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अमेरिका-ईरान तनाव केवल दो देशों के बीच शक्ति प्रदर्शन नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति, क्षेत्रीय संतुलन ऊर्जा सुरक्षा और घरेलू लोकतांत्रिक प्राथमिकताओं का जटिल संगम है

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट्र)।
वैश्विक स्तरपर आज के वैश्विक राजनीतिक परिदृश्य में एक स्पष्ट प्रवृत्ति दिखाई देती है, दुनियाँ भर के नाग रिक और मतदाता युद्ध की राजनीति से अधिक अपनी आर्थिक सुरक्षा, महंगाई, रोज गार, ऊर्जा कीमतों और रोज मर्रा के खर्चों को प्राथमिकता देने लगे हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में यह बदलाव और भी तीखा है, क्योंकि वहां चुनावी परिणाम सीधे जनभा वनाओं से प्रभावित होते हैं। जब भी किसी महाशक्ति के सामने युद्ध या सैन्य टकराव का विकल्प आता है, तो उसके भीतर यह प्रश्न उठता है कि क्या यह कदम घरेलू राजनीतिक हितों,आर्थिक स्थिरता और जनसमर्थन के अनुरूप है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि, इसी संदर्भ में डोनाल्ड ट्रम्प का ईरान के प्रति सख्त रुख और मध्य पूर्व में सैन्य जमा वड़ा एक महत्वपूर्ण अध्ययन का विषय बन जाता है, विशेष कर तब जब अमेरिका में मध्यावधि चुनाव नजदीक हों और मतदाता महंगाई व जीवन – यापन की लागत से जूझ रहे हों। अमेरिकी राज नीति में लंबे समय से यह बहस चलती रही है कि विदेश नीति और घरेलू अर्थव्यवस्था के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। यूनाइटेड स्टेट्स के मतदाताओं ने पिछले दो दश कों में अफगानिस्तान और इराक जैसे युद्धों के दीर्घका लिक प्रभावों को देखा है।
इन युद्धों ने अमेरिकी अर्थ व्यवस्था पर भारी वित्तीय बोझ डाला और हजारों सैनिकों की जान ली। इसी पृष्ठभूमि में फारएवर वार्स को समाप्त करने का नारा लोकप्रिय हुआ। ट्रंप की राजनीतिक पहचान भी आंशिक रूप से इसी वादे पर टिकी रही कि वे अमेरिका को अनावश्यक विदेशी युद्धों से दूर रखेंगे। ऐसे में यदि ईरान के साथ संभावित टक राव लंबा खिंचता है, तो यह उनके समर्थक आधार में असंतोष पैदा कर सकता है, खासकर तब जब महंगाई और ऊर्जा कीमतें पहले से ही चिंता का विषय हों। दूसरी ओर ईरान की रणनीति को केवल सैन्य शक्ति के चश्मे से नहीं देखा जा सकता। ईरान की राजनीतिक व्यवस्था वैचारिक रूप से प्रतिरोध की अवधारणा पर आधारित है। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से ईरान ने स्वयं को पश्चिमी दबाव के विरुद्ध खड़े राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत किया है। इसीलिए सार्वजनिक रूप से अमेरिकी दबाव के आगे झुकना उसके नेतृत्व के लिए केवल कूटनीतिक निर्णय नहीं, बल्कि वैचारिक पराजय के रूप में देखा जा सकता है। ईरानी नेतृत्व यह समझता है कि यदि वह कठोर रुख अपनाता है, तो घरेलू स्तरपर राष्ट्रवादी समर्थन मजबूत होगा और क्षेत्रीय सहयोगियों के बीच उसकी विश्वसनीयता बनी रहेगी। इस पूरी स्थिति को समझने के लिए मेरे द्वारा तैयार किए गए कुछ प्रश्नों के संभावित उत्तरों का अध्ययन कर इसका निष्कर्ष निकलना होगाअब मूल प्रश्नों की हम हर पैराग्राफ में चर्चा करेंगे
साथियों बात अगर हम यदि अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध होता है तो क्या पूरा मध्य पूर्व जंग का मैदान बन जाएगा? इसको समझने की करें तो इस प्रश्न का उत्तर सरल हाँ या नहीं में नहीं दिया जा सकता, परंतु संभावना अत्यंत प्रबल है कि संघर्ष केवल द्विपक्षीय न रहे। ईरान के पास प्रत्यक्ष पारंपरिक सैन्य क्षमता के अलावा प्राक्सी नेट वर्क है, इराक, सीरिया, लेब नान और यमन में उससे जुड़े समूह सक्रिय हैं। यदि सीधा युद्ध छिड़ता है, तो ये समूह अमेरिकी ठिकानों और उसके सहयोगियों को निशाना बना सकते हैं विशेष रूप से इज रायल, सऊदी अरब और खाड़ी देशों की सुरक्षा पर सीधा असर पड़ सकता है। फारस की खाड़ी और होरमुज जलडमरूमध्य वैश्विक तेल आपूर्ति का महत्वपूर्ण मार्ग हैं, वहां किसी भी सैन्य टकराव से ऊर्जा बाजारों में उथल- पुथल हो सकती है, जिसका सटीकता से प्रभाव वैश्विक महंगाई पर पड़ेगा।
साथियों बात अगर हम क्या अमेरिका-ईरान युद्ध तय माना जा रहा है? इसको सम झने की करें तो, अंतरराष्ट्रीय राजनीति में तय जैसा शब्द शायद ही कभी सटीक होता है। दोनों देशों के बीच दशकों से तनाव है, परंतु पूर्ण युद्ध कई बार टला भी है। कूट नीति, बैक-चैनल वार्ता, क्षेत्रीय मध्यस्थता और वैश्विक शक्ति यों का दबाव अक्सर सीधे युद्ध को रोकने में भूमिका निभाते हैं। अमेरिका यह जानता है कि ईरान के साथ खुला युद्ध केवल सैन्य नहीं, बल्कि आर्थिक और राजनी तिक दृष्टि से भी भारी पड़ेगा। वहीं ईरान भी जानता है कि अमेरिकी सैन्य क्षमता उससे कई गुना अधिक है। इसलिए दोनों पक्ष सीमित टकराव या नियंत्रित तनाव की रणनीति अपनाते हैं, जिससे शक्ति प्रदर्शन भी हो और पूर्ण युद्ध से बचाव भी।
साथियों बात अगर हम क्या दुनियाँ तीन गुटों में बंट सकती है? इसको समझने की करें तो शीत युद्ध के समय जैसा स्पष्ट द्विध्रुवीय या त्रिध्रुवीय विभाजन आज नहीं है, लेकिन रणनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ रहा है।
अमेरिका के पारंपरिक सह योगी-यूरोपीय देश, जापान, आस्ट्रेलिया आम तौर पर उस के साथ खड़े होते हैं, जबकि ईरान को रूस और चीन से कुछ हद तक राजनीतिक या आर्थिक समर्थन मिल सकता है। परंतु यह समर्थन पूर्ण सैन्य गठबंधन में बदल जाए, यह निश्चित नहीं। आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था इतनी परस्पर जुड़ी हुई है कि अधिकांश देश व्यापक युद्ध से बचना चाहते हैं। इसलिए तीन गुटों में बंटना एक अतिशयोक्ति पूर्ण आशंका हो सकती है, पर ध्रुवीकरण और क्षेत्रीय संरे खण अवश्य तेज हो सकते हैं।
साथियों बात अगर हम क्या ईरान वास्तव में अमेरिका का मुकाबला कर सकता है? इसको समझने की करें तो पारंपरिक सैन्य शक्ति की तुल ना में अमेरिका कहीं अधिक शक्तिशाली है वायु सेना, नौ सेना, साइबर क्षमता और वैश् िवक तैनाती के मामले में उस की बढ़त स्पष्ट है। लेकिन युद्ध केवल टैंकों और विमानों से नहीं जीते जातेय असममित युद्ध में कमजोर पक्ष भी लंबे समय तक प्रतिरोध कर सक ता है। ईरान की मिसाइल क्षमता, ड्रोन तकनीक,साइबर हमले की संभावनाएँ और प्राक्सीसमूहों का नेटवर्क उसे प्रतिरोध की शक्ति प्रदान करते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि वह अमेरिका को निर्णायक रूप से हरा सकता है, पर वह संघर्ष को महंगा, लंबा और राजनीतिक रूप से असुविधाजनक बना सकता है। साथियों बात अगर हम क्या अमेरिका का युद्ध से पीछे हटना उसकी वैश्विक छवि को ठेस पहुंचाएगा? इस को समझने की करें तो, यह प्रश्न जटिल है।
एक दृष्टिकोण कहता है कि यदि अमेरिका कड़े बयान के बाद पीछे हटता है,तो उसकी डिटरेंस क्षमता कम जोर पड़ सकती है और विरो धी उसे अनिश्चित मान सकते हैं। दूसरा दृष्टिकोण यह है कि अनावश्यक युद्ध से बचना परिपक्व नेतृत्व का संकेत है। आज की दुनियाँ में आर्थिक शक्ति, तकनीकी नेतृत्व और कूटनीतिक प्रभाव भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितनी सैन्य क्षमता। यदि पीछे हटना रणनीतिक गणना का हिस्सा हो और उसे कमजोरी के बजाय विवेक के रूप में प्रस्तुत किया जाए, तो इससे छवि पर स्थायी आघात जरूरी नहीं।
साथियों बात अगर हम ईरान अमेरिकी दबाव में झुकने की अपेक्षा युद्ध को प्राथमिकता क्यों देता प्रतीत होता है? इसको समझने की करें तो इसके पीछे कई परतें हैं। पहली, वैचारिक- क्रांतिकारी पहचान और प्रतिरोध की द्दुरी का नैरेटिव। दूसरी रणनीतिक -यदि वह झुकता है तो क्षेत्रीय सहयोगियों और घरेलू समर्थकों के बीच उसकी विश्व सनीयता कम हो सकती है।
तीसरी, राजनीतिक- बाहरी खतरा अक्सर आंतरिक असंतोष को कम करने में मदद करता है। चैथी, मनोवै ज्ञानिक- शक्ति संतुलन में यदि कमजोर पक्ष पूरी तरह झुक जाए, तो भविष्य में उसके साथ और कठोर शर्तें जोड़ी जा सकती हैं। इसलिए सीमि त टकराव के माध्यम से वह यह संदेश देना चाहता है कि वह पूरी तरह असहाय नहीं है। साथियों बात अगर हम सभी प्रश्नों को एक खाके में रख सोचने की करें तो, यह समझना आवश्यक है कि आ धुनिक विश्व में पूर्ण युद्ध की लागत केवल सैनिकों की जान तक सीमित नहीं रहतीयवह वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं ऊर्जा बाजारों, शेयर बाजारों और आम नागरिक की रसोई तक पहुंचती है। यदि फारस की खाड़ी में संघर्ष बढ़ता है, तो तेल कीमतों में उछाल आ एगा, जिससे अमेरिका सहित पूरी दुनिया में महंगाई बढ़ सकती है।
ऐसे में मतदाता सरकारों से युद्ध नहीं, बल्कि स्थिरता और आर्थिक राहत की अपेक्षा रखते हैं। यही कारण है कि अमेरिका के भीतर भी कई रणनीतिकार चुनाव से पहले सैन्य विस्तार के जोखिमों को लेकर सत र्कता की सलाह देते हैं।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि अमेरिका-ईरान तनाव केवल दो देशों के बीच शक्ति प्रदर्शन नहीं,बल्कि वैश् िवक राजनीति, क्षेत्रीय संतुलन, ऊर्जा सुरक्षा और घरेलू लोक तांत्रिक प्राथमिकताओं का जटिल संगम है।
युद्ध की संभावना से इन कार नहीं किया जा सकता, पर उसे अनिवार्य भी नहीं माना जा सकता। दोनों पक्ष अपनी- अपनी सीमाओं और क्षमताओं को जानते हैं। दुनि या तीन स्पष्ट गुटों में बंटे, यह निश्चित नहीं, पर ध्रुवीकरण बढ़ सकता है।
ईरान अमेरिका को परास्त करने की स्थिति में नहीं, पर संघर्ष को महंगा बना सकता है। और अमेरिका यदि रणनीतिक कारणों से पीछे हटता है, तो उसे कम जोरी नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण संतुलन के रूप में भी देखा जा सकता है। अंततः लोक तंत्रों में मतदाता की प्राथमिकता- रोजगार, महंगाई, सुरक्षा और स्थिरता ही नीति की दिशा तय करती है, और यही तत्व भविष्य की किसी भी संभावित टकराव की वास्त विक सीमा निर्धारित करेंगे।

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