ई. श्रीधरन ने देश में मेट्रो के रूप में क्रांति लाने में निभाई अहम भूमिका

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(मनीष जायसवाल) मेट्रो अपनी रफ्तार से कुछ शहरों में लोगों के जीवन को आसान बना रही है। मेट्रो की रफ्तार ने न सिर्फ दूरियां कम करने का काम किया है बल्कि बहुत से लोगों को आरामदायक वाहन भी मुहैया करवाया है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि देश में मेट्रो के रूप में इस क्रांति को लाने में अहम भूमिका किसने निभाई है। बता दें कि इस क्षेत्र में अहम भूमिका निभाने वाले ई.श्रीधरन, जिन्हें मैट्रो मैन के नाम से भी जाना जाता है। 12 जून को ई. श्रीधरन ने अपना 91वां बर्थडे मनाया। आइए जानते हैं उनके जन्मदिन के मौके पर ई. श्रीधरन के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में…
केरल के पलक्कड़ में पत्ताम्बी नामक स्थान पर 12 जून 1932 को ई.श्रीधरन का जन्म हुआ था। उन्होंने अपनी शुरूआती पढ़ाई पलक्कड़ के बेसल ईवैनजेलिकल मिशन हायर सेकंड्री स्कूल से पूरी की है। इसके बाद आगे की पढ़ाई श्रीधरन ने पालघाट स्थित विक्टोरिया काॅलेज से की। आंध्र प्रदेश के काकी नाड़ा स्थित श्गवर्नमेंट इंजि नियरिंग काॅलेजश् से उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की।
इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद ई. श्रीधरन कोझिकोड स्थित श्गवर्नमेंट पाॅलिटेक्निकश् में पढ़ाने लगे थे। यहां पर वह सिविल इंजी नियरिंग पढ़ाते थे। इसके बाद उन्होंने बाॅम्बे पोर्ट ट्रस्ट में बतौर ट्रेनी काम किया। वहीं साल 1953 में श्रीधरन ने इंडियन इंजिनियरिंग सर्विस यानी की प्म्ै की परीक्षा पास की और साल 1954 में दक्षिण रेलवे में प्रोबेशनरी असिस्टेंट इंजिनियर के तौर पर उनकी पहली नौकरी शुरू हुई।
देश की पहली कोलकाता मेट्रो की योजना, डिजाइन और कार्यान्वयन की जिम्मे दारी ई.श्रीधरन को सौंपी गई थी। वहीं साल 1970 में कोलकाता में उन्होंने देश की पहली मेट्रो की नींव डाली थी। जिसके बाद साल 1975 में श्रीधरन को कोलकाता मेट्रो रेल परियोजना से हटा दिया गया। साल 1979 में उन्होंने कोचिन शिपयार्ड को ज्वॉइन किया। उस दौरान कोचिन शिपयार्ड की परफाॅ र्मेंस काफी खराब थी। लेकिन श्रीधरन की कार्यकुशलता, अनुभव और अनुशासन का लाभ कोचिन शिपयार्ड को मिला। कोचिन शिपयार्ड को ई. श्रीधरन ने कायाकल्प कर दिया। साल 1981 में कोचिन शिपयार्ड का श्एम.वी.रानी पद्मिनीश् पहला जहाज तैयार हुआ। इस जहाज को तैयार करने में उन्होंने अहम भूमिका निभाई थी।
साल 1987 में श्रीधरन का प्रमोशन हुआ और उन्हें पश्चिमी रेलवे में जनरल मैनेजर बनाया गया। जिसके बाद साल 1989 में वह रेलवे बोर्ड के सदस्य बन गए। वहीं जब साल 1990 में वह सेवा निवृत्त होने वाले थे, तब ई. श्रीधरन को कोंकण रेलवे के चीफ मैनेजिंग डायरेक्टर के पद पर अनुबंध पर नियुक्त किया गया। यहां पर उनके नेतृत्व में कई रिकॉर्ड बने।
इसके सबाद साल 1997 में श्रीधरन को दिल्ली मेट्रो रेल काॅर्पोरेशन के मैनेजिंग डायरेक्टर के पद पर नियुक्त किया गया। इस दौरान उन की उम्र 64 साल की थी। वहीं दिल्ली के तत्कालीन सीएम साहिब सिंह वर्मा ने उनको यह पद सौंपा था। दिल्ली मेट्रो की सफलता और समय-सीमा के अंदर काम करने के बाद उनको श्मैट्रो मैनश् की उपलब्धि दी गई।
दिल्ली मेट्रो से रिटयरमेंट होने के बाद ई. श्रीधरन को कोच्चि और लखनऊ मेट्रो रेल का मुख्य सलाहकार नि युक्त किया गया। वहीं जयपुर मेट्रो को श्रीधरन ने सलाह देने का काम किया। वहीं देश में बनने वाली अन्य मेट्रो रेल परियोजनाओं में भी वह सक्रिय रहे।
साल 1964 में तमिनलाडु में एक तूफान के कारण रामेश्वरम को तमिल नाडु से जोड़ने वाला श्पम्बन पुलश् टूट गया था। वहीं रेलवे ने इस पुल के पुनः जीर्णोद्धार और मरम्मत करने के लिए 6 महीने का समय दिया था। लेकिन ई. श्रीधरन ने इस काम को सिर्फ 3 महीने में पूरा करने के लिए कहा। जिसके बाद पुल का काम उन्हें सौंपा गया। बता दें कि पुल के पुनः जी र्णोद्धार और मरम्मत के कार्य को उन्होंने सिर्फ 46 दिनों में पूरा कर दिया था। जिसके लिए ई.श्रीधरन को श्रेलवे मंत्री पुरस्कारश् से नवाजा गया था।

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