाने का भी अधिकार भी प्राप्त है। साथियों बात अगर हम निर्विरोध चुनाव – धारा 53 (2) और संवैधानिक द्वंद्व इसको गहराई से समझने की करें तो जन प्रतिनिधित्व अद्दि नियम 1951 की धारा 53 (2) के अनुसार यदि किसी निर्वाचन क्षेत्र में उतने ही उम्मीदवार रह जाएँ जितनी सीटें हैं, तो निर्वाचन अधिकारी उन्हें बिना मतदान के निर्वाचित घोषित कर देगा। चुनाव संचालन नियम, 1961 का नियम 11 तथा फार्म 21ध्21बी इस प्रक्रिया को औपचारिक रूप देते हैं। यह प्रावधान प्रशास निक सुविधा और व्यावहारि कता के लिए बनाया गया था, किंतु आज के संवैधानिक परि प्रेक्ष्य में यह प्रश्न उठता है कि क्या यह व्यवस्था- जन-सह मति राजनीतिक समानताऔर लोकतांत्रिक नैतिकता के सिद्धांतों के अनुरूप है? संवि धान का मूल दर्शन यह है कि सत्ता जनता की इच्छा से उत्प न्न होती है। जब निर्विरोध चुनाव में मतदाता को मतदान का अवसर ही नहीं दिया जाता, तब उसकी इच्छा चाहे वह समर्थन की हो या विरोध, की संवैधानिक रूप से अदृश्य बना दी जाती है। यह स्थिति लोक तंत्र को जनता की सरकार से कानून द्वारा थोपी गई सर कार की ओर ले जाती है, जो संवैधानिक नैतिकता बिल्कुल विपरीत है।
साथियों बात अगर हम एक उम्मीदवार, शून्य विकल्प – क्या यह लोकतंत्र है? इस को समझने की करें तो, जब किसी सीट पर केवल एक उम्मीदवार बचता है और उसे निर्विरोध विजयी घोषित कर दिया जाता है, तो मतदाता के सामने कोई विकल्प नहीं रह जाता। न समर्थन का, न विरोध का। यह स्थिति लोक तंत्र के मूल सिद्धांत, चॉइस (चयन) को निष्प्रभावी बना देती है। यदि मतदाताओं का बड़ा वर्ग यह मानता है कि वह उम्मीदवार जनहित का प्रतिनिधित्व नहीं करता,फिर भी कानून उसे प्रतिनिधि बना देता है। यह लोकतंत्र नहीं, बल्कि वैधानिक एकाधिकार की स्थिति बन जाती है।
साथियों बात अगर हम सुप्रीम कोर्ट में उठा सवाल- नोटा बनाम निर्विरोध जीत इस को समझने की करें तो, इसी संवैधानिक द्वंद्व को लेकर विधि सेंटर फार लीगल पाॅलि सी द्वारा सुप्रीम कोर्ट में याचि का दायर की गई, जिसमें जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की द्दारा 53(2) और चुनाव संचालन नियम, 1961 को चुनौती दी गई। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्या यमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने टिप्पणी की कि यह एक बहुत रोचक और महत्व पूर्ण मुद्दा है। पीठ ने यह भी पूछा कि, क्या केवल एक उम्मी दवार वाले चुनावों में मतदा ताओं को नोटा का विकल्प नहीं दिया जा सकता? यह टिप्पणी अपने आप में इस बात का संकेत है कि न्याय पालिका भी इस व्यवस्था को लोकतांत्रिक कसौटी पर पर खने को तैयार है। सुनवाई के दौरान साॅलिसिटर जनरल ने तर्क दिया कि इस विषय पर पहले सरकार से संपर्क करना उचित होगा। न्याया लय ने भी याचिकाकर्ता को यह स्वतंत्रता दी कि यदि सरकार इस मुद्दे पर विचार नहीं करती, तो पुनः अदालत का दरवाजा खटखटाया जा सकता है। यह दृष्टिकोण संवि धान के शक्ति संतुलन सिद्धांत को दर्शाता है, जहाँ विधायी सुधार पहले संसद से अपेक्षित है और न्यायपालिका अंतिम संरक्षक की भूमिका में है।
चुनाव आयोग का पक्ष- दुर्लभ लेकिन महत्वपूर्ण चुनाव आयोग ने अपने हलफनामे में कहा कि लोकसभा में निर्विरो ध चुनाव अत्यंत दुर्लभ हैं। एक वरिष्ठ अधिवक्ता के अनु सार 1991 से अब तक केवल एक निर्विरोध लोकसभा चुनाव, 1971 से 2025 तक कुल छह, 1951 से अब तक हुए 20 आम चुनावों में केवल नौ निर्विरोध चुनाव, आँकड़े भले ही कम हों, परंतु लोकतंत्र में सिद्धांतों का मूल्य आँकड़ों से अधिक होता है। एक भी ऐसा मामला जहाँ मतदाता की इच्छा दबे, वह पूरे लोकतांत्रिक ढाँचे पर ही एक बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
साथियों बात अगर हम नोटा को उम्मीदवार मानने की बहस को सटीकता से समझने की करें तो चुनाव आयोग का यह भी कहना है कि नोटा को निर्विरोध चुनावों में उम्मीदवार मानना वर्तमान कानून के अंतर्गत संभव नहीं है। इसके लिए जनप्रतिनिधि त्व अधिनियम, 1951 और चुनाव संचालन नियम, 1961 में वि धायी संशोधन आवश्यक होंगे।
यह स्वीकारोक्ति स्वयं यह दर्शाती है कि समस्या वैधा निक है, संवैधानिक नहीं, और इसका समाधान संसद के पास है। न्यायालय की नैतिक टिप्प णी भी है कि नोटा आक्रोश का प्रतीक, पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि नोटा तभी प्रभावी होता है जब मतदाता ओं में किसी उम्मीदवार के प्रति गंभीर आक्रोश हो। चुनाव आयोग की ओर से यह तर्क दिया गया कि यदि इतना आक्रोश है, तो मतदाता स्वतंत्र उम्मीदवार खड़ा कर सकते हैं। किंतु यह तर्क व्यवहारिक यथार्थ से टकराताहै, क्योंकि स्वतंत्र उम्मीदवार खड़ा करना संसाधन, सुरक्षा और राजनीति क जोखिम से जुड़ा विषय है, जो हर नागरिक के लिए संभव नहीं। साथियों बात अगर हम स्थानीय निकायों में निर्विरोध चुनाव-खतरे की घंटी, इसको समझने की करें तो राष्ट्रवादी कांग्रेस (शरद पवार गुट) के सांसद ने संसद में यह मुद्दा उठाया कि महाराष्ट्र के हालिया नगर निकाय चुनावों में सत्ता धारी पार्टी के 25 से अधिक उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए, जिनमें परिवारवाद की स्पष्ट छाया दिखती है। स्थानीय निकाय लोकतंत्र की नींव होते हैं। यदि वहीं से निर्विरोध और वंशवादी प्रतिनिधित्व पन पने लगे, तो राष्ट्रीय लोकतंत्र की सेहत पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। साथियों बात अगर हम साम, दाम, दंड, भेद- निर्विरोध चुनावों की स्याह परछाई इसको समझने की करें तो नोटा समर्थक मतदा ताओं का मानना है कि निर्वि रोध चुनाव प्रायः स्वाभाविक नहीं होते। इसके पीछे धन बल दबाव धमकी, सौदेबाजी, परिवारवाद जैसे कारक सक्रिय रहते हैं। कई बार उम्मीदवारों से नामांकन वापस लेने के लिए मजबूर किया जाता है, जिससे जनता के सामने विक ल्प ही समाप्त हो जाए। नामां कन आज कानून उम्मीदवार को नामांकन वापस लेने की अनुमति देता है। किंतु यदि इसी प्रावधान का दुरुपयोग लोकतंत्र को कमजोर कर रहा है, तो यह समय है कि कानून में संशोधन किया जाए।एक प्रस्ताव यह हो सकता है कि, एक बार वैध नामांकन भरने के बाद उसे वापस नहीं लिया जा सके, या कम से कम निर्वि रोध स्थिति बनने से रोकने हेतु सख्त शर्तें लागू हों। यह सुधार लोकतंत्र में विकल्प की अनिवार्यता को सुनिश्चित करेगा। संविधान का अनुच्छेद 14 समानता की गारंटी देता है। यदि उम्मीदवारों को दबाव या धनबल के माध्यम से नामां कन वापस लेने के लिए विवश किया जाता है, तो यह, राजनी तिक समानता,निष्पक्ष प्रतिस्प र्धा और स्वतंत्र चुनाव तीनों का उल्लंघन है। आज नामां कन वापसी की अनुमति लोक तांत्रिक स्वतंत्रता के नाम पर दी जाती है। किंतु यदि यही स्वतंत्रता लोकतंत्र को विकल्प हीन बना दे, तो यह संवैधानिक उद्देश्य से विचलन है। ऐसे में यह विचार आवश्यक है कि निर्विरोध स्थिति बनने से पहले नामांकन वापसी पर सख्त शर्तें हों या नामांकन वापसी को सीमित किया जाए।
साथियों बात अगर हम अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य-दुनियाँ क्या करती है? इसको समझने की करें तो, कई लोकतांत्रिक देशों में, एकल उम्मीदवार के विरुद्ध भी अनिवार्य मतदान, न्यूनतम वोट प्रतिशत की शर्त, री -इलेक्शन का प्रावधान, जैसे उपाय मौजूद हैं।
भारत जो लोकतांत्रिक आदर्शों का वैश्विक प्रवक्ता है, ऐसे परिपक्व लोकतंत्र से भी यही अपेक्षा की जाती है कि वह प्रक्रिया से आगे बढ़कर भावना को समझे।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विशेषण करें तो हम पाएंगे कि लोकतंत्र प्रक्रिया नहीं, जन- सहमति है, निर्विरो ध चुनाव वैधानिक हो सकते हैं, परंतु हर वैधानिक चीज लोकतांत्रिक हो, यह आवश् यक नहीं।
यदि नोटा जनता की असहमति का स्वर है, तो उसे निर्विरोध चुनावों में कुच लना लोकतंत्र की आत्मा के साथ अन्याय है। आज आव श्यकता है धारा 53 (2) पर पुनर्विचार नामांकन वापसी पर नियंत्रण, नोटा को वास्तविक प्रभाव देनेऔर मतदाता की अदृश्य इच्छा को दृश्य बनाने की क्योंकि लोकतंत्र केवल जीत का नाम नहीं, जन- स्वीकृति का उत्सव है।

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