छात्र राजनीति से शुरू हुआ था केसी वेणुगोपाल का सियासी सफर, राहुल ने भरोसा जताकर बढ़ाया था कद

RAJNITIK BULLET
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  • फरवरी 4, 2022  

साल 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा था लेकिन केसी वेणुगोपाल के गृह राज्य में पार्टी का कद बढ़ा था और तो और राहुल गांधी की केरल की वायनाड सीट से ही लोकसभा पहुंचे हैं। जबकि उन्हें गांधी परिवार की परंपरागत सीट अमेठी से हार का सामना करना पड़ा।

नयी दिल्ली। कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल गांधी परिवार के वफादारों में से एक हैं। उन पर पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने दांव लगाया था और उनका कद बड़ा बढ़ाया था। जिसको लेकर पार्टी के भीतर कई सवाल भी खड़े हुए थे। क्योंकि केसी वेणुगोपाल को संगठन के भीतर ही लोग पहचानते नहीं थे। हालांकि उन्होंने इस धारणा को बदलते हुए अपनी साख को मजबूत करने का काम किया।

साल 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा था लेकिन केसी वेणुगोपाल के गृह राज्य में पार्टी का कद बढ़ा था और तो और राहुल गांधी की केरल की वायनाड सीट से ही लोकसभा पहुंचे हैं। जबकि उन्हें गांधी परिवार की परंपरागत सीट अमेठी से हार का सामना करना पड़ा। खैर लोकसभा चुनाव को लेकर केसी वेणुगोपाल का कद भी बढ़ा और वो पार्टी अध्यक्षा सोनिया गांधी और महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा के करीबी लोगों में भी शामिल हो गए।

4 फरवरी 1963 को कन्नूर जिले के कंदोथर गांव में जन्में केसी वेणुगोपाल के राजनीतिक करियर की शुरुआत छात्र राजनीति से शुरू हुई थी। केसी वेणुगोपाल के पिता कुंजिकृष्णन नांबी और मां जानकी अम्मा हैं। वे केरल छात्र संघ के राज्य अध्यक्ष और भारतीय युवा कांग्रेस के राज्य अध्यक्ष बने। इसके बाद साल 1996 में अलाप्पुझा निर्वाचन क्षेत्र से पहली बार विधानसभा पहुंचे और यह सिलसिला साल 2006 के चुनावों तक चलता रहा।

जब पहली बार लड़ा था सांसदी का चुनाव

साल 2009 के लोकसभा चुनाव में केसी वेणुगोपाल ने अलाप्पुझा से अपनी किस्मत को आजमाया और काफी अच्छे अंतर के साथ उन्होंने जीत दर्ज भी की। इस दौरान केसी वेणुगोपाल ने केंद्रीय राज्य मंत्री, विद्युत मंत्रालय और केंद्रीय राज्य मंत्री, नागरिक उड्डयन मंत्रालय का जिम्मा संभाला और फिर अगले चुनाव में फिर ताल ठोकी और जीत भी दर्ज की। इसके बाद पार्टी ने उन्हें राजस्थान के रास्ते राज्यसभा भेजा।

केसी वेणुगोपाल ने कांग्रेस के लिए संकटमोचन के तौर पर भी सामने आए। उन्होंने राजस्थान और छत्तीसगढ़ कांग्रेस में चल रहे सियासी घमासान को न सिर्फ कम किया बल्कि पार्टी नेताओं को भी एकजुट करने का काम किया।

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