एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट्र)।
वैश्विक स्तर पर भारत में प्रत्येक वर्ष जुलाई का महीना लाखों करोड़ों विद्यार्थियों और अभिभावकों के लिए नए शैक्ष णिक सत्र की शुरुआत का प्रतीक होता है। नई कक्षाएँ, नए सपने, नई पुस्तकें, नई वर्दी और नई उम्मीदें, ये सब मिलकर शिक्षा का उत्सव रच ते हैं। किंतु इसी उत्सव के बीच एक ऐसी समस्या लगा तार गहराती जा रही है, जो शिक्षा के मूल उद्देश्य पर प्रश्न चिह्न खड़ा करती है। देश के अनेक निजी विद्यालयों में अभि भावकों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी विशेष दुकान अथवा स्वयं विद्यालय से ही पुस्तकें, कॉपियाँ, यूनिफार्म, जूते, बैग तथा अन्य शैक्षणिक सामग्री खरीदने के लिए बाध्य किए जाने की शिकायतें वर्षों से सामने आती रही हैं।
इससे शिक्षा का उद्देश्य ज्ञानार्जन से हटकर व्यावसा यिक गतिविधि का रूप लेता दिखाई देता है। 2 जुलाई 2026 को महाराष्ट्र विधान सभा में शालेय शिक्षण मंत्री ने इस विषय पर सरकार का पक्ष स्पष्ट करते हुए महत्वपूर्ण संदेश दिया। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार का उद्देश्य प्रत्येक पात्र विद्यार्थी तक शैक्षणिक सत्र के प्रारंभ में ही आवश्यक सामग्री समय पर पहुँचाना है। यदि किसी जिले या विद्यालय में वितरण में देरी अथवा अनियमितता होती है, तो उसकी जिम्मेदारी तय कर संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कोई भी निजी विद्यालय अभिभावकों को किसी एक विशेष दुकान से पुस्तकें, यूनि फार्म या अन्य शाला सामग्री खरीदने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। यदि ऐसी शिका यतें प्राप्त होती हैं, तो संबंधि त विद्यालयों के विरुद्ध नियमा नुसार कार्रवाई की जाएगी। मैं एडवोकेट किशन सनमुख दास भावनानी गोंदिया महा राष्ट्र यह मानता हूं कि यह वक्तव्य केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि पूरे भारत की शिक्षा व्यवस्था के लिए एक नीति- संदेश के रूप में देखा जाना चाहिए।
दरअसल, भारत का संवि धान शिक्षा को समान अवसर का आधार मानता है। शिक्षा का अधिकार केवल विद्यालय में प्रवेश तक सीमित नहीं है, बल्कि ऐसी व्यवस्था सुनिश् िचत करना भी राज्य की जिम्मे दारी है जिसमें आर्थिक स्थि ति किसी बच्चे की शिक्षा में बाधा न बने। यदि किसी अभि भावक को बाजार में उपलब्द्द समान गुणवत्ता की पुस्तकें या यूनिफॉर्म कम कीमत पर मिल सकती हैं, फिर भी उसे विद्यालय द्वारा निर्धारित विक्रे ता से ही खरीदने के लिए बाध्य किया जाता है,तो यह प्रतिस्पर्धा उपभोक्ता अधिकार और शिक्षा की नैतिकता, सटी क रूप से तीनों के विरुद्ध है।
साथियों, देश के अनेक शहरों और कस्बों में यह देखा गया है कि कुछ विद्यालय विशेष प्रकाशकों से समझौता कर ऐसी पुस्तकें निर्धारित कर देते हैं जो सामान्य बाजार में उपलब्ध नहीं होतीं। कई विद्यालय अपनी अलग अभ्यास पुस्तिकाएँ भी अनिवार्य कर देते हैं। इसी प्रकार यूनिफार्म के लिए भी एक निश्चित दुकान तय कर दी जाती है। परिणाम स्वरूप अभिभावकों के पास विकल्प समाप्त हो जाता है और उन्हें अधिक कीमत चुका नी पड़ती है। कई बार एक ही गुणवत्ता की सामग्री खुले बाजार में काफी कम मूल्य पर उपलब्ध होती है, लेकिन विद्यालय की शर्तों के कारण उसका लाभ नहीं मिल पाता।
भारत जैसे देश में,जहाँ बड़ी संख्या में परिवार मध्यम वर्गीय और निम्न आय वर्ग से आते हैं, शिक्षा पर होने वाला अतिरिक्त व्यय परिवार की आर्थिक व्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित करता है। कई अभिभावकों को बच्चों की फीस, परिवहन, पुस्तकें, यूनिफॉर्म और अन्य खर्चों के लिए ऋण लेना पड़ता है। यदि शैक्षणिक सामग्री की खरीद में प्रतिस्पर्धा और विकल्प समा प्त कर दिए जाएँ, तो यह आर्थिक बोझ और बढ़ जाता है। शिक्षा का उद्देश्य सामा जिक समानता स्थापित करना है, न कि आर्थिक असमानता को और गहरा करना।
साथियों, शासकीय विद्याल यों की स्थिति इससे भिन्न होते हुए भी चुनौतियों से मुक्त नहीं है। केंद्र और राज्य सर कारें विद्यार्थियों को निःशुल्क पाठ्य पुस्तकें, यूनिफार्म, बैग तथा अन्य आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराने के लिए बड़ी धनराशि खर्च करती हैं।कई राज्यों में वितरण प्रक्रिया में देरी, आपूर्ति संबंधी समस्याएँ अथवा प्रशासनिक लापरवाही जैसी शिकायतें सामने आती हैं। महाराष्ट्र विधानसभा में मंत्री द्वारा अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की बात इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। यदि निर्धारित समय पर सामग्री विद्यार्थियों तक पहुँ चेगी, तभी सरकारी योजनाओं का वास्तविक उद्देश्य पूरा होगा। आज आवश्यकता केवल साम ग्री उपलब्ध कराने की नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता, समय बद्धता और पारदर्शिता सुनिश् िचत करने की भी है। यदि पुस्तकें सत्र शुरू होने के कई सप्ताह बाद मिलती हैं, तो विद्यार्थी प्रारंभिक अध्ययन से वंचित हो जाते हैं। यदि यूनि फार्म समय पर नहीं मिलती, तो आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को सामा जिक असहजता का सामना करना पड़ता है।
इसलिए वितरण व्यवस्था का वैज्ञानिक और डिजिटल प्रबंधन समय की मांग है। साथियों, यह भी ध्यान देने योग्य है कि भारत में शिक्षा का निजीकरण तेजी से बढ़ा है। निजी विद्यालयों ने शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने में महत्व पूर्ण योगदान दिया है, लेकिन शिक्षा सेवा और व्यावसायिक गतिविधि के बीच संतुलन बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है। अधिकांश निजी विद्यालय नियमों का पालन करते हैं, किंतु कुछ संस्थानों की गलत कार्य प्रणालियाँ पूरे निजी शिक्षा क्षेत्र की छवि को प्रभा वित करती हैं। इसलिए नियमों का समान और निष्पक्ष पालन आवश्यक है। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि विद्यालय केवल पाठ्यक्रम पढ़ाने का केंद्र नहीं, बल्कि नैतिक मूल्यों का भी निर्माण करते हैं। यदि विद्यालय स्वयं पारदर्शिता, निष् पक्षता और उपभोक्ता अधिका रों का सम्मान नहीं करेंगे, तो विद्यार्थियों में इन मूल्यों का विकास कैसे होगा? शिक्षा संस् थानों का आचरण स्वयं विद्या र्थियों के लिए सबसे बड़ा पाठ होता है।
साथियों, अभिभावकों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। यदि किसी विद्यालय द्वारा किसी विशेष दुकान से साम ग्री खरीदने का दबाव बनाया जाता है, तो अभिभावकों को सामूहिक रूप से विद्यालय प्रबं धन से संवाद करना चाहिए। आवश्यकता पड़ने पर संबंधि त शिक्षा अधिकारी अथवा सक्षम प्रशासनिक प्राधिकारी के समक्ष शिकायत भी प्रस्तुत की जा सकती है। जागरूक नागरिक ही पारदर्शी व्यवस्था की नींव होते हैं।
आज डिजिटल तकनीक इस समस्या का व्यावहारिक समाधान भी प्रस्तुत करती है। प्रत्येक विद्यालय अपनी पुस्तक सूची, यूनिफार्म का डिजाइन, आवश्यक सामग्री और उनकी विशिष्टताएँ सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध करा सकता है। इससे अभिभावक किसी भी अधिकृत विक्रेता से निर्धारित मानकों के अनुरूप सामग्री खरी द सकेंगे। प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, कीमतें नियंत्रित रहेंगी और पारदर्शिता सटीकता से स्वतः स्थापित होगी।
साथियों, राष्ट्रीय स्तर पर भी ऐसी नीति विकसित करने की आवश्यकता है जिसमें स्प ष्ट रूप से यह प्रावधान हो कि विद्यालय किसी एक दुका न, विक्रेता या प्रकाशक से खरीद को अनिवार्य नहीं बना सकेंगे। विद्यालय केवल गुण वत्ता और विनिर्देश निर्धारित करें, खरीद का विकल्प अभि भावकों के पास रहे। यदि कोई विशेष सामग्री विद्यालय द्वारा तैयार की गई हो, तो उसकी कीमत, लागत और वितरण प्रक्रिया भी पारदर्शी होनी चाहि ए। उपभोक्ता अधिकारों के दृष्टिकोण से भी यह विषय अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रत्येक नागरिक को अपनी पसंद के विक्रेता से वस्तु खरीदने का अधिकार है। यदि किसी संस्था द्वारा यह स्वतंत्रता सीमित की जाती है, तो यह निष्पक्ष व्या पार की भावना के विपरीत है। शिक्षा संस्थानों को इस सिद्धांत का सम्मान करना चाहिए।
साथियों, विद्यालय प्रबंधन को भी यह समझना होगा कि अभिभावक उनके ग्राहक नहीं, बल्कि शिक्षा के साझेदार हैं। विश्वास, सहयोग और पारदर्शिता पर आधारित संबं ध ही किसी भी उत्कृष्ट विद्या लय की पहचान होते हैं।
अल्पकालिक आर्थिक लाभ के लिए यदि अभिभावकों का विश्वास खो दिया जाए, तो संस्था की सामाजिक प्रतिष् ठा भी प्रभावित होती है। समा ज के स्तर पर भी हमें यह स्वी कार करना होगा कि शिक्षा को व्यापार नहीं बनने देना है। विद्यालयों का मूल्यांकन केवल भवन, परिणाम या सुविधाओं से नहीं, बल्कि उनकी नैतिक ता, पारदर्शिता और सामाजिक उत्तरदायित्व से भी होना चाहि ए। जो विद्यालय अभिभावकों को विकल्प देते हैं, उचित मूल्य सुनिश्चित करते हैं और विद्या र्थियों के हित को सर्वोपरि रखते हैं, वे वास्तव में आदर्श शिक्षा संस्थान कहलाने के अधिकारी हैं। महाराष्ट्र विद्दा न सभा में मंत्री द्वारा दिया गया संदेश इसी व्यापक राष् ट्रीय सोच का प्रतिनिधित्व कर ता है कि शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता जवाबदेही और अभि भावकों के अधिकारों की रक्षा अनिवार्य है। यदि इस भावना को सभी राज्य अपनाएँ और प्रभावी रूप से लागू करें, तो करोड़ों परिवारों को आर्थिक राहत मिलेगी तथा शिक्षा व्यवस्था में जनता का विश्वास और सटीकता से मजबूत होगा।
साथियों, अंतरराष्ट्रीय अनु भव भी यही बताते हैं कि विक सित देशों में अधिकांश विद्या लय आवश्यक सामग्री की सूची उपलब्ध कराते हैं, लेकिन ख रीद का विकल्प अभिभावकों पर छोड़ते हैं। इससे प्रतिस्प र्धा बनी रहती है, कीमतें नियं त्रित रहती हैं और परिवारों पर अनावश्यक आर्थिक दबाव नहीं पड़ता। भारत भी इस दिशा में प्रभावी कदम उठाकर शिक्षा प्रणाली को और अधि क पारदर्शी तथा जनहितकारी बना सकता है। शासन की जिम्मेदारी केवल नियम बनाने तक सीमित नहीं रहनी चाहि ए। नियमित निरीक्षण, आनला इन शिकायत निवारण प्रणाली, समयबद्ध जांच, दोषी संस्था नों पर दंडात्मक कार्रवाई तथा शिकायतकर्ताओं की गोपनी यता सुनिश्चित करना भी उत ना ही आवश्यक है। जब तक नियमों का प्रभावी क्रियान्वयन नहीं होगा, तब तक केवल दिशा – निर्देश पर्याप्त सिद्ध नहीं होंगे।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि यह प्रश्न केवल कापी, पुस्तक, बैग या यूनिफार्म का नहीं है। यह प्रश्न शिक्षा के चरित्र का है। क्या विद्यालय ज्ञान के मंदिर बने रहेंगे या धीरे-धीरे बाजार का विस्तार बन जाएँगे? इसका उत्तर सर कार, विद्यालय प्रबंधन, शिक्षकों, अभिभावकों और समाज सभी को मिलकर देना होगा। जब प्रत्येक विद्यार्थी को समय पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सामग्री मिले, अभिभावकों को खरीद की स्वतंत्रता प्राप्त हो, सरकारी योजनाओं का लाभ बिना विलंब पहुँचे और निजी विद्यालय पूर्ण पारदर्शिता से कार्य करें, तभी भारत की शिक्षा व्यवस्था वास् तव में समावेशी, न्यायपूर्ण, उत्तर दायी और विश्वस्तरीय बन सकेगी। यही शिक्षा का वास्त विक उद्देश्य है यही विकसित भारत की मजबूत नींव भी।
अभिभावक विद्यालय प्रबंधन के ग्राहक नहीं, शिक्षा के साझेदार हैं -विश्वास, सहयोग और पारदर्शिता पर आधारित संबंध ही किसी भी उत्कृष्ट विद्यालय की होते हैं पहचान
